जी राम जी (मनरेगा) योजना में उत्तम कार्य में चित्रकूट आगे, आइए जानते हैं जमीनी हकीकत

संजय सिंह राणा की खास रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश में ‘जी राम जी’—यानी मनरेगा—के क्रियान्वयन को लेकर वर्ष 2025 में चित्रकूट का नाम सरकारी आँकड़ों में बार-बार अग्रणी जिलों में दर्ज हुआ। राज्य स्तरीय MIS रिपोर्टों में यह जिला मानव-दिवस सृजन, 100 दिन का रोजगार, और अकुशल मद में व्यय जैसे संकेतकों पर आगे दिखा। यही कारण है कि प्रशासनिक स्तर पर चित्रकूट को योजना का “सफल मॉडल” बताया गया। लेकिन जब इन्हीं आँकड़ों को ग्राम पंचायतों, कार्यस्थलों और मजदूरों के अनुभव की कसौटी पर परखा जाता है, तो तस्वीर पूरी तरह एकरंगी नहीं रह जाती। यह रिपोर्ट उसी अंतराल को दर्ज करती है—जहाँ काग़ज़ पर सफलता और ज़मीन पर असंतोष एक साथ मौजूद हैं।

उच्च मांग वाला जिला, इसलिए ऊँचे आँकड़े

बुंदेलखंड क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण चित्रकूट में कृषि अस्थिरता, सीमित औद्योगिक अवसर और मौसमी पलायन लंबे समय से मौजूद रहे हैं। यही वजह है कि यहाँ मनरेगा की मांग स्वाभाविक रूप से अधिक रहती है। जब बड़ी संख्या में जॉब-कार्ड सक्रिय हों और पंचायतों पर रोजगार उपलब्ध कराने का दबाव हो, तो मानव-दिवस और व्यय दोनों तेज़ी से बढ़ते हैं। इसी प्रवृत्ति के चलते 2025 में चित्रकूट में अकुशल मद में 20 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय दर्ज हुआ और कई ब्लॉकों में 100 दिन का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या राज्य औसत से ऊपर रही। यहाँ तक आँकड़ों की कहानी मजबूत दिखती है।

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लेकिन ज़मीन पर सवाल: काम की गुणवत्ता और पारदर्शिता

आँकड़ों से आगे बढ़ते ही सवाल शुरू होते हैं—काम कैसा हुआ, किसे मिला और कितना टिकाऊ रहा?

तालाब खुदाई: मानिकपुर क्षेत्र की शिकायत

मानिकपुर तहसील की कुछ ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत तालाब खुदाई कार्य को MIS में “पूर्ण” दर्शाया गया। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों की शिकायत रही कि— खुदाई की गहराई निर्धारित मानक से कम रखी गई। पहली बरसात में पानी ठहर नहीं पाया। तालाब सिंचाई या जल-संचयन के काम नहीं आ सका। यहाँ शिकायत भ्रष्टाचार से अधिक जल्दबाज़ी में लक्ष्य-पूर्ति और तकनीकी निगरानी की कमी को लेकर सामने आई।

मस्टर रोल बनाम वास्तविक उपस्थिति: कर्वी ब्लॉक

कर्वी ब्लॉक की कुछ पंचायतों में सोशल ऑडिट बैठकों के दौरान यह शिकायत दर्ज हुई कि— मस्टर रोल में 20–25 मजदूरों के नाम दर्ज थे, लेकिन कार्यस्थल पर 10–12 लोग ही उपस्थित मिले। ग्रामीणों का कहना था कि शेष नाम या तो अनुपस्थित मजदूरों के थे या ऐसे लोगों के, जो उस दिन काम पर आए ही नहीं। इससे MIS में मानव-दिवस पूरे दिखते रहे, जबकि वास्तविक श्रम कम रहा।

मजदूरी भुगतान: राजापुर क्षेत्र की शिकायत

राजापुर और कर्वी से सटे ग्रामीण इलाकों से यह शिकायत सामने आई कि— कई मजदूरों को 15–20 दिन बाद मजदूरी मिली। बैंक आधार-सीडिंग की त्रुटि का हवाला देता रहा। पंचायत कहती रही कि भुगतान “सिस्टम से हो चुका है”। इस बीच मजदूर बैंक और पंचायत के बीच फँसा रहा। MIS में भुगतान पूर्ण था, लेकिन मजदूर के लिए वह अनिश्चितता और कर्ज का कारण बना।

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वृक्षारोपण: संख्या बनी, पेड़ नहीं बचे

मऊ और मानिकपुर ब्लॉक में मनरेगा के तहत वृक्षारोपण कार्य बड़े पैमाने पर दर्ज हुए। लेकिन ग्रामीणों की शिकायत रही कि— पौधे लगाए गए, पर देखरेख की व्यवस्था नहीं की गई। पहली गर्मी में 60–70 प्रतिशत पौधे सूख गए। अगले वर्ष उसी स्थान को दोबारा नया कार्य दिखा दिया गया। यहाँ योजना ने काम की निरंतरता तो दिखाई, लेकिन पर्यावरणीय परिणाम नहीं।

शिकायत करने वालों की चुप्पी: पंचायत स्तर का दबाव

कई पंचायतों से यह अनुभव सामने आया कि— जिसने मेट या प्रधान से मजदूरी या हाजिरी पर सवाल किया, उसे अगली सूची में काम नहीं दिया गया। कोई लिखित आदेश नहीं होता, लेकिन व्यवहारिक संदेश साफ होता है। यह स्थिति मनरेगा की अधिकार-आधारित भावना को कमजोर करती है।

सोशल ऑडिट: सवाल उठे, जवाब अधूरे

चित्रकूट में सोशल ऑडिट की औपचारिक प्रक्रिया चली, शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन— कितने मामलों में वास्तविक दंड हुआ? कितनी रिकवरी हुई? इसकी जानकारी सार्वजनिक स्तर पर स्पष्ट नहीं रही। नतीजा यह कि सोशल ऑडिट डर पैदा करने वाला औज़ार बनने के बजाय अक्सर फाइल का हिस्सा बनकर रह गया।

“अव्वल ज़िला” का दबाव और आँकड़ों की राजनीति

प्रशासनिक स्तर पर जब किसी ज़िले को “अग्रणी” दिखाने का लक्ष्य बनता है, तो— काम की उपयोगिता से अधिक संख्या और रिपोर्टिंग पर ज़ोर बढ़ जाता है। चित्रकूट में भी कई स्थानों पर यह दबाव दिखा कि कार्य जल्दी “पूर्ण” दिखे, ताकि रैंकिंग बनी रहे।

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समेकित तस्वीर

चित्रकूट में मनरेगा— ✔️ रोजगार का सहारा बना ✔️ पलायन को आंशिक रूप से रोका ✔️ बड़ी धनराशि का प्रवाह गाँवों तक लाया लेकिन साथ ही— ❌ गुणवत्ता पर सवाल ❌ भुगतान में व्यक्तिगत स्तर की दिक्कतें ❌ पंचायत-स्तरीय शक्ति-संकेंद्रण ❌ शिकायतों का सीमित निवारण

चित्रकूट का उदाहरण यह बताता है कि, मनरेगा की सफलता को केवल MIS रैंकिंग से नहीं, बल्कि मजदूर की संतुष्टि, परिसंपत्ति की टिकाऊ उपयोगिता और शिकायत-निवारण से मापा जाना चाहिए। आँकड़े ज़रूरी हैं, लेकिन जब तक ज़मीन की आवाज़ उनके साथ नहीं चलेगी, तब तक “अव्वल ज़िला” एक अधूरी उपलब्धि ही रहेगा।

❓ पाठकों के सवाल – जवाब

चित्रकूट मनरेगा में अव्वल क्यों दिखाया गया?

मानव-दिवस, 100 दिन रोजगार और अकुशल मद में अधिक व्यय के कारण सरकारी आँकड़ों में चित्रकूट अग्रणी दिखा।

क्या ज़मीन पर भी स्थिति उतनी ही बेहतर है?

नहीं, कई पंचायतों में काम की गुणवत्ता, भुगतान देरी और निगरानी को लेकर शिकायतें सामने आई हैं।

सबसे बड़ी समस्या क्या सामने आई?

मस्टर रोल और वास्तविक उपस्थिति में अंतर, तालाब व वृक्षारोपण कार्यों की उपयोगिता और शिकायत निवारण की कमजोरी।

समाधान क्या हो सकता है?

गुणवत्ता आधारित निगरानी, सोशल ऑडिट पर कार्रवाई और मजदूर-केंद्रित पारदर्शिता।

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