
आज फिर गुस्ताख दिल चुप नहीं रह सका। यह चुप्पी के विरुद्ध जन्मा स्तंभ है, किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं। यह क्रोध से नहीं, बल्कि भीतर जमा हुए उस दुख से लिख रहा है जो वर्षों की पत्रकारिता के अनुभव में आकार लेता रहा। खबरें दर्ज होती रहीं, बयान आते रहे, प्रतिक्रियाएँ छपती रहीं — पर मूल प्रश्न अधूरे रह गए।
सवालों की शुरुआत, आरोपों की नहीं
यह स्तंभ किसी दल या विचारधारा का प्रवक्ता नहीं होगा। यह प्रवृत्तियों पर प्रश्न उठाएगा, व्यक्तियों पर आरोप नहीं लगाएगा। जब समाज में चुप रहना सामान्य हो जाता है, तब प्रश्न पूछना असामान्य प्रतीत होता है। पर लोकतंत्र की आत्मा सवालों में बसती है, तालियों में नहीं।
भरोसे के गड्ढों पर भी चर्चा होगी
सड़क के गड्ढों पर चर्चा होती है, पर भरोसे के गड्ढों पर कम। चेहरे बदलते हैं, पद बदलते हैं, नारे बदलते हैं — पर नीयत बदलने का साहस दुर्लभ है। “गुस्ताख दिल” का संकल्प है कि वह सत्ता, शिक्षा, धर्म, साहित्य और समाज — हर क्षेत्र में दिशा और निर्णय पर संतुलित प्रश्न रखेगा।
क्रोध नहीं, जिम्मेदार संवेदनशीलता
यह स्तंभ उत्तेजना में नहीं लिखेगा। यह सनसनी नहीं फैलाएगा। यह व्यंग्य करेगा, पर मर्यादा के साथ। हँसी आए तो उसके बाद हल्की चुभन भी रहे, ताकि पाठक ठहरकर सोचे। सुधार बाहर से पहले भीतर से शुरू होता है, इसलिए यह स्तंभ स्वयं को भी कसौटी पर रखेगा।
घोषणा मात्र नहीं, प्रतिबद्धता
आज की यह पहली गुस्ताखी दरअसल एक घोषणा है। “समाचार दर्पण” केवल घटनाओं का दर्पण नहीं रहेगा, बल्कि समय की बेचैनियों का भी दस्तावेज़ बनेगा। यदि सच कहना असुविधाजनक है, तो वही असुविधा स्वीकार है। यदि सवाल उठाना जोखिम है, तो वह जोखिम भी अनुशासन और जिम्मेदारी के साथ स्वीकार है।











गुस्ताख दिल स्तंभ समय की जोली में प्रासंगिकता और सार्थकता को समेटे हुए हैं। लेखक का लक्ष्य स्पष्ट संदेश देता हैं कि चुप्पी से बचों वरना आने वाली पीढ़ियां गूंगी और बाहरी पैदा होगी।