मुख्य बिंदु: ग्राम पंचायत कालूपुर (पाही) के पूर्व प्रधान सलीम चच्चा जी का 22 फरवरी 2026 को हादसे में निधन। दो कार्यकाल में विकास और सामाजिक समरसता की मिसाल, क्षेत्र में गहरा शोक।
कालूपुर (पाही) गांव के लिए 22 फरवरी 2026 का दिन एक गहरी रिक्तता छोड़ गया। पूर्व ग्राम प्रधान सलीम चच्चा जी का सड़क हादसे में आकस्मिक निधन हो गया। एक जेसीबी की टक्कर ने उस शख्सियत की जीवन-यात्रा को थाम दिया, जिसने तीन दशकों तक गांव की राजनीति, विकास और सामाजिक सौहार्द में अपनी अलग पहचान बनाई। खबर फैलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और लोगों की जुबान पर एक ही बात रही— “यह सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, एक युग का अंत है।”
पत्थर की खदानों से पंचायत तक का सफर
साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले सलीम चच्चा जी ने जीवन की शुरुआत पत्थर की खदानों से की। संघर्ष उनकी पहचान था, पर हौसला उससे बड़ा। इसी जज़्बे ने उन्हें कालूपुर (पाही) की ग्राम पंचायत तक पहुंचाया। 1990 से 1995 तक अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने अनुसूचित जाति समुदाय के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके प्रयासों से गांव में बस्ती का व्यवस्थित बसना संभव हुआ, जिसे आज भी लोग उनके काम की मिसाल मानते हैं।
दूसरा कार्यकाल और विकास की रफ्तार
2005 से 2010 के बीच दूसरे कार्यकाल में सलीम चच्चा जी ने विकास कार्यों को नई गति दी। मनरेगा योजना के अंतर्गत कराए गए कार्यों की चर्चा आज भी गांव की चौपालों में होती है। सड़क, नाली और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझते थे और जनहित को प्राथमिकता देते थे।
रिश्तों की गर्माहट
सलीम चच्चा जी का व्यक्तित्व केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। वे गांव के हर घर से जुड़े हुए थे। स्वर्गीय बोड़ीलाल (लंबे) जी के साथ उनकी मित्रता एक मिसाल मानी जाती थी। दोनों परिवारों के बीच आत्मीयता का ऐसा संबंध रहा कि सुख-दुख साझा हो जाते थे। पिता के निधन के बाद भी सलीम चच्चा जी का स्नेह और मार्गदर्शन परिवार को मिलता रहा। गांव का मुस्लिम पुरवा और कालूपुर की गलियां उनके स्नेह की गवाह हैं, जहां पीढ़ियों ने साथ-साथ बचपन जिया।
वर्तमान भूमिका और अधूरा सफर
वर्तमान में उनकी बहू शहाना बेगम ग्राम पंचायत कालूपुर (पाही) से प्रधान हैं। सलीम चच्चा जी प्रधान प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय रहते हुए विकास कार्यों को आगे बढ़ा रहे थे। उनकी उपस्थिति पंचायत की बैठकों में आत्मविश्वास भरती थी। लेकिन नियति ने अचानक यह सफर थाम दिया।
क्षेत्र में शोक की लहर
हादसे की खबर मिलते ही गांव और आसपास के क्षेत्रों में गहरा शोक छा गया। लोग उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सलीम चच्चा जी जैसी लोकप्रियता और सहजता दुर्लभ है। वे हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे।
समरसता की विरासत
सलीम चच्चा जी की सबसे बड़ी पहचान सामाजिक समरसता थी। उन्होंने जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर गांव के हित में कार्य किया। उनके कार्यकाल में पंचायत केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि साझा परिवार का प्रतीक बनकर उभरी।
अंतिम श्रद्धांजलि
उनकी असामयिक मृत्यु ने परिवार और गांव दोनों को भीतर तक झकझोर दिया है। यह क्षति केवल एक परिवार की नहीं, पूरे क्षेत्र की है। सलीम चच्चा जी को उनके कार्यों, स्नेह और नेतृत्व के लिए हमेशा याद किया जाएगा। गांव की मिट्टी में उनका योगदान दर्ज है और स्मृतियों में उनका साया लंबे समय तक बना रहेगा।
सलीम चच्चा जी को हमारी और पूरे क्षेत्र की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।








