आदरणीय सत्ता के कर्णधारों,
मैं जम्मू कश्मीर हूँ। वही, जिसे कभी आपके कवियों ने “धरती का स्वर्ग” कहा था—वही, जिसकी वादियाँ बादलों, नदियों और बर्फ़ की ख़ामोश बातचीत से पहचानी जाती थीं। आज मैं आपसे कोई नारा नहीं माँग रहा, कोई वादा नहीं—मैं केवल अपना छीना हुआ सुकून, अपनी खोई हुई गरिमा और अपनी चुप्पी में दबी सुंदरता वापस माँग रहा हूँ।
मैं बहुत पुराना हूँ। इतना पुराना कि मेरे पहाड़ों ने समय को चलते देखा है, मेरी नदियों ने पीढ़ियों की परछाइयाँ ढोई हैं, और मेरे सेब के बाग़ों ने हँसी को फलते हुए भी देखा है, और डर को पत्तों की तरह झरते हुए भी। मगर पिछले कुछ दशकों में मुझ पर सबसे भारी बोझ मौसम का नहीं, सियासत का पड़ा है।
आपने मुझे मानचित्र पर देखा, फ़ाइलों में तौला, बहसों में उछाला और कैमरों में कैद किया। मगर क्या कभी आपने मुझे सुना? मैंने बहुत कुछ खोया है। मेरे यहाँ केवल लोग नहीं मरे—मेरे गीत चुप हो गए, मेरे स्कूल डर के साए में सिमट गए, और मेरी मस्जिदों, मंदिरों व गुरुद्वारों की घंटियाँ और अज़ानें एक-दूसरे को सुनने से हिचकने लगीं।
आप कहते हैं—“सब कुछ सामान्य है।” पर सामान्य क्या होता है, जब एक माँ अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय वापसी की दुआ माँगती है? जब एक जवान बंदूक और शक के बीच बड़ा होता है? जब सुंदरता भी पहचान पत्र माँगने लगे? सामान्यता तब खो जाती है, जब जीवन सतर्कता में बदल जाए और भरोसा संदेह में।
मेरे जीवन को बार-बार आँकड़ों में समेटने की कोशिश की गई। कहा गया कि हालात सुधर रहे हैं, मगर उन दिनों को कौन गिने जब संचार बंद रहा, संवाद टूटा और मेरी आवाज़ देश तक पहुँचने से पहले ही रुक गई। इंटरनेट की खामोशी ने केवल नेटवर्क नहीं काटा—उसने मेरे छात्रों की पढ़ाई, मेरे युवाओं की तैयारी और मेरे व्यापारियों की रोज़ी-रोटी को भी बाधित किया।
पर्यटन को मेरी बहाली का प्रतीक बताया गया। तस्वीरें बदलीं, पोस्टर बने, भीड़ आई। मगर क्या पर्यटन ही किसी समाज की सेहत का पैमाना होता है? जब पर्यटक लौट जाते हैं, तब भी यहाँ के लोग यहीं रहते हैं—उसी अनिश्चितता, उसी निगरानी, उसी असमंजस के बीच। विकास की परियोजनाएँ आईं, सड़कें बनीं, इमारतें खड़ी हुईं; लेकिन विकास तब अधूरा रह जाता है, जब स्थानीय लोगों की भागीदारी, सहमति और सम्मान उस प्रक्रिया का हिस्सा न हों।
मेरी पहचान को अक्सर एकरूप समस्या में बदल दिया गया। जैसे मैं केवल एक संवेदनशील क्षेत्र हूँ, एक चुनौती हूँ। मेरी भाषाएँ, मेरी संस्कृतियाँ, मेरी बहुलता—कश्मीरी, डोगरी, पहाड़ी, गुज्जर-बकरवाल—इन सबकी आवाज़ नीति-निर्माण में कम सुनी गई। जब पहचान को संकुचित किया जाता है, तब प्रतिनिधित्व कमज़ोर पड़ता है और दूरी गहरी हो जाती है।
भयंकर गलन और धुंध से ठप होता जन-जीवन
मेरे युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न रोज़गार और भविष्य का है। पढ़ाई के बाद भी अनिश्चितता, सीमित अवसर और निरंतर जाँच-पड़ताल ने उनके आत्मविश्वास को चोट पहुँचाई है। युवा किसी भी समाज की आशा होते हैं; उन्हें केवल सुरक्षा का विषय बना देना, समाज को भविष्य से वंचित करना है।
मेरी महिलाओं ने सबसे ज़्यादा सहा—चुपचाप, नाम के बिना। संघर्ष, विस्थापन और मानसिक आघात के बीच उन्होंने परिवार और समाज को थामे रखा, मगर नीति और संवाद में उनकी आवाज़ अक्सर हाशिए पर रही। उन्हें संरक्षण नहीं, सम्मान चाहिए।
मेरे बुज़ुर्गों ने बहुत कुछ देखा है—सरहदें, वादे और टूटे भरोसे। वे अब किसी बड़े परिवर्तन की माँग नहीं करते; वे बस यह चाहते हैं कि उनकी आख़िरी साँस किसी डर के साए में न जाए।
मैं यह नहीं कहता कि सुरक्षा की ज़रूरत नहीं थी। मगर क्या सुरक्षा का अर्थ लगातार संदेह में जीना है? क्या शांति का मतलब ख़ामोशी थोप देना है? मेरी सुंदरता को पर्यटन की फ़ाइलों में, मेरे दुख को सुरक्षा ब्रीफ़िंग में और मेरी पहचान को आँकड़ों में बदल दिया गया—यही मेरी सबसे गहरी पीड़ा है।
मैं आज भी सुंदर हूँ। मेरी झीलें आज भी आसमान को सहेजती हैं, मेरे पहाड़ आज भी सूरज को थामते हैं। लेकिन सुंदरता तभी पूरी होती है, जब उसे डर के बिना जिया जा सके।
मुझे फिर से केवल इलाका मत समझिए। मैं घर हूँ—लाखों लोगों का, लाखों सपनों का। मेरी शांति बंदूक से नहीं आएगी, वह संवाद से आएगी। मेरी गरिमा आदेश से नहीं लौटेगी, वह सम्मान से लौटेगी।
मेरी सुंदरता लौटाइए—लेकिन केवल कैमरों में नहीं। मेरी शांति लौटाइए—लेकिन केवल आँकड़ों में नहीं। मेरी गरिमा लौटाइए—ताकि मैं फिर से सिर उठाकर ख़ुद को “घर” कह सकूँ।
इतिहास मुझे कभी विवाद कहेगा, कभी समस्या। पर याद रखिए—अगर आपने मुझे इंसान की तरह नहीं सुना, तो मैं हमेशा एक अधूरी कहानी बना रहूँगा।
अब भी समय है।
मुझे फिर से सिर्फ़ सुंदर नहीं—
सुरक्षित, सम्मानित और शांत बनने दीजिए।
आपकी ओर
आख़िरी नहीं, उम्मीद भरी पुकार के साथ—
जम्मू कश्मीर
इस पत्र का आशय : सवाल–जवाब
यह पत्र किसकी ओर से लिखा गया है?
यह पत्र प्रतीकात्मक रूप से जम्मू कश्मीर की ज़मीन, समाज और आम नागरिकों की सामूहिक भावना की ओर से लिखा गया है।
इस पत्र का मूल उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य सत्ता से टकराव नहीं, बल्कि शांति, गरिमा, संवाद और इंसानियत की पुनर्बहाली की संवेदनशील अपील है।
यह पत्र किस तरह की शांति की बात करता है?
यह सैन्य या काग़ज़ी शांति नहीं, बल्कि भरोसे, सम्मान और नागरिक अधिकारों पर आधारित वास्तविक शांति की बात करता है।
यह पत्र आज के समय में क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि यह आँकड़ों और घोषणाओं से आगे जाकर मानवीय अनुभव, पीड़ा और उम्मीद को केंद्र में रखता है।










यह पत्र किसी क्षेत्र विशेष के भोगौलिक या राजनीतिक स्वरूप की लकीरों के अंदर चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते या खाते-पीते इन्सानी वजूदों का दिखावटी भाषण नहीं है बल्कि मां भारती के शीश पर पड़ने वाले उस दर्दनाक बोझ की वह जीवंत पुकार है जिसे आज तक अनसुना किया जाता रहा।
यह पत्र एक ऐसी शांति की उम्मीद करता है जो कभी 1985-86 तक हुआ करती थी। देश-दुनिया के लिए बेशक कश्मीर के हालात 1990 में खराब हुए मगर इस बात को जम्मू-कश्मीर के स्थाई और सुधी नागरिक ही जानते हैं कि प्रदेश में अशांति और आतंक का संक्रमण 1986-87 में हो गया था।
यह पत्र धारा 370 निरस्त होने से पहले के जम्मू-कश्मीर के स्थाई नागरिकों की पीड़ा का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है। यह वही नागरिक हैं जो शांति और विकास के वादों और दावों के बीच सिर्फ सड़कें और पुल ही नहीं एक ‘घर’ भी ढूंढ रहे हैं!
मैं जम्मू-कश्मीर के मूल निवासियों की ओर से अनिल अनूप जी का हार्दिक धन्यवाद करता हूं।