हरदोई का “मेडिकल कॉलेज” —जब इलाज खुद एक रेफरल-फाइल बन जाए


हरदोई मेडिकल कॉलेज रेफरल समस्या: जब इलाज खुद मजबूरी बन जाए


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अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट

हरदोई के स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय (Autonomous State Medical College, Hardoi), जिसे आमतौर पर सरकारी मेडिकल कॉलेज हरदोई कहा जाता है, की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट था—जिले के भीतर ही उन्नत इलाज, जांच और आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध कराना, ताकि मरीजों को सीतापुर, लखनऊ या अन्य जिलों की ओर रेफरल के लिए मजबूर न होना पड़े। वर्ष 2021 के आसपास संचालित हुए इस मेडिकल कॉलेज में MBBS की वार्षिक 100 सीटों की व्यवस्था की गई।

लेकिन जमीनी स्तर पर उभरती जनशिकायतें—“हरदोई मेडिकल कॉलेज स्वयं अस्वस्थ है और कई अहम जांचों के लिए मरीजों को सीतापुर रेफर किया जा रहा है”—एक गहरी प्रणालीगत समस्या की ओर इशारा करती हैं। यहां मेडिकल कॉलेज का बोर्ड तो मौजूद है, लेकिन टीचिंग हॉस्पिटल के रूप में उसकी कार्यक्षमता कई विभागों और कई दिनों में भरोसेमंद साबित नहीं हो पा रही। ऐसे में रेफरल केवल चिकित्सकीय निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि प्रशासनिक शिथिलता, मानव संसाधन की कमी, उपकरणों की अनुपलब्धता और जवाबदेही के अभाव का संयुक्त परिणाम बन जाता है।

रेफरल का सच: मरीज क्यों हरदोई मेडिकल कॉलेज से सीतापुर भेजे जा रहे हैं?

चिकित्सा व्यवस्था में रेफरल अपने आप में गलत नहीं है। IPHS (Indian Public Health Standards) के अनुसार, मरीज को स्थिर करने के बाद आवश्यकता पड़ने पर उच्च केंद्र भेजना स्वीकार्य प्रक्रिया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हरदोई मेडिकल कॉलेज में रेफरल एक अपवाद है या रोजमर्रा की दिनचर्या बन चुका है।

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यदि बार-बार अहम जांचों के लिए मरीजों को सीतापुर भेजा जा रहा है, तो यह इस बात का संकेत है कि डायग्नोस्टिक सुविधाएं—जैसे CT, अल्ट्रासाउंड, लैब जांच, 24×7 रेडियोलॉजी—पूरी तरह कार्यात्मक नहीं हैं। इसके साथ ही ICU, ऑक्सीजन सप्लाई, बैकअप पावर, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियमित उपलब्धता भी सवालों के घेरे में आती है।

यही कारण है कि हरदोई मेडिकल कॉलेज रेफरल समस्या आम जनता के आक्रोश का कारण बनती जा रही है। सरकारी अस्पताल होने के बावजूद मरीजों को निजी जांच या दूसरे जिले की दौड़ लगानी पड़ रही है, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीब, ग्रामीण, वृद्ध, गर्भवती महिलाओं और दुर्घटना पीड़ितों पर पड़ता है।

जनशिकायतों का पैटर्न: अस्पताल नहीं, व्यवस्था कटघरे में

हरदोई मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े सरकारी अस्पताल को लेकर सोशल मीडिया, स्थानीय रिपोर्टों और जनसुनवाइयों में एक जैसी शिकायतें बार-बार सामने आती हैं—इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था पर भरोसा नहीं बनता। ICU में अव्यवस्था, बिजली और बैकअप की समस्या तथा मरीजों को निजी या बाहरी केंद्रों की ओर भेजने के आरोप लगातार उभरते हैं।

हालांकि सोशल मीडिया को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन जब शिकायतें लगातार एक ही दिशा में इशारा करें, तो वे किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चेतावनी बन जाती हैं। डॉक्टर की अनुपलब्धता, जांच की कमी, इमरजेंसी में जल्दबाजी में रेफरल और निजी अस्पतालों से कथित सांठगांठ जैसे आरोप गंभीर चिंता का विषय हैं।

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सरकारी प्रावधान बनाम जमीनी हकीकत

National Medical Commission के मानकों के अनुसार मेडिकल कॉलेज केवल इमारत नहीं होता। OPD, IPD, इमरजेंसी, ऑपरेशन थिएटर, ICU और डायग्नोस्टिक सेवाओं की निरंतरता अनिवार्य है। वहीं NHM और IPHS भी स्पष्ट करते हैं कि बार-बार रेफरल स्थानीय क्षमता निर्माण की विफलता को दर्शाता है।

रोगी कल्याण समिति (RKS) जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं शिकायत निवारण और जवाबदेही के लिए बनाई गई थीं, लेकिन व्यवहार में इनकी सक्रियता सीमित दिखाई देती है। यदि ये समितियां प्रभावी रूप से कार्य करें, तो हरदोई मेडिकल कॉलेज रेफरल समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

हरदोई से सीतापुर रेफरल की प्रमुख वजहें

जिला स्तरीय मेडिकल कॉलेज में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, CT, बुनियादी लैब जांच, ब्लड बैंक, ट्रॉमा और इमरजेंसी सेवाओं का लगातार उपलब्ध होना आवश्यक है। जब इनमें से कोई भी कड़ी कमजोर पड़ती है, तो मरीजों को मजबूरन सीतापुर रेफर किया जाता है, जहां अपेक्षाकृत बेहतर डायग्नोस्टिक नेटवर्क और निजी विकल्प मौजूद हैं।

मेडिकल कॉलेज: सीटों की गिनती या सेवाओं की गुणवत्ता?

उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों और MBBS सीटों का विस्तार सरकारी उपलब्धियों का हिस्सा है, लेकिन हरदोई की जनता सवाल सीटों का नहीं करती। सवाल यह है कि रात के समय इमरजेंसी सेवाएं उपलब्ध हैं या नहीं, जांच समय पर होती है या नहीं, और रेफरल से पहले मरीज को आवश्यक इलाज मिला या नहीं।

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निष्कर्ष: हरदोई की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा

हरदोई मेडिकल कॉलेज कागजों पर एक बड़ा अवसर है, लेकिन यदि अहम जांचों के लिए मरीजों को लगातार सीतापुर भेजा जा रहा है, तो यह पूरे जिला स्तरीय स्वास्थ्य मॉडल की परीक्षा है। सरकारी प्रावधान और बजट मौजूद हैं, अब सवाल यह है कि क्या ये व्यवस्थाएं वास्तव में अस्पताल की फर्श तक उतर पा रही हैं।

जिस दिन हरदोई के मरीज को इलाज के लिए बाहर नहीं भागना पड़ेगा, उस दिन मेडिकल कॉलेज अपनी असली भूमिका निभा पाएगा। यही किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज की वास्तविक पहचान है—जहां मरीज का भरोसा रेफरल पर्ची से बड़ा हो।

❓ पाठकों के सवाल — सीधे जवाब

क्या हरदोई मेडिकल कॉलेज में सभी जरूरी जांचें उपलब्ध हैं?

कागजी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई जांचों के लिए मरीजों को रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं।

मरीजों को सीतापुर क्यों भेजा जाता है?

डायग्नोस्टिक सुविधाओं, विशेषज्ञों और क्रिटिकल केयर की सीमाएं इसकी प्रमुख वजह मानी जाती हैं।

क्या यह समस्या केवल हरदोई तक सीमित है?

नहीं, यह उत्तर प्रदेश के कई नए जिला स्तरीय मेडिकल कॉलेजों में देखी जा रही एक संरचनात्मक समस्या है।


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