सड़कें बनी, भरोसा रास्ते में अटका ; विकास के आँकड़ों के बीच उठते सवाल

ग्रामीण इलाके में खराब सड़क पर फंसी एंबुलेंस, सड़क निर्माण कार्य और स्वास्थ्य संकट को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर



दुर्गा प्रसाद शुक्ला की खास रिपोर्ट
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बलरामपुर ज़िले में वर्ष 2024–25 का विकास यदि केवल फाइलों और आंकड़ों में देखा जाए, तो तस्वीर अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई देती है—सड़कें बनीं, मरम्मत हुई, करोड़ों रुपये खर्च हुए। लेकिन जब इन्हीं सड़कों को स्वास्थ्य सेवाओं की कसौटी पर परखा जाता है—जब एंबुलेंस की रफ्तार, गर्भवती महिला की समय पर अस्पताल तक पहुँच और दुर्घटना पीड़ित के गोल्डन आवर को आधार बनाया जाता है—तो विकास का यह दावा कई जगह सवालों के घेरे में आ खड़ा होता है। यह रिपोर्ट उन्हीं सवालों का दस्तावेज़ है, जहाँ निर्माण, व्यय और विवाद—तीनों एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।

पंचायत से ज़िला मुख्यालय तक: सड़क निर्माण का आधिकारिक खाका

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 2024–25 में बलरामपुर ज़िले में ग्रामीण और जिला स्तरीय सड़कों के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY), लोक निर्माण विभाग (PWD) और जिला पंचायत निधि—इन तीनों मदों से बड़े पैमाने पर कार्य स्वीकृत हुए।

ग्रामीण/पंचायत स्तर: लगभग 320–350 किमी नई सड़कों और संपर्क मार्गों का लक्ष्य तय हुआ, जिनमें से करीब 240–260 किमी कार्य पूर्ण दर्शाए गए।

ब्लॉक–तहसील मार्ग: 110–130 किमी सड़कों का सुदृढ़ीकरण और पुनःकार्पेटिंग दर्ज की गई।

जिला मार्ग: जिला मुख्यालय, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और प्रमुख बाज़ारों को जोड़ने वाले 35–40 किमी मार्गों पर मरम्मत कार्य हुआ।

वित्तीय स्थिति भी काग़ज़ों में संतोषजनक है—
कुल स्वीकृत राशि: ₹210–230 करोड़
व्यय दिखाया गया: ₹165–180 करोड़
औसत भौतिक प्रगति: 70–75%

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लेकिन यही औसत तब टूटने लगता है, जब अलग-अलग पंचायतों में सड़क की मोटाई, जल-निकासी और गुणवत्ता की शिकायतें सामने आती हैं।

जहाँ सड़कें बनीं, वहीं विवाद भी खड़े हो गए

इस एक वर्ष में सड़क निर्माण और मरम्मत से जुड़े 30–32 कार्य सीधे तौर पर विवादों में फँसे। इन विवादों को यदि श्रेणीबद्ध किया जाए, तो तस्वीर और साफ़ होती है—

भूमि/सीमांकन विवाद: 9 मामले
गुणवत्ता/मानक विवाद: 13–14 मामले
भुगतान/ठेकेदारी व समयसीमा विवाद: 6–7 मामले

यानी, हर पाँच में से एक सड़क C-ग्रेड श्रेणी में पहुँच गई—जिसका सीधा असर उपयोगिता पर पड़ा।

विवादों में फँसे प्रमुख कार्य: स्थान और कारण

उतरौला विकासखंड की ग्राम पंचायत मनवरिया में PMGSY के तहत स्वीकृत ₹1.92 करोड़ की सड़क पहली ही बरसात में उखड़ने लगी। जांच में सब-ग्रेड की मोटाई मानक से कम पाई गई। पंचायत ने माप-जोख (MB) पर सवाल उठाए, जिसके बाद भुगतान रोक दिया गया और कार्य C-ग्रेड में दर्ज हो गया।

गैसड़ी विकासखंड के धौरहरा में PWD द्वारा मरम्मत की गई ब्लॉक लिंक रोड पर ₹78 लाख खर्च दिखाया गया, लेकिन सड़क की चौड़ाई को लेकर दो किसानों ने भूमि विवाद खड़ा कर दिया। सीमांकन स्पष्ट न होने से मामला तहसील स्तर पर अटक गया और सड़क उपयोग में बाधा बनी हुई है।

तुलसीपुर के बेलवा में पंचायत निधि से बनी इंटरलॉकिंग सड़क की ईंटों की गुणवत्ता जांच में मानक से कम पाई गई। स्थानीय सदस्यों ने आरोप लगाया कि स्वीकृत सामग्री के बजाय सस्ती स्थानीय सामग्री का उपयोग हुआ। नतीजा—भुगतान लंबित और कार्य ठप।

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श्रीदत्तगंज के लालपुर में स्वास्थ्य केंद्र को जोड़ने वाली सड़क पर ₹1.15 करोड़ की लागत से काम शुरू हुआ, लेकिन ड्रेनेज की व्यवस्था न होने से बरसात में सड़क जलमग्न हो गई। नक्शे में नाली दर्ज थी, ज़मीन पर नहीं। पुनः डिज़ाइन और अतिरिक्त बजट की फाइल अब भी लंबित है।

पचपेड़वा के सोनपुर में सड़क नवीनीकरण के बाद जलभराव ने नया विवाद खड़ा कर दिया। सड़क ऊँची बनी, किनारे नाली नहीं—पानी सीधे घरों में जाने लगा। ग्रामीणों की आपत्ति के बाद हैंडओवर रुका हुआ है।

हरैया सतघरवा के मझौवा में स्वास्थ्य उपकेंद्र तक जाने वाला मार्ग समयसीमा से चार माह पीछे चल रहा है। ठेकेदार ने मौसम को कारण बताया, विभाग ने शर्तों के उल्लंघन की बात कही। दंडात्मक कार्रवाई पर निर्णय ज़िला स्तर पर अटका है।

बलरामपुर सदर क्षेत्र में जिला योजना मद से बनी परिधि सड़क पर ₹2.35 करोड़ खर्च दिखाया गया, लेकिन री-कार्पेटिंग की मोटाई कम होने से भारी वाहनों के दबाव में सतह बैठने लगी। नगर और ग्रामीण सीमा की जिम्मेदारी तय न होने से भुगतान आंशिक है।

सड़क और स्वास्थ्य: आँकड़ों से परे हकीकत

इन विवादित सड़कों का सबसे गहरा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा। कई पंचायतों में एंबुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम 20–25 मिनट के लक्ष्य से बढ़कर 45–60 मिनट तक पहुँच गया। गर्भवती महिलाओं के संस्थागत प्रसव में देरी के अनौपचारिक मामले सामने आए, और दुर्घटनाओं में गोल्डन आवर कई बार केवल अवधारणा बनकर रह गया।

“मुख्य सड़क बन जाती है, लेकिन अस्पताल तक की आख़िरी दो-तीन किलोमीटर की कड़ी ही सबसे कमजोर रह जाती है।”

— एक ब्लॉक स्तर के चिकित्साधिकारी

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प्रशासनिक दावा बनाम ज़मीनी पड़ताल

प्रशासन का कहना है कि सीमित संसाधनों और मौसम की चुनौतियों के बावजूद प्रगति संतोषजनक है। पर ज़मीनी पड़ताल बताती है कि निगरानी, पूर्व-योजना और पंचायत सहभागिता में खामियाँ हैं। सामाजिक ऑडिट काग़ज़ों में दर्ज है, पर उसका असर सीमित दिखता है।

विकास की सड़क, भरोसे की दरार

यह संयुक्त रिपोर्ट साफ़ संकेत देती है कि बलरामपुर में सड़क निर्माण की समस्या केवल धन या लक्ष्य की नहीं, बल्कि प्रक्रिया और प्राथमिकता की है। जब तक स्वास्थ्य केंद्रों तक जाने वाले मार्गों को सामान्य सड़कों से अलग, जीवन-मार्ग मानकर नहीं देखा जाएगा—तब तक ये विवाद केवल फाइलों में नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी में अटके रहेंगे।

बलरामपुर की सड़कें बताती हैं कि विकास हुआ है—लेकिन यह भी कि कई जगह वह विकास समय पर और भरोसे के साथ पहुँच नहीं पाया। यही इस दस्तावेज़ की सबसे बड़ी सच्चाई है।

पाठकों के सवाल

❓ क्या सड़क निर्माण के विवादों का असर सीधे स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है?

✔️ हाँ। एंबुलेंस की देरी, गर्भवती महिलाओं के समय पर अस्पताल न पहुँच पाने और
दुर्घटनाओं में गोल्डन आवर के नुकसान जैसे मामले इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

❓ क्या सभी विवाद केवल गुणवत्ता से जुड़े हैं?

✔️ नहीं। भूमि सीमांकन, भुगतान, ठेकेदारी प्रक्रिया, समयसीमा और प्रशासनिक समन्वय
की कमी भी प्रमुख कारण हैं।

❓ समाधान की सबसे अहम कड़ी क्या है?

✔️ स्वास्थ्य केंद्रों तक जाने वाली सड़कों को सामान्य परियोजना नहीं,
बल्कि जीवन-मार्ग मानकर प्राथमिकता देना और उनकी निरंतर निगरानी।

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