चौपाल का सवाल: ग्राम पंचायत में महिला प्रधान का चयन लोकतंत्र की जीत है या रिमोट कंट्रोल प्रतिनिधित्व की कहानी? पढ़िए व्यंग्य जो हँसी के बाद सोचने पर मजबूर करता है।
सुबह की चाय पर बैठे थे हम… मैंने पूछा — “इस बार ग्राम पंचायत में बड़ा बदलाव आया है न?” वह हँसा — “बदलाव त आ गवा है… बाकिर देखीं, बदली का पइसा केकरा लगे गिरत है।” मैं मुस्कुराया। प्रधान जी कम बोलती हैं। फाइलें चलती हैं। दस्तख़त होते हैं। चौपाल पर किसी ने कहा, “अरे भइया, काम त ठाठ से होत है।” दूसरा बोला — “हाँ, काम त होत है… बस ई बतावा, हुकुम कउन चलावत है?” हल्की हँसी। मैंने उससे पूछा — “निर्णय कौन लेता है?” वह बोला — “कागज प कलम प्रधान जी के हाथ मा है… बाकिर बात सुने के कान कउनो अउर के हैं।” मैंने चाय नीचे रख दी। शाम की चौपाल। एक बुज़ुर्ग बोले — “देखा बेटा, औरत प्रधान बन गई — ई बहुत अच्छी बात है। बाकिर अगर ओकरा पीछे से ‘बतावा-बतावी’ जादे होई, त समझ ल्या, खेल अबहिन पुरान वाला है।” हँसी उठी। फिर थोड़ी देर में खुद ही थम गई। किसी नौजवान ने मज़ाक में कहा — “प्रधान जी मुस्की मारत रहिन… बाकिर फाइल त झटपट दूसर दुआर से घूम के आवत रही!” इस बार ठहाका ज़ोर का था। फिर वही बुज़ुर्ग धीरे बोले — “लोकतंत्र मा चेहरा बदले से काम नाहीं चलत… दिमाग बदले के चाही।” तो वह मुस्कुराकर बोलेगा — “हाँ, ई बात त साँच है।” प्रधान जी अब भी मुस्कुरा रही हैं। चौपाल अब भी लगती है। फाइलें अब भी चलती हैं। पर उस दिन जाते-जाते मेरा वह दोस्त धीमे से बोला— “देखा यार… गाँव बदले के पहले सोच बदले के चाही। नइं त बस कुर्सी बदले से का होई?” मैंने पूछा — “तो उम्मीद?” वह बोला — “उम्मीद त है… जब प्रधान जी खुद बोले लगिहें, और लोग चुप हो जइहें।” चौपाल में हवा चली। हँसी इस बार नहीं उठी। बस कुछ चेहरों पर सोच उतर आई। और दूर कहीं, किसी बच्चे की आवाज़ आई— “अम्मा, अबकी सचमुच प्रधान आप हो न?” प्रधान जी ने पहली बार सिर उठाकर देखा। मुस्कान वही थी। पर आँखों में इस बार हल्की-सी चमक थी। शायद कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
व्यक्ति से ऊपर प्रवृत्ति
चौपाल सिर्फ़ एक गाँव का दृश्य नहीं है। वह भारत की सबसे छोटी लोकतांत्रिक इकाई का प्रतीक है। वहीं से समाज की नसें समझ में आती हैं। जब हम ग्राम पंचायत की बात करते हैं, तो असल में हम प्रतिनिधित्व, सत्ता-संरचना और सामाजिक चेतना की बात कर रहे होते हैं। समस्या किसी महिला प्रधान, किसी पुरुष पूर्व प्रधान या किसी विशेष गाँव की नहीं है। समस्या तब है जब सत्ता संरचनाएँ बदलने का अभिनय करती हैं, पर नियंत्रण वही रहता है। यह पैटर्न पंचायत से लेकर संसद तक दिखाई दे सकता है।
प्रतिनिधित्व बनाम सशक्तिकरण
आरक्षण, अवसर, नई भागीदारी — ये सब ऐतिहासिक सुधार हैं। लेकिन सशक्तिकरण का असली अर्थ है निर्णय लेने की क्षमता और स्वतंत्रता। यदि प्रतिनिधि निर्णय लेने में स्वतंत्र नहीं, तो लोकतंत्र अधूरा है।
समाज की जिम्मेदारी
हम अक्सर कहते हैं “व्यवस्था खराब है।” पर व्यवस्था बनाता कौन है? चौपाल की चुप्पी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कोई प्रभावशाली व्यक्ति। जब तक समाज सवाल नहीं पूछेगा, तब तक बदलाव आधा ही रहेगा। अब चौपाल की चिंता गाँव से निकलकर जिले में जाती है। जिले से प्रदेश में। प्रदेश से देश में। क्या हम सच में सक्षम नेतृत्व चाहते हैं? या हमें बस परिचित चेहरों के पीछे सुरक्षित महसूस करना आसान लगता है?
गंभीरता यहीं से शुरू होती है
व्यंग्य हमें हँसाकर यह पूछता है— क्या हम सच में बदलना चाहते हैं? या सिर्फ़ बदलाव की कहानी सुनना चाहते हैं? जब हँसी उतर जाए और प्रश्न बच जाए, वहीं से सामाजिक आत्मपरीक्षण शुरू होता है। आत्मपरीक्षण हमेशा चौपाल से शुरू होता है — क्योंकि वहीं लोग आमने-सामने बैठते हैं।
FAQ
क्या महिला प्रधान का चयन सशक्तिकरण की गारंटी है?
नहीं। सशक्तिकरण का अर्थ केवल पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और अधिकार भी है।
रिमोट कंट्रोल प्रतिनिधित्व क्या होता है?
जब चुना गया प्रतिनिधि नाममात्र का हो और वास्तविक निर्णय किसी अन्य प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा लिए जाएँ, तो उसे रिमोट कंट्रोल प्रतिनिधित्व कहा जाता है।
क्या यह समस्या केवल ग्राम पंचायत तक सीमित है?
नहीं। प्रतिनिधित्व बनाम वास्तविक नियंत्रण का प्रश्न पंचायत से लेकर उच्च स्तर की राजनीति तक देखा जा सकता है।

