
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम इन दिनों प्रयागराज माघ मेले से जुड़े प्रशासनिक टकराव, धार्मिक अधिकारों और शंकराचार्य पद से संबंधित कानूनी विवाद के कारण राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर प्रशासन और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के बीच उपजा विवाद अब केवल एक आयोजन-प्रबंधन का प्रश्न नहीं रह गया, बल्कि यह आस्था, परंपरा, सत्ता और संवैधानिक अधिकारों के टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है। चार दिन बीत जाने के बाद भी यह मामला शांत नहीं हुआ है, बल्कि बयानबाज़ी, नोटिस और आरोप-प्रत्यारोप के बीच और तीखा हो गया है।
माघ मेले से शुरू हुआ विवाद, बवाल में बदला
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन आमने-सामने आ गए। रथ पर या पैदल संगम घाट तक जाने की अनुमति को लेकर उपजे इस टकराव के बाद स्थिति इतनी बिगड़ी कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पुलिस पर भगदड़ मचाकर उनकी हत्या की साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप लगा दिए। उनका कहना है कि प्रशासन ने जानबूझकर उन्हें ऐसे स्थान पर छोड़ा, जहां अव्यवस्था फैल सकती थी। चार दिनों से वे वहीं डटे हुए हैं, जहां पुलिस उन्हें छोड़कर गई थी।
इस बीच प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा कि वे स्वयं को शंकराचार्य क्यों कहते हैं। इसके जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमे का हवाला देते हुए नोटिस को अवमाननापूर्ण बताया और 24 घंटे में वापस लेने का अल्टीमेटम दे दिया।
संत समाज और राजनीति में बंटी राय
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच चल रहे इस टकराव पर संत समाज भी एकमत नहीं है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने स्पष्ट कहा कि रथ पर बैठकर स्नान के लिए जाना शास्त्रसम्मत नहीं है, जबकि कई संत इसे सनातन परंपराओं का अपमान बता रहे हैं। राजनीतिक दलों ने भी इस विवाद को अपने-अपने चश्मे से देखा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इस मुद्दे को सक्रियता से उठाकर भारतीय जनता पार्टी को घेरने में जुटे हैं।
दिलचस्प तथ्य यह है कि वर्ष 2015 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान भी उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का टकराव हुआ था। उस समय उनके साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया था, जिसके बाद स्वयं अखिलेश यादव ने उनसे मिलकर माफी मांगी थी, ऐसा स्वामी का दावा रहा है।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से छात्र राजनीति तक
बहुत कम लोग जानते हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हमेशा से संत जीवन में नहीं थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। उनका मूल नाम उमाशंकर पांडेय था। बचपन से ही धर्म और शास्त्रों में रुचि रखने वाले उमाशंकर की प्रारंभिक शिक्षा सामान्य विद्यालयों में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे गुजरात गए, जहां उनकी मुलाकात स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुई।
इसी संगति ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे संस्कृत, वेद, पुराण और उपनिषदों के गंभीर अध्ययन में जुट गए। इसके बाद वे वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय पहुंचे, जहां से उन्होंने शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त की। यहीं से उनके जीवन का एक अहम अध्याय शुरू हुआ—छात्र राजनीति।
वाराणसी में पढ़ाई के दौरान उमाशंकर पांडेय ने छात्रसंघ राजनीति में कदम रखा और वर्ष 1994 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया। यह तथ्य उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को उजागर करता है, जो संघर्ष, नेतृत्व और टकराव से पीछे हटने वाला नहीं रहा है।
संन्यास की ओर बढ़ता कदम
गुजरात में रहते हुए उमाशंकर पांडेय स्वामी करपात्री महाराज के सान्निध्य में आए। शास्त्रों में पारंगत होने के बाद उन्होंने संन्यास का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। करपात्री महाराज की बीमारी के समय उन्होंने उनकी सेवा की। इसी दौरान उनका संपर्क ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ। यह संबंध गुरु-शिष्य परंपरा में परिवर्तित हो गया।
ब्रह्मचर्य दीक्षा के बाद उमाशंकर पांडेय का नाम बदलकर ब्रह्मचारी आनंद स्वरूप हुआ। आगे चलकर दंडी दीक्षा प्राप्त करने के बाद वे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कहलाए। वर्ष 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित किया गया, हालांकि उनकी इस पदवी को लेकर कानूनी विवाद आज भी न्यायालय में लंबित है।
धर्म से आगे समाज और राजनीति तक
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं रहे हैं। वे गंगा संरक्षण, गौहत्या निषेध और गो-रक्षा जैसे मुद्दों पर लंबे समय से मुखर रहे हैं। मंदिरों में साईं बाबा की मूर्ति स्थापना के वे प्रखर विरोधी रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने खुले तौर पर मतदाताओं से अपील की थी कि वे उसी उम्मीदवार को वोट दें, जो गो-रक्षा का संकल्प ले।
लोकसभा चुनाव 2024 से पहले राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर भी उन्होंने विवादित बयान दिया। उनका कहना था कि अधूरे मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रसम्मत नहीं है। इस बयान ने उन्हें राजनीतिक और धार्मिक बहसों के केंद्र में ला खड़ा किया।
राजनीतिक नजरिया और वैचारिक पहचान
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को कांग्रेस समर्थक संत के रूप में देखा जाता रहा है और उसी वैचारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर भी माना जाता है। हालांकि वे स्वयं किसी दल विशेष से जुड़ाव से इनकार करते हैं, लेकिन उनके बयान अक्सर सत्ताधारी दलों के लिए असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। इसी कारण उन्हें कई बार राजनीतिक चश्मे से भी देखा जाता है।
उनके समर्थक उन्हें धर्म और संविधान के बीच संतुलन साधने वाला संत मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें टकराव की राजनीति करने वाला चेहरा बताते हैं।
संघर्षशील व्यक्तित्व की पहचान
छात्रसंघ अध्यक्ष से लेकर शंकराचार्य पद तक का सफर यह दर्शाता है कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का व्यक्तित्व हमेशा संघर्षशील और मुखर रहा है। चाहे वह विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति हो, संत समाज के भीतर वैचारिक मतभेद हों या प्रशासन के साथ सीधा टकराव—वे पीछे हटने वालों में नहीं रहे।
प्रयागराज माघ मेले का मौजूदा विवाद इसी व्यक्तित्व का नवीनतम उदाहरण है। यह प्रकरण आगे किस दिशा में जाएगा, यह न्यायालय, प्रशासन और संत समाज की भूमिका पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भारतीय धार्मिक और सामाजिक विमर्श में एक प्रभावशाली और विवादास्पद नाम बने रहेंगे।
FAQ
क्या अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती छात्रसंघ अध्यक्ष रहे हैं?
हाँ, वे 1994 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए थे।
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मूल नाम क्या था?
उनका मूल नाम उमाशंकर पांडेय था।
शंकराचार्य पद को लेकर विवाद क्यों है?
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिस कारण उनकी पदवी को लेकर कानूनी विवाद बना हुआ है।










