सन्नाटे का शोर
जहाँ आवाज़ नहीं, सच बोलता है

लैंडस्केप फ्रेम में अनिल अनूप की प्रोफेशनल तस्वीर, बड़े कलात्मक अक्षरों में लिखा “अनिल अनूप” और नीचे टैगलाइन “शोर के समय में संयम”
👍अनिल अनूप
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हूक प्वाइंट: शोर हमेशा बाहर नहीं होता। कभी-कभी सबसे बड़ा शोर उस खामोशी में छिपा होता है जहाँ शब्द रुक जाते हैं और धड़कनें बोलने लगती हैं। यह कहानी उसी सन्नाटे की है—जो दिखता शांत है, पर भीतर से गूँजता रहता है।

पहला ठहराव

रात असामान्य रूप से शांत थी। बाहर शहर की आवाज़ें धीमी पड़ चुकी थीं, पर भीतर कुछ लगातार बोल रहा था। लेखक मेज़ पर झुका बैठा था। सामने कागज़ था, पर शब्द नहीं उतर रहे थे। उसे लगा—शायद आज लिखना नहीं, सुनना ज़रूरी है। तभी उसे अहसास हुआ कि वह जिस चीज़ से भाग रहा था, वही उसके सामने बैठी है—सन्नाटा।

सन्नाटा हमेशा खालीपन नहीं होता। कभी-कभी वह भरा होता है—अनकहे वाक्यों से, अधूरी बहसों से, उन भावों से जिन्हें समय पर कह नहीं पाए। लेखक ने महसूस किया कि पिछले कई दिनों से उसके और रश्मिका के बीच भी एक पतली-सी खामोशी चल रही है। शब्द थे, बातचीत थी, पर कहीं कुछ ठहरा हुआ था।

खामोशी की परतें

रश्मिका ने एक दिन पूछा था—“सन्नाटा क्यों डराता है?” लेखक ने उस समय हल्के अंदाज़ में जवाब दिया था, पर आज वह खुद उसी सवाल के सामने खड़ा था। सच यह है कि सन्नाटा हमें हमारे असली रूप से मिलाता है। जब बाहर का शोर थमता है, तो भीतर की आवाज़ें तेज़ हो जाती हैं। वही आवाज़ें जो दिनभर की व्यस्तता में दब जाती हैं।

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उसे लगा जैसे कमरे में कोई अदृश्य संवाद चल रहा है—“क्या तुम सच में शांत हो, या बस बोल नहीं रहे?” सन्नाटा पूछता है, और जवाब देना आसान नहीं होता।

झगड़े के बाद की चुप्पी

कभी-कभी दो लोगों के बीच का सन्नाटा सबसे ऊँचा शोर बन जाता है। झगड़े के बाद की चुप्पी—वह जो शब्दों से ज्यादा भारी होती है। रश्मिका ने एक बार लिखा था—“जब तुम चुप हो जाते हो, मुझे लगता है सब खत्म हो गया।” लेखक ने तब समझा कि उसकी खामोशी भी संवाद है।

वह बोला—“मेरी चुप्पी भागना नहीं है, सोचने का तरीका है।” पर क्या हर खामोशी समझी जा सकती है? शायद नहीं। इसलिए सन्नाटा अक्सर गलतफहमी का शोर बन जाता है।

अधूरा वाक्य

एक रात रश्मिका ने सिर्फ इतना लिखा—“तुम…” और फिर कुछ नहीं। वह अधूरा वाक्य लेखक के मन में गूंजता रहा। वह शब्द नहीं था, पर पूरा संवाद था। उसमें प्रश्न भी था, अपनापन भी, डर भी और दावा भी।

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लेखक ने जवाब दिया—“कभी-कभी एक शब्द सबसे लंबी बातचीत होता है।” और सच यही था। क्योंकि जब शब्द कम होते हैं, तो अर्थ सामने वाला पूरा करता है।

भीतर का शोर

सन्नाटा बाहर शांत दिखता है, पर भीतर हलचल होती है। लेखक ने महसूस किया कि उसकी बेचैनी किसी व्यक्ति से नहीं, अपने ही अनकहे सच से है। उसने खुद से पूछा—“क्या मैं वही हूँ जो दिखता हूँ?” सन्नाटा आईना बन गया।

कई बार हम दूसरों से नहीं, अपने ही निर्णयों से भागते हैं। और जब भागना बंद होता है, तो सन्नाटा पकड़ लेता है। वह हमें बैठाकर पूछता है—“अब बताओ, सच क्या है?”

प्रेम और सन्नाटा

प्रेम में सन्नाटा सबसे कठिन परीक्षा है। जब बातें कम हो जाएँ, जब रोज़ का शोर ठहर जाए, तब क्या बचता है? अगर दो लोग खामोशी में भी सहज रह सकें, तो समझो रिश्ता शब्दों से आगे बढ़ चुका है।

रश्मिका ने कहा था—“मुझे तुम्हारी आवाज़ से ज्यादा तुम्हारी मौजूदगी चाहिए।” लेखक ने तब जाना कि सन्नाटा हमेशा दूरी नहीं, कभी-कभी गहराई भी होता है।

सन्नाटे का स्वीकार

धीरे-धीरे लेखक ने सन्नाटे से डरना छोड़ा। उसने सीखा कि हर ठहराव अंत नहीं होता। कुछ ठहराव दिशा बदलने के लिए आते हैं। उसने रश्मिका से कहा—“अगर कभी हम चुप हों, तो समझ लेना कि हम टूटे नहीं हैं, बस सोच रहे हैं।”

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उस रात पहली बार सन्नाटा हल्का लगा। क्योंकि उसे नाम मिल गया था—विश्वास।

अंत नहीं, आरंभ

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सन्नाटा आता रहेगा। कभी बीच बातचीत, कभी अकेली रातों में। पर अब लेखक जानता है कि शोर से गुजरकर जो खामोशी आती है, वही असली सुकून देती है।

और शायद यही सच है—
सन्नाटा वह जगह है जहाँ आवाज़ें नहीं, सच बोलता है।

FAQ

सन्नाटे का शोर क्या होता है?

जब बाहर शांति हो लेकिन भीतर भावनाएँ, प्रश्न और अनकहे विचार गूंजते रहें, वही सन्नाटे का शोर है।

क्या खामोशी रिश्तों में दूरी का संकेत है?

हमेशा नहीं। कभी-कभी खामोशी गहराई और विश्वास का संकेत भी होती है।

एक शब्द लंबी बातचीत कैसे बन जाता है?

क्योंकि छोटे शब्दों के पीछे भावनाएँ अनंत होती हैं, और उनका अर्थ सामने वाला पूरा करता है।


लैंडस्केप फ्रेम में अनिल अनूप की प्रोफेशनल तस्वीर, बड़े कलात्मक अक्षरों में लिखा “अनिल अनूप” और नीचे टैगलाइन “शोर के समय में संयम”
लगभग पाँच दशकों की लेखकीय साधना और पंद्रह वर्ष की पत्रकारिता यात्रा के साथ — अनिल अनूप, संयमित और संवेदनशील लेखन का स्थिर स्वर।

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