सीतापुर सड़क निर्माण विवाद एक बार फिर ग्रामीण बुनियादी ढांचे, प्रशासनिक योजना और जन-भागीदारी के टकराव को उजागर करता है। हरगांव विकास खंड के बेलमाऊ कला गांव में लोक निर्माण विभाग द्वारा कराए जा रहे सड़क निर्माण कार्य को उस समय सैकड़ों ग्रामीणों ने रोक दिया, जब उनकी मांग—“सड़क से पहले नाली”—को नजरअंदाज किया गया। यह विरोध केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही जलनिकासी समस्या, अधूरी योजनाओं और भरोसे की कमी का परिणाम है।
ग्रामीणों का विरोध: नाली के बिना सड़क का क्या अर्थ?
मंगलवार को जैसे ही सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ, गांव के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए। ग्रामीणों का कहना था कि पूर्व में भी सड़क बनी, लेकिन नाली न होने के कारण बरसात के दिनों में पानी घरों में घुस जाता है। सड़क ऊंची हो जाती है और पानी निकलने का रास्ता बंद हो जाता है, जिससे कीचड़, गंदगी और बीमारी फैलती है। ग्रामीणों का तर्क साफ था—यदि नाली नहीं बनी, तो सड़क उनके लिए सुविधा नहीं बल्कि नई परेशानी बन जाएगी।
दो घंटे तक चला तनावपूर्ण संवाद
ग्रामीणों और ठेकेदार के बीच करीब दो घंटे तक बहस चलती रही। ठेकेदार का कहना था कि उसे विभागीय स्वीकृति के अनुसार केवल सड़क का निर्माण करना है, नाली उसके कार्यक्षेत्र में नहीं आती। वहीं ग्रामीण इस दलील को मानने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि पहले भी इसी तरह आधा-अधूरा काम हुआ और आज तक उसकी कीमत गांव भुगत रहा है।
मौके पर पहुंचे विभागीय अधिकारी
सूचना मिलने पर लोक निर्माण विभाग के अवर अभियंता अभिषेक वर्मा और जूनियर अभियंता नीरज यादव मौके पर पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की कि नाली निर्माण के लिए अलग योजना और स्वीकृति की आवश्यकता होती है। अधिकारियों का कहना था कि सड़क निर्माण रुकने से लागत बढ़ेगी और कार्य में देरी होगी।
हालांकि ग्रामीणों का आक्रोश कम नहीं हुआ। बातचीत के दौरान तीखी नोक-झोंक भी हुई। स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए इमलिया सुल्तानपुर पुलिस टीम को मौके पर बुलाना पड़ा। पुलिस ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की।
पूरे दिन ठप रहा निर्माण कार्य
ग्रामीण अपनी मांग पर अड़े रहे, जिसके कारण मंगलवार को पूरे दिन सड़क निर्माण कार्य पूरी तरह बंद रहा। अवर अभियंता अभिषेक वर्मा ने बताया कि समझाने के बावजूद ग्रामीण नाली निर्माण की जिद पर अड़े रहे और सरकारी कार्य को आगे नहीं बढ़ने दिया। विभागीय स्तर पर अब उच्च अधिकारियों को स्थिति से अवगत कराने की तैयारी की जा रही है।
यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं
सीतापुर सड़क निर्माण विवाद दरअसल ग्रामीण भारत में विकास की उस बड़ी तस्वीर को दिखाता है, जहां योजनाएं कागज पर तो पूरी होती हैं, लेकिन जमीनी जरूरतें अनसुनी रह जाती हैं। सड़क और नाली एक-दूसरे से जुड़े हुए ढांचे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना समुचित जलनिकासी के सड़क का टिकाऊ होना मुश्किल है। बरसात में पानी जमा होने से सड़क की उम्र घटती है और सरकारी धन की बर्बादी होती है।
ग्रामीणों का सवाल: जवाबदेही किसकी?
ग्रामीणों का कहना है कि हर बार उनसे धैर्य रखने को कहा जाता है, लेकिन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता। वे पूछते हैं कि यदि सड़क निर्माण के समय नाली की योजना नहीं बनेगी, तो बाद में कौन सुनेगा? क्या हर बार सड़क बनने के बाद आंदोलन करना पड़ेगा?
प्रशासन के सामने चुनौती
प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर विकास कार्य को समय पर पूरा करना, दूसरी ओर ग्रामीणों की वास्तविक जरूरतों को संबोधित करना। यदि नाली निर्माण को लेकर स्पष्ट आश्वासन और समयबद्ध योजना सामने आती है, तो संभव है कि गतिरोध टूटे। अन्यथा यह विवाद आगे भी तूल पकड़ सकता है।
निष्कर्ष: विकास संवाद से होगा, टकराव से नहीं
सीतापुर सड़क निर्माण विवाद यह बताता है कि विकास केवल ईंट-पत्थर का काम नहीं, बल्कि विश्वास और संवाद की प्रक्रिया है। जब तक योजनाएं स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नहीं बनेंगी और लोगों को साथ लेकर नहीं चला जाएगा, तब तक ऐसे विरोध सामने आते रहेंगे। बेलमाऊ कला की यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है और अवसर भी—नीतियों को जमीन से जोड़ने का।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
ग्रामीणों ने सड़क निर्माण क्यों रोका?
ग्रामीणों का कहना है कि नाली बनाए बिना सड़क बनने से जलनिकासी की समस्या और बढ़ेगी, इसलिए पहले नाली निर्माण जरूरी है।
लोक निर्माण विभाग का क्या पक्ष है?
विभाग का कहना है कि वर्तमान स्वीकृति केवल सड़क निर्माण की है, नाली के लिए अलग योजना और बजट की आवश्यकता होगी।
क्या भविष्य में समाधान निकल सकता है?
यदि प्रशासन नाली निर्माण को लेकर स्पष्ट आश्वासन और समयसीमा तय करता है, तो विवाद सुलझ सकता है।








