कुछ लोग ख़बर नहीं बनते, दिशा बनाते हैं —ऑखिलेश ‘दादा’ और एक संतुलित आवाज़ की विदाई

हरदोई के वरिष्ठ पत्रकार ऑखिलेश ‘दादा’ लेखन करते हुए, संतुलित पत्रकारिता और मार्गदर्शन का प्रतीकात्मक दृश्य।

अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट

हरदोई। पत्रकारिता जगत और शिक्षा क्षेत्र के लिए यह अत्यंत दुःखद समाचार है कि डाल सिंह मेमोरियल स्कूल के प्रबंधक एवं वरिष्ठ समाजसेवी-पत्रकार ऑखिलेश ‘दादा’ का निधन हो गया। उनके निधन से हरदोई ने एक संवेदनशील मार्गदर्शक, संतुलित पत्रकार और समाज के प्रति समर्पित व्यक्तित्व को खो दिया है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोक संतप्त परिजनों को यह दुःख सहने की शक्ति दें।

ऑखिलेश ‘दादा’ का जीवन इस बात का प्रमाण है कि बड़ा बनने के लिए ऊँचा बोलना नहीं, सही होना ज़रूरी है। उनकी स्मृति हरदोई की पत्रकारिता, शिक्षा और युवा चेतना में लंबे समय तक जीवित रहेगी।

संक्षिप्त परिचय और जीवन-परिचय

ऑखिलेश ‘दादा’ केवल एक नाम नहीं थे, बल्कि हरदोई के सामाजिक-पत्रकारितात्मक जीवन में एक जीवित संदर्भ थे। सरल व्यवहार, सदा मुस्कराता चेहरा और संवादप्रिय स्वभाव उनकी पहचान रहा। वे ऐसे व्यक्तित्व थे जिनके साथ बैठना, सुनना और बात करना—अपने आप में सीख का अनुभव होता था।

उनका जीवन किसी बड़े मंच या प्रचार का मोहताज नहीं रहा; वे जमीन से जुड़े, लोगों से जुड़े और मुद्दों से जुड़े व्यक्ति थे। यही कारण है कि वे पत्रकारिता, शिक्षा और सामाजिक सरोकार—तीनों क्षेत्रों में समान रूप से सम्मानित रहे।

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हरदोई की पत्रकारिता में योगदान

हरदोई की पत्रकारिता में ऑखिलेश ‘दादा’ को एक मजबूत स्तंभ के रूप में याद किया जाएगा। वे उस दौर के प्रतिनिधि थे, जब पत्रकारिता का अर्थ केवल ख़बर लिखना नहीं, बल्कि समाज के साथ खड़ा होना होता था।

उन्होंने स्थानीय मुद्दों को गंभीरता से उठाया। युवा पत्रकारों को रिपोर्टिंग, भाषा और दृष्टि का सही अर्थ समझाया। पत्रकारिता को उन्होंने व्यवसाय नहीं, जिम्मेदारी की तरह जिया।

उनकी पहचान किसी एक अख़बार या संस्थान से अधिक, उनकी विश्वसनीयता और संतुलन से बनी। वे न तो उत्तेजना के पक्षधर थे और न ही सत्ता-समीपता के। यही कारण है कि उनकी बात को सुना जाता था—क्योंकि उसमें शोर नहीं, सार होता था।

डाल सिंह मेमोरियल स्कूल से जुड़ी शैक्षिक और सामाजिक भूमिका

डाल सिंह मेमोरियल स्कूल के प्रबंधक के रूप में ऑखिलेश ‘दादा’ ने शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए स्कूल, चरित्र निर्माण का स्थान था, अनुशासन और संवाद का संतुलन था तथा सामाजिक जिम्मेदारी की पहली प्रयोगशाला था।

वे मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों—तीनों के बीच वे सेतु की तरह थे। स्कूल उनके लिए संस्था नहीं, परिवार था।

युवाओं के मार्गदर्शन में विचारधारा और कार्यशैली

ऑखिलेश ‘दादा’ की सबसे बड़ी पूंजी उनका युवाओं से संवाद था। वे उपदेश नहीं देते थे—वे सुनते थे, समझाते थे और भरोसा देते थे। उनकी विचारधारा में आत्मसम्मान था, धैर्य था और आगे बढ़ने की सकारात्मक जिद थी।

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वे कहते थे, “गलतियों से मत डरो, लेकिन गलत रास्ते को सही मत ठहराओ।” यही कारण है कि पत्रकारिता, शिक्षा और समाज—तीनों क्षेत्रों के कई युवा आज भी स्वयं को उनका शिष्य मानते हैं।

सहकर्मियों और पत्रकार जगत की स्मृतियाँ व प्रतिक्रियाएँ

उनके निधन की खबर ने पत्रकारिता जगत को अचानक मौन में डाल दिया। सहकर्मियों की प्रतिक्रिया में एक बात समान रही—“वे हमेशा मार्गदर्शक रहे, प्रतिस्पर्धी कभी नहीं।”

कई वरिष्ठ पत्रकारों ने उन्हें संस्थागत स्मृति कहा, तो युवाओं ने संघर्ष के समय का सहारा। उनकी अनुपस्थिति केवल एक व्यक्ति की कमी नहीं है, बल्कि एक संतुलित आवाज़ का सन्नाटा है।

श्रद्धांजलि

ऑखिलेश ‘दादा’ अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मुस्कान, उनकी सीख और उनका दृष्टिकोण—अब भी आसपास मौजूद है। वे उन लोगों में थे, जो बिना ऊँची आवाज़ के गहरी बात कह जाते थे। उनकी उपस्थिति में विवाद शांत हो जाते थे और संवाद शुरू हो जाता था।

पत्रकारिता, शिक्षा और समाज—तीनों ने उनसे कुछ न कुछ पाया। शायद यही वजह है कि आज हर क्षेत्र उन्हें अपना मानकर याद कर रहा है।

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कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन समय में रुक जाते हैं— ऑखिलेश ‘दादा’ ऐसे ही व्यक्तित्व थे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऑखिलेश ‘दादा’ कौन थे?

ऑखिलेश ‘दादा’ हरदोई के वरिष्ठ पत्रकार, समाजसेवी और डाल सिंह मेमोरियल स्कूल के प्रबंधक थे। वे संतुलित पत्रकारिता, सादगीपूर्ण जीवन और युवाओं के मार्गदर्शन के लिए व्यापक रूप से सम्मानित थे।

हरदोई की पत्रकारिता में उनका क्या योगदान रहा?

उन्होंने स्थानीय मुद्दों को गंभीरता से उठाया, युवा पत्रकारों को रिपोर्टिंग और भाषा की समझ दी तथा पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया।

डाल सिंह मेमोरियल स्कूल से उनका क्या संबंध था?

वे डाल सिंह मेमोरियल स्कूल के प्रबंधक थे। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।

युवाओं के लिए वे क्यों प्रेरणास्रोत थे?

वे उपदेश देने के बजाय संवाद में विश्वास रखते थे। आत्मसम्मान, धैर्य और सही दिशा में आगे बढ़ने की सीख उनके मार्गदर्शन की पहचान थी।

पत्रकार जगत में उन्हें कैसे याद किया जाएगा?

एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में, जो प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि संतुलन, संवाद और भरोसे की पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करते थे।


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