खुशी दुबे का दर्दसुहागरात भी नहीं हुई थी, जिस जीवन की शुरुआत इच्छा और सपनों से हुई, वह शुरू होते ही खत्म हो गया

बिकरू कांड में आरोपी रही खुशी दुबे इंटरव्यू वीडियो में पुलिस हिरासत और जेल की पीड़ा बताते हुए।

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
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खुशी दुबे का दर्द सिर्फ़ एक व्यक्तिगत पीड़ा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था, उस जांच प्रक्रिया और उस सामाजिक जल्दबाज़ी पर भी सवाल खड़ा करता है, जिसमें एक नाबालिग नवविवाहिता को देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में आरोपी बना दिया गया। बिकरू कांड के बाद सामने आए इंटरव्यू वीडियो में खुशी दुबे ने पहली बार विस्तार से बताया कि कैसे शादी के महज़ तीन दिन बाद उनका पूरा जीवन जेल, पूछताछ और मुकदमों में उलझ कर रह गया।

शादी के तीन दिन बाद टूटी दुनिया

29 जून 2020 को खुशी दुबे की शादी अमर दुबे से हुई थी। शादी की रस्में देर रात तक चलीं और वे एक सामान्य ग्रामीण परिवार की तरह नए सपनों के साथ ससुराल आई थीं। उनके मुताबिक उस समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जिन सपनों के साथ जीवन शुरू हो रहा है, वही जीवन कुछ ही दिनों में खत्म-सा हो जाएगा। 2 और 3 जुलाई की दरम्यानी रात बिकरू गांव में हुई हिंसक घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया और उसी के साथ खुशी की ज़िंदगी भी।

नाबालिग नवविवाहिता और शक की परछाईं

खुशी बताती हैं कि उस समय उनकी उम्र करीब 16 से 17 वर्ष थी। वे नाबालिग थीं और घटनास्थल से कई किलोमीटर दूर रहती थीं। गोली चलने की आवाज़ उन्होंने ज़रूर सुनी, लेकिन उसे पटाखों की आवाज़ समझा। उन्हें गांव की गतिविधियों और आपराधिक पृष्ठभूमि की कोई जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद, सिर्फ़ रिश्तों और शक के आधार पर उनका नाम इस मामले से जोड़ दिया गया।

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मायके जाने की कोशिश और पुलिस की रोक

घटना के बाद खुशी डरी हुई थीं और मायके जाना चाहती थीं। उनका कहना है कि पुलिस ने उन्हें यह कहकर रोका कि अगर वे चली गईं तो यह संदेह और गहरा जाएगा कि वे भी किसी साजिश में शामिल हैं। मोबाइल फोन की बैटरी खत्म हो चुकी थी, इसलिए वे अपने परिवार को भी कुछ बता नहीं सकीं। इसी बीच हालात उनके हाथ से निकलते चले गए।

गिरफ्तारी और हिरासत की भयावह यादें

3 जुलाई की रात खुशी और उनके पति अमर दुबे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। 8 जुलाई को उन्हें जेल भेज दिया गया। खुशी अपने बयान में कहती हैं कि हिरासत के शुरुआती दिन बेहद अमानवीय थे। वे जगह का नाम लेने से बचती हैं, लेकिन बार-बार यही दोहराती हैं कि “जो भी था, बहुत बुरा था।” उन्होंने अवैध हिरासत और मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।

तबीयत बिगड़ी, अस्पताल तक पहुँची

हिरासत और तनाव के दौरान खुशी की तबीयत लगातार खराब होती चली गई। उन्होंने बताया कि खून की उल्टियां होने लगीं, नाक और कान से भी खून आने लगा। हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें लखनऊ के लोहिया अस्पताल में करीब 11 दिनों तक भर्ती रहना पड़ा। उनके अनुसार उस समय वे पूरी तरह टूट चुकी थीं—शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।

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30 महीने जेल का सन्नाटा

खुशी को कुल 30 महीने जेल और सुधार गृह में रहना पड़ा। नाबालिग होने के कारण पहले एक साल उन्हें बाराबंकी के सुधार गृह में रखा गया। 18 साल पूरे होने पर उन्हें कानपुर जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने करीब डेढ़ साल बिताए। जेल में फर्श पर चादर बिछाकर सोना, सादा भोजन और सीमित सुविधाएं—यही उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन गई।

जेल में मिली सबसे बड़ी खबर

जेल में रहते हुए ही खुशी को यह जानकारी मिली कि 8 जुलाई 2020 को उनके पति अमर दुबे की पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई। खुशी के शब्दों में—“सुहागरात भी नहीं हुई थी।” उनके लिए यह खबर जीवन का सबसे बड़ा आघात थी। जिस रिश्ते ने अभी आकार भी नहीं लिया था, वह हमेशा के लिए खत्म हो गया।

निर्दोष होने का दावा और सवाल

खुशी दुबे खुद को पूरी तरह निर्दोष बताती हैं। उनका सवाल सीधा है—अगर कोई दोषी है तो उसे सजा मिलनी चाहिए, लेकिन जो लोग शामिल ही नहीं थे, उन्हें क्यों फंसाया गया? वे कहती हैं कि किसी तरह लोकेशन बताने या मदद करने का आरोप उन पर लगा दिया गया, जबकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।

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जमानत, निगरानी और भविष्य की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट से उन्हें सशर्त जमानत मिली है। शर्तों के तहत उन्हें हर सप्ताह पुलिस थाने में हाजिरी देनी होती है और घर पर निगरानी के लिए कैमरे लगे हैं। इसके बावजूद खुशी भविष्य को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ना चाहतीं। वे पढ़ाई पूरी कर वकील बनना चाहती हैं, ताकि उन लोगों की मदद कर सकें जिन्हें वे खुद की तरह बेगुनाह मानती हैं।

सीएम और पीएम से अपील

खुशी दुबे ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से अपील की है कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” केवल नारा न बने। वे चाहती हैं कि उनके मामले को मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए और नाबालिग लड़कियों के मामलों में जांच के दौरान अतिरिक्त संवेदनशीलता बरती जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

खुशी दुबे कितने समय तक जेल में रहीं?

खुशी दुबे कुल 30 महीने जेल और सुधार गृह में रहीं।

क्या घटना के समय खुशी दुबे नाबालिग थीं?

हां, घटना के समय उनकी उम्र लगभग 16–17 वर्ष थी।

खुशी दुबे आगे क्या करना चाहती हैं?

वे पढ़ाई पूरी कर वकील बनना चाहती हैं, ताकि निर्दोष लोगों की मदद कर सकें।

Meta Description: खुशी दुबे का दर्द: सुहागरात भी नहीं हुई थी—बिकरू कांड के बाद 30 महीने जेल, हिरासत की पीड़ा और निर्दोष होने का दावा पढ़िए।

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