खेतों से गायब यूरिया, बाजार में मनमानी कीमतें: गोंडा में कालाबाजारी ने तोड़ा किसानों का भरोसा

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
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गोंडा (उत्तर प्रदेश) — खरीफ और रबी की फसलों के बीच का समय आमतौर पर खेतों की तैयारी, सिंचाई और उर्वरकों की उपलब्धता के आकलन का होता है। लेकिन गोंडा जिले में यही समय किसानों के लिए बेचैनी, असमंजस और आक्रोश का कारण बन गया है। वजह है—यूरिया खाद की कालाबाजारी। सरकारी दरों पर उपलब्ध कराए जाने वाले यूरिया की कमी, वितरण प्रणाली में खामियां और दुकानदारों व बिचौलियों की मिलीभगत ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि किसान खेत से ज्यादा समय खाद की तलाश में भटक रहा है।

खेती पर निर्भर जिला और यूरिया की अहमियत

गोंडा जिला मुख्य रूप से कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलें यहां बड़े पैमाने पर बोई जाती हैं। इन फसलों के लिए यूरिया एक अनिवार्य उर्वरक है। सरकार किसानों को राहत देने के लिए यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है ताकि उत्पादन लागत नियंत्रित रहे, लेकिन जब यही खाद तय दाम पर उपलब्ध न हो, तो पूरी नीति सवालों के घेरे में आ जाती है।

सरकारी दर और बाजार की हकीकत

सरकारी तौर पर 45 किलोग्राम की एक बोरी यूरिया की कीमत लगभग 266–270 रुपये निर्धारित है। लेकिन गोंडा के कई ग्रामीण इलाकों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि यही बोरी 350 से 450 रुपये तक में बेची जा रही है। कई जगह दुकानदार यूरिया के साथ जबरन जिंक, कीटनाशक या अन्य उत्पादों की टैगिंग कर रहे हैं।

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कैसे होती है यूरिया की कालाबाजारी

यूरिया की कालाबाजारी अचानक पैदा हुई समस्या नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र का नतीजा है। पहले चरण में गोदामों से सीमित मात्रा में खाद जारी की जाती है। दूसरे चरण में दुकानदार यह प्रचार करते हैं कि “माल खत्म हो गया है।” तीसरे चरण में वही यूरिया चुनिंदा किसानों या बिचौलियों को ऊंचे दाम पर दिया जाता है और चौथे चरण में यही खाद गांव-गांव घूमकर महंगे दामों पर बेची जाती है।

किसानों का दर्द: कतारें बढ़तीं, खेत सूखते

जिले के कई ब्लॉकों में किसान सुबह-सुबह सहकारी समितियों और खाद की दुकानों के बाहर लंबी कतारों में खड़े दिखते हैं। घंटों इंतजार के बाद जवाब मिलता है—“आज स्टॉक खत्म हो गया।” खेती समयबद्ध प्रक्रिया है; सही समय पर यूरिया न मिलने से फसल की बढ़वार प्रभावित होती है और पैदावार घटने का खतरा बढ़ जाता है।

प्रशासनिक दावे बनाम जमीनी सच्चाई

प्रशासन का दावा है कि जिले में 16,624 मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध है और कोई कमी नहीं है। एम-पैक्स समितियों, एग्री जंक्शन और निजी बिक्री केंद्रों पर पीओएस मशीन के माध्यम से वितरण किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है, तो किसानों को महंगे दाम क्यों चुकाने पड़ रहे हैं?

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सहकारी समितियां और बिचौलियों का जाल

कई सहकारी समितियों पर आरोप हैं कि सीमित किसानों को बार-बार खाद दी जा रही है, जबकि वास्तविक जरूरतमंद वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर, बिचौलिये थोक में यूरिया उठाकर गांवों में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। मजबूर किसान खेत बचाने के लिए उनसे खरीदने को विवश है।

कानून, चेतावनी और सख्ती

प्रशासन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि कोई विक्रेता निर्धारित मूल्य से अधिक पर यूरिया बेचता है, टैगिंग करता है, पीओएस मशीन के बिना बिक्री करता है या रसीद नहीं देता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है। किसान जिला कृषि अधिकारी कार्यालय, गोंडा के कंट्रोल रूम 05262-796594 पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

समाधान की दिशा

यूरिया कालाबाजारी रोकने के लिए सिर्फ छापेमारी काफी नहीं। डिजिटल ट्रैकिंग, पारदर्शी वितरण सूची, स्थायी निगरानी दल, त्वरित शिकायत प्रणाली और दोषियों पर कड़ी सजा—ये सभी कदम एक साथ उठाने होंगे।

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सवाल सिर्फ खाद का नहीं, भरोसे का है

गोंडा में यूरिया की कालाबाजारी किसानों के भरोसे पर सीधी चोट है। जब किसान को समय पर और सही दाम पर खाद मिलने का भरोसा नहीं रहेगा, तो खेती जोखिम भरा सौदा बनती जाएगी। कागजों में भरे गोदाम और जमीन पर सूखते खेत—इसी खाई को पाटना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

किसानों के सवाल – प्रशासन के जवाब

सरकारी दर पर यूरिया क्यों नहीं मिल रहा?

कमी नहीं, बल्कि वितरण प्रणाली में खामियां और कालाबाजारी इसकी मुख्य वजह है।

कालाबाजारी की शिकायत कहां करें?

जिला कृषि अधिकारी, गोंडा के कंट्रोल रूम नंबर 05262-796594 पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

जबरन टैगिंग करना कितना गैरकानूनी है?

यूरिया के साथ किसी अन्य उत्पाद की जबरन बिक्री पूरी तरह अवैध है और इस पर FIR व NSA तक की कार्रवाई हो सकती है।




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