आस्था का कोई निश्चित आकार नहीं होता। वह न तो मूर्ति में बंधी रहती है, न ही किसी निश्चित कालखंड में कैद होती है। आस्था तो एक अनुभूति है—जो कभी किसी साधारण से क्षण में, किसी अनजाने व्यक्ति के शब्दों में, तो कभी किसी गांव की मिट्टी में रची-बसी परंपरा के रूप में सामने आ जाती है। कहा जाता है कि भगवान कभी भी, कहीं भी, किसी भी रूप में आपके समक्ष आ सकते हैं—बस दृष्टि ईमानदार होनी चाहिए, मन निष्कपट होना चाहिए। हरियाणा के झज्जर जिले की छारा बस्ती में स्थित बाबा जत्तीवाले की पावनस्थली इसी सत्य की एक जीवंत मिसाल है।
यह कोई भव्य नगर नहीं, न ही कोई अत्याधुनिक तीर्थ परिसर। फिर भी यहां आकर जो शांति मिलती है, वह बड़े-बड़े धार्मिक केंद्रों में भी दुर्लभ है। छारा गांव की यह भूमि, जहां बाबा जत्तीवाले की साधना ने आकार लिया, आज भी श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसी आध्यात्मिक शरणस्थली है, जहां धर्म का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि मानवता बन जाता है।
छारा की मिट्टी और साधना की जड़ें
हरियाणा के झज्जर जनपद में स्थित छारा गांव सामान्य ग्रामीण जीवन की मिसाल है—खेती, पशुपालन और सादा जीवन। किंतु इसी साधारणता के बीच एक असाधारण आध्यात्मिक परंपरा जन्म लेती है। बाबा जत्तीवाले की कथा इसी ग्रामीण जीवन की धड़कनों से जुड़ी है। लोककथाओं और मौखिक परंपराओं में वर्णित बाबा जत्तीवाले किसी राजवंश से नहीं थे, न ही किसी धार्मिक सत्ता के प्रतिनिधि। वे उस संत परंपरा के वाहक थे, जो स्वयं को नहीं, बल्कि समाज को केंद्र में रखती है।
कहा जाता है कि बाबा जत्तीवाले ने अपने जीवन को त्याग, तपस्या और सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी साधना जंगलों, खेतों और गांव की चौपालों में हुई—जहां आम जन से संवाद ही उनका धर्म था। उनके लिए ईश्वर कोई दूर बैठा सत्ताधारी नहीं, बल्कि भूखे को भोजन देने में, दुखी को सांत्वना देने में और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने में प्रकट होता था।
बाबा जत्तीवाले की पावनस्थली: एक जीवित परंपरा
आज छारा में स्थित बाबा जत्तीवाले का मंदिर केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं है। यह एक जीवित परंपरा है, जहां हर दिन आस्था सांस लेती है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक अलग ही शांति का अनुभव होता है—जैसे समय कुछ पल के लिए ठहर गया हो। यहां आने वाले श्रद्धालुओं में कोई बड़ा-छोटा, अमीर-गरीब का भेद नहीं दिखता। सभी एक ही भाव से शीश नवाते हैं।
यह स्थल विशेष रूप से उन लोगों के लिए आश्रय बन गया है, जो जीवन में किसी न किसी रूप में टूट चुके हैं। कोई बीमारी से जूझ रहा है, कोई पारिवारिक संकट में है, तो कोई मानसिक अशांति से। यहां आने वाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसकी बात सुनी जा रही है—भले ही शब्दों में नहीं, लेकिन अनुभूति में।
धूनी की अग्नि और सादगी का उजास
छारा की पावन धरती पर बाबा जत्तीवाले की साधना-परंपरा का सबसे जीवंत प्रतीक है—गद्दीनशीन बाबा सागर नाथ जी महाराज की अनवरत प्रज्वलित धूनी। यह धूनी केवल अग्नि का रूप नहीं, बल्कि आस्था, तप, सेवा और निरंतर चेतना का प्रतीक है। वर्षों से जलती यह धूनी उन श्रद्धालुओं के लिए आश्रय बन चुकी है, जो जीवन की आपाधापी, पीड़ा और असमंजस के बीच शांति की तलाश में यहां आते हैं।
धूनी के पास बैठते ही एक विचित्र-सी स्थिरता मन को घेर लेती है। न कोई शोर, न कोई दिखावा—बस अग्नि की मद्धिम लपटें और भीतर उतरती शांति। यही वह क्षण होता है, जब श्रद्धालु महसूस करता है कि आस्था शब्दों से नहीं, अनुभूति से जन्म लेती है।
सेवा, समरसता और सामाजिक चेतना
बाबा जत्तीवाले की पावनस्थली की सबसे बड़ी विशेषता है—सेवा का सहज भाव। यहां सेवा किसी प्रचार का साधन नहीं, बल्कि साधना का हिस्सा है। ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर से जुड़ी परंपराओं में कभी जाति, पंथ या संप्रदाय का भेद नहीं रहा। यह स्थल सिख, हिंदू, मुस्लिम—सभी के लिए समान रूप से श्रद्धा का केंद्र रहा है।
विशेष अवसरों पर होने वाले भंडारे केवल भोजन वितरण नहीं होते, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप के अवसर बन जाते हैं। लोग साथ बैठते हैं, एक ही पंक्ति में भोजन करते हैं, और यही दृश्य बाबा जत्तीवाले की शिक्षाओं का सबसे सशक्त प्रमाण बन जाता है।
पाठकों के सवाल (FAQ)
क्या बाबा जत्तीवाले की पावनस्थली किसी विशेष धर्म से जुड़ी है?
नहीं। यह स्थल किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। यहां मानवता को ही सर्वोच्च धर्म माना जाता है।
धूनी का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
धूनी निरंतर साधना, सेवा और चेतना का प्रतीक है। यह मन को स्थिर करने और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करती है।
यह स्थान आज के युवाओं के लिए क्यों प्रासंगिक है?
क्योंकि यह स्थल सिखाता है कि सफलता केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है।
निष्कर्ष: धूनी में जलती साधना
छारा की इस पावनस्थली पर बाबा जत्तीवाले की जीवित परंपरा और बाबा सागर नाथ जी महाराज की अनवरत जलती धूनी हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची आस्था कभी बुझती नहीं। वह समय, परिस्थिति और पीढ़ियों के पार भी जलती रहती है—जैसे यह धूनी। सादगी, सेवा और मौन साधना में रचा-बसा यह जीवन-दर्शन आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब धर्म को अक्सर शोर में बदल दिया गया है। यहां आस्था शोर नहीं करती—वह बस मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है।











Jai shree Ram jai Gau Mata 🚩🚩🚩🚩🚩🙏🚩🪷🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀