BJP के सामने बड़ा धर्मसंकट ! एक तरफ विनय कटियार, दूसरी तरफ बाहुबली बृजभूषण; किसका कटेगा पत्ता?

अयोध्या लोकसभा सीट को लेकर भाजपा के भीतर विनय कटियार और बृजभूषण शरण सिंह के बीच संभावित सियासी टकराव की प्रतीकात्मक तस्वीर।


कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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BJP के सामने बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया है। गोंडा में आयोजित ‘राष्ट्र कथा’ कार्यक्रम के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या (फैजाबाद) सीट पर भाजपा किस चेहरे पर भरोसा करेगी। एक ओर पार्टी के पुराने और वैचारिक स्तंभ विनय कटियार हैं, तो दूसरी ओर दबदबे और जनाधार के लिए पहचाने जाने वाले बाहुबली नेता बृजभूषण शरण सिंह—और यही टकराव भाजपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है।

गोंडा स्थित ‘नंदनी निकेतनम्’ में आयोजित राष्ट्र कथा कार्यक्रम को यदि सिर्फ धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन मानकर देखा जाए, तो शायद इसकी राजनीतिक गूंज को समझना कठिन होगा। लेकिन जिस तरह इस कार्यक्रम में राजनीति, सिनेमा, खेल और सामाजिक क्षेत्र की जानी-मानी हस्तियों की मौजूदगी रही और जिस अंदाज में मंच से बयान दिए गए, उसने साफ कर दिया कि यह आयोजन 2029 की राजनीति की प्रस्तावना भी था।

राष्ट्र कथा से उठा सियासी तूफान

राष्ट्र कथा के मंच से बृजभूषण शरण सिंह का भावुक बयान भाजपा के भीतर तक हलचल पैदा करने वाला रहा। उन्होंने खुलकर कहा कि उनके खिलाफ साजिश रची गई और उन्हें योजनाबद्ध तरीके से राजनीति से हटाया गया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि वे 2029 तक जीवित रहे, तो पूरे सम्मान के साथ संसद पहुंचेंगे। यह बयान केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक वापसी का संकेत माना जा रहा है।

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गौरतलब है कि बृजभूषण को पॉक्सो एक्ट की धाराओं से राहत मिल चुकी है, हालांकि यौन शोषण से जुड़ा मामला अब भी अदालत में विचाराधीन है। बावजूद इसके, उनके समर्थकों का मानना है कि जमीनी राजनीति में उनका प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ है।

करण भूषण का ऐलान: दबाव की राजनीति?

मौजूदा सांसद करण भूषण शरण सिंह ने राष्ट्र कथा के दौरान यह कहकर सियासी हलचल और तेज कर दी कि 2029 में वे और उनके पिता—दोनों लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। इस बयान को भाजपा नेतृत्व पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

बृजभूषण शरण सिंह ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि यदि भाजपा टिकट देगी तो ठीक, वरना किसी अन्य विकल्प पर भी विचार किया जाएगा। यही वाक्य भाजपा के लिए सबसे बड़ी असहजता की वजह बन गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर पार्टी की अनुशासनात्मक राजनीति को चुनौती देता नजर आता है।

अयोध्या सीट: क्यों बनी रणभूमि?

अयोध्या (फैजाबाद) सीट पर चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा जैसे बड़े मुद्दों के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी उम्मीदवार लल्लू सिंह चुनाव नहीं जीत सके, जिसने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी।

भाजपा के लिए यह सीट सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। ऐसे में पार्टी 2029 के लिए ऐसा चेहरा चाहती है जो न सिर्फ जीत दिला सके, बल्कि संगठन और विचारधारा—दोनों को मजबूती दे।

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विनय कटियार की वापसी और कुर्मी समीकरण

इसी पृष्ठभूमि में विनय कटियार की सक्रियता को देखा जा रहा है। उन्होंने खुलकर कहा है कि फैजाबाद उनकी सीट है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उनकी यह वापसी केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि कुर्मी वोट बैंक को साधने की भाजपा रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है।

2024 के चुनाव में फैजाबाद और आसपास के इलाकों में कुर्मी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से दूर रहा था। 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी अब इस सामाजिक आधार को दोबारा मजबूत करना चाहती है।

बृजभूषण बनाम कटियार: भाजपा की असली परीक्षा

एक तरफ विनय कटियार जैसे नेता हैं, जो पार्टी की वैचारिक राजनीति और राम आंदोलन से जुड़े रहे हैं, तो दूसरी ओर बृजभूषण शरण सिंह हैं, जिनकी पहचान दबदबे, संगठनात्मक पकड़ और जमीनी ताकत से रही है। भाजपा के सामने सवाल यह है कि वह वैचारिक शुद्धता को प्राथमिकता दे या फिर चुनावी गणित को।

इस समीकरण को और जटिल बनाता है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बृजभूषण की राजनीतिक खटास। वहीं गोंडा से सांसद और केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह के बढ़ते प्रभाव ने भी क्षेत्रीय संतुलन बदल दिया है।

फैजाबाद का इतिहास: कोई स्थायी विजेता नहीं

फैजाबाद का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां कोई भी दल स्थायी रूप से हावी नहीं रहा। आजादी के बाद से अब तक हुए 17 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, सपा और सीपीआई—सभी को यहां जीत मिली है। मतदाता हर बार जातीय समीकरण, मुद्दों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला करते रहे हैं।

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यही कारण है कि 2029 को लेकर भाजपा के सामने निर्णय आसान नहीं है। विनय कटियार और बृजभूषण शरण सिंह—दोनों के अपने-अपने समर्थक, तर्क और दबाव हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसे टिकट मिलेगा, बल्कि यह भी है कि किस विकल्प से पार्टी को दीर्घकालिक लाभ होगा।

 किसका कटेगा पत्ता?

गोंडा की राष्ट्र कथा से उठी यह सियासी लहर अब अयोध्या तक पहुंच चुकी है। भाजपा के सामने बड़ा धर्मसंकट यह है कि वह 2029 में अयोध्या जैसी संवेदनशील सीट पर किस चेहरे को आगे बढ़ाए। फिलहाल इतना तय है कि यह फैसला केवल एक टिकट का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या बृजभूषण शरण सिंह 2029 में चुनाव लड़ेंगे?

उनके बयानों और बेटे करण भूषण के ऐलान से यही संकेत मिलते हैं, हालांकि अंतिम फैसला पार्टी रणनीति पर निर्भर करेगा।

क्या विनय कटियार को फैजाबाद से टिकट मिल सकता है?

पार्टी के भीतर उनकी सक्रियता और कुर्मी वोट बैंक की रणनीति को देखते हुए उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।

भाजपा के लिए अयोध्या सीट क्यों अहम है?

राम मंदिर आंदोलन और वैचारिक राजनीति के कारण अयोध्या भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की सीट मानी जाती है।


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