माहे रमजान में इबादत और इंसानियत का संदेश
देवरिया जनपद के भाटपार रानी स्थित जामा मस्जिद में माहे रमजान के पाक और मुबारक महीने के दौरान इबादत का सिलसिला पूरी रूहानी फिजा के साथ जारी रहा। इसी क्रम में तरावीह नमाज के दौरान तिलावत-ए-कुरआन का सिलसिला 26वें रोजे की रात मुकम्मल हो गया। इस मौके पर मस्जिद में मौजूद अकीदतमंदों ने अल्लाह की बारगाह में अपने गुनाहों की माफी मांगते हुए देश में अमन, चैन और भाईचारे की दुआएं मांगीं। रमजान के इस मुकद्दस माहौल में मस्जिद का वातावरण आध्यात्मिक भावनाओं और दुआओं से सराबोर नजर आया, जहां हर शख्स अपने दिल की गहराइयों से अल्लाह से रहमत और बरकत की गुहार लगा रहा था।
माहे रमजान को इस्लाम में इबादत, सब्र और इंसानियत का महीना माना जाता है। रोजेदार दिन भर रोजा रखकर अपनी आत्मा को संयम और अनुशासन के रास्ते पर ले जाते हैं, जबकि रात के समय तरावीह की नमाज में कुरआन शरीफ की तिलावत सुनते हैं। भाटपार रानी की जामा मस्जिद में भी इसी परंपरा के तहत 19 फरवरी से तरावीह नमाज का सिलसिला शुरू हुआ था, जो मंगलवार की रात 26वें रोजे को कुरआन मुकम्मल होने के साथ सम्पन्न हुआ।
हाफिज व कारी मुजीब अहमद का पैगाम
इस अवसर पर जामा मस्जिद भाटपार रानी के पेश इमाम हाफिज व कारी मुजीब अहमद ने कुरआन मुकम्मल कराया और उपस्थित लोगों को एक महत्वपूर्ण पैगाम दिया। उन्होंने कहा कि रमजान का महीना केवल इबादत का ही नहीं बल्कि इंसानियत और भलाई का भी महीना है। इस पवित्र समय में अगर कोई व्यक्ति जरूरतमंदों के काम आता है, गरीबों की मदद करता है और समाज में भाईचारे का संदेश फैलाता है, तो वह किसी बड़ी ईद की खुशियों से कम नहीं होता।
उन्होंने अपनी तकरीर में कहा कि रमजान हमें यह सिखाता है कि इंसान केवल अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी जिए। इस महीने में नेक काम करने वालों को अल्लाह तआला विशेष रहमत और बरकत से नवाजता है। हाफिज व कारी मुजीब अहमद ने यह भी कहा कि तरावीह में कुरआन सुन लेने के बाद यह नहीं समझना चाहिए कि इबादत का सिलसिला समाप्त हो गया। बल्कि असल मकसद यह है कि कुरआन की सीख को अपने जीवन में उतारा जाए और हर दिन अच्छे कर्मों के साथ बिताया जाए।
देश में अमन-चैन के लिए विशेष दुआ
तरावीह की नमाज और कुरआन मुकम्मल होने के बाद मस्जिद में सामूहिक दुआ का आयोजन हुआ। इस दौरान हाफिज व कारी मुजीब अहमद ने देश की खुशहाली, अमन-चैन और आपसी भाईचारे के लिए विशेष दुआ पढ़ाई। मस्जिद में मौजूद लोगों ने हाथ उठाकर अपने गुनाहों की माफी मांगी और अल्लाह से यह दुआ की कि देश में शांति और सौहार्द बना रहे।
दुआ के इस भावुक पल में कई रोजेदारों की आंखें नम नजर आईं। रमजान के पवित्र वातावरण में जब अल्लाह की बारगाह में दुआएं उठीं तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरे समाज के लिए भलाई और शांति की कामना की जा रही हो। इस दौरान लोगों ने यह भी दुआ की कि समाज में आपसी नफरत और दूरियां समाप्त हों तथा इंसानियत और भाईचारे का माहौल मजबूत हो।
मस्जिद कमेटी और स्थानीय लोगों की मौजूदगी
इस अवसर पर जामा मस्जिद भाटपार रानी में बड़ी संख्या में नमाजियों की उपस्थिति रही। मस्जिद कमेटी के सदस्यों और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया। मौजूद लोगों में मास्टर कामरान साहब, डॉक्टर मोहर्रम अंसारी, मोहम्मद ईशा, गुल मोहम्मद, इरफान अली लारी, गुड्डू कुरैशी, शहाबुद्दीन ठेकेदार, मुस्ताक अहमद, फजले मसूद साहब, अनवर अंसारी, बाबर अहमद, अशरफ कुरेशी, समाजसेवी सलीम अली, रियाज अली, अफजल अली, इस्माइल अली, इब्राहिम अली, रिजवान अली, नौशाद अली, लक्की खान, आफताब अहमद, शादाब खान, मेहरान, अयान, रेहान, मुजफ्फर और जुगनू अली समेत अनेक लोग शामिल रहे।
मस्जिद परिसर में रमजान की इस रूहानी रात का माहौल बेहद शांत और श्रद्धामय रहा। नमाज और दुआ के बाद लोगों ने एक-दूसरे से मुलाकात की और रमजान की बरकतों के लिए अल्लाह का शुक्र अदा किया। स्थानीय लोगों का कहना था कि रमजान का महीना केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता और मानवता की भावना को मजबूत करने का भी अवसर प्रदान करता है।
रमजान का संदेश: इंसानियत और भाईचारा
रमजान का महीना मुसलमानों के लिए आत्मसंयम, आध्यात्मिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। रोजा रखने के साथ-साथ जरूरतमंदों की सहायता करना, गरीबों और बेसहारा लोगों का ख्याल रखना और समाज में शांति का वातावरण बनाए रखना इस महीने की मूल भावना है। भाटपार रानी की जामा मस्जिद में आयोजित इस कार्यक्रम ने भी यही संदेश दिया कि धर्म का असली उद्देश्य इंसानियत को मजबूत करना और समाज में सद्भाव बनाए रखना है।
तरावीह में कुरआन मुकम्मल होने का यह अवसर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक सामाजिक संदेश भी था, जिसमें लोगों को अच्छे कर्म करने, एक-दूसरे की मदद करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा दी गई।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
तरावीह नमाज क्या होती है?
तरावीह रमजान के महीने में इशा की नमाज के बाद अदा की जाने वाली विशेष नमाज है, जिसमें कुरआन शरीफ की तिलावत सुनाई जाती है।
कुरआन मुकम्मल होने का क्या महत्व है?
रमजान के दौरान तरावीह में पूरे कुरआन की तिलावत पूरी होना एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर माना जाता है, जिस पर लोग विशेष दुआ करते हैं।
रमजान का मुख्य संदेश क्या है?
रमजान का मुख्य संदेश आत्मसंयम, इबादत, जरूरतमंदों की मदद और समाज में भाईचारे तथा इंसानियत को बढ़ावा देना है।










