मथुरा का देवसेरस: सूने होते घर, डरे हुए लोग और ‘कथित हिंदू पलायन’ की चुभती कहानी

✍️ के के सिंह की रिपोर्ट

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उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के गोवर्धन थाना क्षेत्र स्थित देवसेरस गांव इन दिनों एक गहरी और संवेदनशील सामाजिक चर्चा के केंद्र में है। गांव के स्थानीय निवासियों का दावा है कि बीते कुछ वर्षों में यहां से हिंदू परिवारों का कथित पलायन तेज़ हुआ है। इस बदलाव ने न केवल जनसंख्या के संतुलन को प्रभावित किया है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, आपसी भरोसे और भविष्य की स्थिरता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि लंबे समय से पनप रही उन परिस्थितियों का नतीजा है, जिनमें डर, बदनामी और असुरक्षा की भावना लगातार गहराती चली गई। देवसेरस आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा बताया जा रहा है, जहां लोग अपने घरों से ज्यादा अपनी पहचान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

मुस्लिम बहुल इलाकों में घटती हिंदू आबादी का दावा

देवसेरस के साथ-साथ गोवर्धन क्षेत्र के दौलतपुर, मुड़सेरस, मडोरा और नगला कातिया जैसे गांवों को भी स्थानीय लोग मुस्लिम बहुल बताते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ दशक पहले इन गांवों में हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर हुआ करती थी। त्योहार, खेती और सामाजिक आयोजनों में दोनों समुदायों की सहभागिता आम बात थी।

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लेकिन समय के साथ हालात बदलते चले गए। ग्रामीणों के अनुसार, आज कई गलियां ऐसी हैं जहां कभी हिंदू परिवारों की रौनक रहती थी, अब वहां ताले लटके हैं। कुछ मकान बिक चुके हैं तो कुछ लंबे समय से खाली पड़े हैं, जो इस कथित पलायन की कहानी खुद बयां करते हैं।

गांव में बुजुर्ग, बाहर बसती युवा पीढ़ी

देवसेरस में अब जो हिंदू परिवार रह गए हैं, उनमें अधिकांश बुजुर्ग हैं। उनकी जड़ें खेती, पशुपालन और पुश्तैनी जमीन से जुड़ी हुई हैं। वे गांव छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं, जबकि युवा पीढ़ी के सामने हालात बिल्कुल अलग हैं।

रोज़गार की कमी, शिक्षा के अवसरों का अभाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना ने युवाओं को गांव से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। कई युवक मथुरा शहर, आगरा, दिल्ली और अन्य राज्यों में रोज़गार की तलाश में बस चुके हैं।

शादी-ब्याह पर मंडराता संकट

ग्रामीणों का कहना है कि घटती आबादी का असर अब सामाजिक जीवन पर भी साफ दिखाई दे रहा है। गांव के युवाओं के लिए रिश्ते तय करना मुश्किल हो गया है। आरोप है कि जब देवसेरस गांव का नाम सामने आता है, तो कई जगह से रिश्ते के लिए मना कर दिया जाता है।

परिवारों का कहना है कि गांव की कथित बदनामी और असुरक्षा की छवि ने युवाओं के वैवाहिक भविष्य पर भी संकट खड़ा कर दिया है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ रहा है।

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‘मिनी जामताड़ा’ की छवि और सामाजिक बदनामी

देवसेरस को लेकर एक और गंभीर दावा सामने आता है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव का नाम कथित तौर पर साइबर अपराध की घटनाओं से जोड़ दिया गया है। कुछ लोगों के साइबर ठगी मामलों में शामिल पाए जाने के बाद पूरे गांव की छवि पर सवाल उठने लगे।

ग्रामीणों के अनुसार, इस बदनामी का खामियाजा ईमानदार नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। नौकरी, रिश्ते और सामाजिक सम्मान—हर जगह गांव का नाम बाधा बन गया है, जिसके चलते लोग इसे “मिनी जामताड़ा” कहने लगे हैं।

डर, खामोशी और असुरक्षा का आरोप

कुछ ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गांव में डर का माहौल है। उनका आरोप है कि मामूली विवाद भी कभी-कभी बड़ा रूप ले सकता है। इसी कारण लोग न तो खुलकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं और न ही मीडिया के सामने अपनी बात रखने का साहस जुटा पाते हैं।

हालांकि, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हालात हर समय एक जैसे नहीं रहते, लेकिन डर की यह भावना सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है।

पुलिस की सक्रियता और उम्मीद की किरण

ग्रामीणों के अनुसार, हाल के दिनों में पुलिस की सक्रियता बढ़ी है और कुछ मामलों में गिरफ्तारियां भी हुई हैं। इससे लोगों को उम्मीद बंधी है कि यदि अपराधियों के खिलाफ निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई होती रही, तो हालात सुधर सकते हैं।

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ग्रामीणों की मांग है कि कानून सभी के लिए समान हो। उनका कहना है कि अपराध किसी भी समुदाय से जुड़ा हो, उस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, तभी गांव में शांति, सुरक्षा और विश्वास दोबारा बहाल हो सकेगा।

देवसेरस गांव की यह कहानी केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण भारत में बदलते सामाजिक समीकरणों, भय और विश्वास के संकट की एक गहरी तस्वीर पेश करती है, जिसे समझने और सुलझाने के लिए संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है।

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देवसेरस गांव में कथित पलायन का मुख्य कारण क्या बताया जा रहा है?

ग्रामीणों के अनुसार असुरक्षा की भावना, सामाजिक बदनामी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता को इसका प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

क्या गांव पूरी तरह खाली हो गया है?

नहीं, गांव में अब भी कई परिवार, विशेषकर बुजुर्ग, रह रहे हैं। हालांकि युवाओं का बड़ा हिस्सा बाहर चला गया है।

‘मिनी जामताड़ा’ की छवि क्यों बनी?

कुछ कथित साइबर अपराध मामलों के कारण गांव का नाम इससे जोड़ा जाने लगा, जिससे पूरी आबादी की छवि प्रभावित हुई।

ग्रामीणों की प्रमुख मांग क्या है?

ग्रामीणों की मांग है कि अपराधियों पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई हो, ताकि गांव में कानून का डर और शांति दोनों कायम हो सकें।

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