पहले अंक में हमने उस विरहिणी की मार्मिक पुकार सुनी थी, जो गौना के तुरंत बाद नैनीताल चले गए पिया को अधीर स्वर में बुला रही थी—“तत्काल आ जा…”। बसंत के रंगों के बीच उसकी प्रतीक्षा और तड़प ने यह स्पष्ट किया था कि प्रेम का सबसे सघन रूप कई बार दूरी में ही जन्म लेता है।
आज उसी भावभूमि से कथा आगे बढ़ती है। पुकार अब चीख नहीं रही, वह धीमे-धीमे भीतर उतर गई है। बसंत अपनी पूरी आभा में है—पेड़ों पर नई पत्तियाँ, खेतों में सरसों, हवा में आम्र-बौर की गंध। और इसी वातावरण में एक नया स्वर उभरता है— “कोयल कूके डार-डार, पिया बिना सूना संसार…” यह लोकपंक्ति बसंत के उत्सव और मन की रिक्तता के बीच खड़े उस अदृश्य द्वंद्व को उजागर करती है।
बसंत की हवा और मन का खालीपन
बसंत की हवा का स्वभाव उत्सवधर्मी होता है। वह सर्दियों की कठोरता को पीछे छोड़कर आती है और जीवन को नई लय देती है। परंतु विरहिणी के लिए वही हवा बेचैनी का दूत बन जाती है। हर झोंका उसे उस स्पर्श की याद दिलाता है, जो अब उसके पास नहीं है। गाँव में फाग गाए जा रहे हैं। आँगन में रंग घुल रहे हैं। पर उसके मन में एक रिक्त जगह है—जिसे कोई रंग भर नहीं पा रहा। बसंत बाहर पूर्ण है, पर भीतर अधूरा।
कोयल: प्रेम की दूत या विरह की साक्षी?
भारतीय काव्य में कोयल को प्रेम का दूत माना गया है। उसकी कूक में आमंत्रण है, उल्लास है, संयोग का संकेत है। किन्तु जब वही कोयल विरहिणी के आँगन में कूकती है, तो उसका स्वर आनंद का नहीं, प्रश्न का बन जाता है। “कोयल कूके डार-डार…” यह प्रकृति की परिपूर्णता है। “पिया बिना सूना संसार…” यह मन की अपूर्णता है। यहीं इस लोकधुन की शक्ति है—वह एक ही क्षण में उत्सव और शून्यता को साथ रख देती है।
स्मृति का संगीत
कोयल की आवाज़ केवल ध्वनि नहीं; वह स्मृति को जगाने वाला स्वर है। विरहिणी को याद आता है— वह दोपहर जब पिया ने पहली बार उसके बालों में आम्र-मंजरियाँ सजाई थीं। वह शाम जब दोनों ने एक साथ कोयल की कूक सुनी थी और हँस पड़े थे। अब वही कूक अकेले सुनाई देती है। स्मृति का संगीत जितना मधुर है, उतना ही पीड़ादायक भी।
सामूहिक उत्सव और व्यक्तिगत रिक्तता
बसंत ग्रामीण जीवन में सामूहिक आनंद का समय है। मेलों की रौनक, ढोलक की थाप, खेतों की हरियाली—सब मिलकर एक उत्सव रचते हैं। परंतु जब पूरा संसार उत्सव में डूबा हो और मन अकेला रह जाए, तब अकेलापन और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। आज के समय में यह भाव प्रवासन की कहानी भी है। पति रोज़गार के लिए शहर गया है। पीछे छूट गया है उसका घर, उसका आँगन, और उसकी प्रतीक्षा करती पत्नी। मोबाइल पर बातचीत होती है, पर आवाज़ में वह गर्माहट नहीं जो पास बैठने से आती है। इस प्रकार लोकगीत समय की सीमाएँ पार कर आधुनिक यथार्थ में भी उतना ही प्रासंगिक हो उठता है।
विरह: धैर्य की अग्नि
विरह केवल रोना नहीं है। वह धैर्य की अग्नि है, जिसमें प्रेम तपकर और गहरा हो जाता है। जब विरहिणी कहती है—“पिया बिना सूना संसार…”—तो उसमें टूटन नहीं, एक गहरी स्वीकार्यता है। वह जानती है कि संसार का सौंदर्य प्रिय की उपस्थिति से ही पूर्ण होता है। और जब वह अनुपस्थित है, तो रंग भी फीके पड़ जाते हैं।
स्त्री-मन की अडिग प्रतीक्षा
भारतीय लोकगीतों में स्त्री केवल रोती हुई नायिका नहीं; वह प्रतीक्षा की प्रतिमा है। वह समय को काटती नहीं, समय को सहती है। वह विरह को बोझ नहीं, तपस्या बना देती है। कोयल की हर कूक उसके लिए एक दिन कम होने का संकेत है— एक दिन और बीत गया। एक दिन और पास आया।
बसंत की विडंबना
बसंत जितना रंगों का है, उतना ही विरोधाभास का भी है। प्रकृति पूर्ण है, पर मन रिक्त। कोयल गा रही है, पर हृदय सुनसान है। यह विडंबना ही लोकगीत को अमर बनाती है। यदि बसंत केवल उत्सव होता, तो शायद इतना मार्मिक न होता। वह इसलिए गहरा है क्योंकि उसमें विरह की छाया भी है।
कूक की गूंज
अंक–2 में हमने बसंत की हवा और कोयल की कूक के बीच छिपी उस शून्यता को सुना, जो विरहिणी के मन में बसती है। “कोयल कूके डार-डार, पिया बिना सूना संसार…” यह पंक्ति बताती है कि प्रकृति का उत्सव भी मन की उपस्थिति पर निर्भर है। जब तक प्रिय लौट नहीं आता, तब तक संसार का हर रंग अधूरा है। और जब वह लौटेगा, तब शायद यही कोयल का स्वर, जो आज पीड़ा है, कल मिलन का गीत बन जाएगा।
🌼 (श्रृंखला जारी रहेगी — अंक–3 में फागुन की दोपहर और भीगे हुए मन की कथा…)
FAQ 1: यह साहित्य श्रृंखला किस विषय पर आधारित है?
FAQ 2: अंक–2 का केंद्रीय भाव क्या है?
FAQ 3: क्या यह लेख आधुनिक संदर्भ में भी प्रासंगिक है?








