चित्रकूट।
अन्ना गौवंशों के संरक्षण के नाम पर बनी सरकारी गौशालाएं अब भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बनती जा रही हैं। सरकार जहां गौवंशों के भरण-पोषण और देखरेख के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर ठोस व्यवस्था का दावा कर रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत इससे उलट तस्वीर पेश कर रही है। गौशाला निरीक्षण की प्रक्रिया को हथियार बनाकर ग्राम प्रधानों और सचिवों से डर, दबाव और कार्रवाई की धमकी के सहारे अवैध वसूली किए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे खेल के केंद्र में मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी के ड्राइवर अशोक कुमार और सेमरदहा ग्राम पंचायत में तैनात पशुधन प्रसार अधिकारी मुकेश कुमार बताए जा रहे हैं। आरोप है कि दोनों की मिलीभगत से गौशालाओं के निरीक्षण को डर का औज़ार बना दिया गया है।
निरीक्षण या दबाव की कार्रवाई?
बताया जा रहा है कि जब भी मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी गौशालाओं के निरीक्षण पर जाते हैं, तो वास्तविक निरीक्षण उनके बजाय ड्राइवर और स्थानीय कर्मियों से करवाया जाता है। इसी दौरान फर्जी तरीके से गौवंशों की संख्या बढ़ाकर बताना, चारा-भूसा या अन्य सामग्री की कमी दिखाना और फिर सीधे ग्राम प्रधानों को दोषी ठहराने की रणनीति अपनाई जाती है।
इसके बाद “कार्रवाई” का भय दिखाकर राशि की मांग की जाती है।
केंद्र से नदारद अधिकारी, मैदान में वसूली
सूत्र यह भी बताते हैं कि पशुधन प्रसार अधिकारी मुकेश कुमार अक्सर अपने कार्यस्थल पर मौजूद नहीं रहते, लेकिन निरीक्षण के समय अचानक सक्रिय हो जाते हैं। ड्राइवर अशोक कुमार के साथ मिलकर वे ग्राम प्रधानों और सचिवों पर दबाव बनाते हैं—कभी रिपोर्ट बिगाड़ने की धमकी, तो कभी उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंचाने का डर।
सरकारी मंशा बनाम ज़मीनी सच्चाई
एक ओर सरकार गौवंश संरक्षण को लेकर बजट, दिशा-निर्देश और योजनाओं की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसी तंत्र से जुड़े लोग योजनाओं को निजी कमाई का ज़रिया बना रहे हैं। सवाल यह नहीं कि गौशालाओं में कमी है या नहीं—सवाल यह है कि क्या निरीक्षण का उद्देश्य सुधार है या वसूली?
सबूतों की तैयारी, प्रशासन की परीक्षा
क्षेत्र में यह चर्चा तेज़ है कि पशुधन प्रसार अधिकारी मुकेश कुमार और ड्राइवर अशोक कुमार से जुड़े कई मामलों के साक्ष्य एकत्र किए जा रहे हैं, जिन्हें जल्द ही जिला प्रशासन के समक्ष रखा जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करेगा या फिर यह तंत्र यूं ही ग्राम प्रधानों को डराकर लूटता रहेगा?
गौवंश संरक्षण के नाम पर यदि भ्रष्टाचार फलता-फूलता रहा, तो यह सिर्फ़ योजनाओं की विफलता नहीं—प्रशासनिक नैतिकता पर सीधा प्रश्न होगा।










