5वीं फेल लेकिन ठगी में ‘टॉपर’! इन शातिरों की चाल से पुलिस भी सन्न

मुजफ्फरनगर पुलिस द्वारा डिजिटल अरेस्ट ठगी मामले में गिरफ्तार तीन आरोपी पुलिस अधिकारियों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
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5वीं फेल लेकिन ठगी में ‘टॉपर’—मुजफ्फरनगर की साइबर क्राइम पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर देशभर में करोड़ों की ठगी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया। छह महीने में फैले नेटवर्क, क्रिप्टो में बदली रकम और दर्जनों शिकायतों ने जांच एजेंसियों को चौंका दिया।

मुजफ्फरनगर: 5वीं फेल लेकिन ठगी में ‘टॉपर’—यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि हकीकत है। जिले की साइबर क्राइम पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर देशभर में लोगों को डराकर करोड़ों रुपये ऐंठने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है। हैरानी की बात यह है कि गिरफ्तार किए गए आरोपी महज पांचवीं कक्षा तक पढ़े हैं, लेकिन तकनीक और ठगी के नेटवर्क को संचालित करने में इनकी चालाकी ने अनुभवी अधिकारियों को भी सन्न कर दिया।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान और बरामदगी

साइबर क्राइम टीम ने तीन युवकों—नदीम पुत्र मेहरबान, गुफरान पुत्र मुस्तफा और मयूर अफजल राणा पुत्र नौशाद राणा—को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, ये सभी अलग-अलग थाना क्षेत्रों के निवासी हैं और पिछले छह महीनों से डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर लोगों को जाल में फंसा रहे थे। आरोपियों के पास से दो मोबाइल फोन, एक चेकबुक और लेनदेन का विस्तृत ब्यौरा दर्ज डायरी बरामद हुई है, जो इस नेटवर्क की परतें खोलने में अहम सबूत साबित हो सकती है।

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कैसे चलता था ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल?

जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी खुद को किसी सरकारी अधिकारी, जांच एजेंसी या साइबर सेल से जुड़ा बताकर फोन करते थे। पीड़ित को यह कहकर डराया जाता कि उसका नाम किसी गंभीर आपराधिक मामले में सामने आया है और उसे “डिजिटल अरेस्ट” किया जा सकता है। इस शब्दावली का इस्तेमाल कर आरोपियों ने भय का ऐसा वातावरण बनाया कि घबराए लोग गिरफ्तारी से बचने के लिए तुरंत बताए गए बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कर देते थे।

यह गिरोह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में माहिर था। फोन कॉल के दौरान पीड़ित को लाइन पर रोके रखना, कानूनी शब्दों का प्रयोग करना और तत्काल निर्णय लेने का दबाव बनाना—ये सभी तरीके ठगी को सफल बनाने में सहायक होते थे।

5 प्रतिशत कमीशन और फर्जी खातों का जाल

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, आरोपी अन्य लोगों के बैंक खाते 5 प्रतिशत कमीशन पर उपलब्ध कराते थे। यदि किसी खाते पर शिकायत के बाद रोक लग जाती, तो तुरंत नए नामों से खाते खुलवाकर लेनदेन जारी रखा जाता। यह पूरा नेटवर्क परत-दर-परत तैयार किया गया था, जिससे वास्तविक संचालकों तक पहुंच पाना चुनौतीपूर्ण हो जाए।

खास बात यह है कि ठगी से प्राप्त रकम को निकालकर उसे क्रिप्टो करेंसी (यूएसडीटी) में बदल दिया जाता था। इससे पैसों के स्रोत को ट्रैक करना और भी मुश्किल हो जाता था। पुलिस अब क्रिप्टो ट्रांजैक्शन की तकनीकी जांच कर रही है, ताकि नेटवर्क के बड़े सरगनाओं तक पहुंचा जा सके।

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85 करोड़ की ठगी का उल्लेख, 60 लाख की पुष्टि

इस पूरे गिरोह का भंडाफोड़ गृह मंत्रालय के ऑनलाइन पोर्टल ‘प्रतिबिंब’ पर दर्ज शिकायतों की जांच के बाद हुआ। पुलिस के अनुसार, बरामद खातों से जुड़े करीब 70 शिकायतों में 85 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी का उल्लेख है। हालांकि जांच में अब तक लगभग 60 लाख रुपये की रकम सीधे इन खातों में ट्रांसफर होने की पुष्टि हुई है। केवल पिछले दो महीनों में ही 30 लाख रुपये के लेनदेन के प्रमाण सामने आए हैं।

ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि गिरोह का नेटवर्क काफी व्यापक था और संभवतः अन्य राज्यों से भी जुड़ा हो सकता है। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सहयोगियों की तलाश में जुटी है।

साइबर ठगी के बदलते तौर-तरीके

डिजिटल अरेस्ट जैसी शब्दावली आम नागरिकों के लिए नई और डरावनी होती है। ठग इसी मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं। पहले जहां ठगी केवल ओटीपी या लिंक भेजने तक सीमित थी, वहीं अब फर्जी अधिकारी बनकर कानूनी कार्रवाई का भय दिखाना एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को जागरूक करना ही ऐसी घटनाओं से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है। कोई भी सरकारी एजेंसी फोन पर पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती। यदि ऐसा कोई कॉल आए तो तत्काल संबंधित विभाग या पुलिस से संपर्क करना चाहिए।

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पुलिस की कार्रवाई और आगे की जांच

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है और उनसे पूछताछ जारी है। अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अन्य संदिग्धों की पहचान की जा रही है। साथ ही, बैंक खातों और क्रिप्टो लेनदेन की कड़ियों को जोड़कर पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की तैयारी है।

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि सीमित शिक्षा के बावजूद तकनीक का दुरुपयोग किस हद तक किया जा सकता है। हालांकि पुलिस की सतर्कता और त्वरित कार्रवाई ने इस नेटवर्क को समय रहते उजागर कर दिया।

नागरिकों के लिए चेतावनी

यदि कोई खुद को अधिकारी बताकर डिजिटल अरेस्ट या कानूनी कार्रवाई की धमकी दे और तुरंत पैसे ट्रांसफर करने को कहे, तो सावधान हो जाएं। ऐसे मामलों में घबराने के बजाय संबंधित थाने या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत संपर्क करें। जागरूकता ही साइबर अपराध के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न: डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
उत्तर: डिजिटल अरेस्ट नाम का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। यह ठगों द्वारा गढ़ा गया डराने वाला शब्द है।

प्रश्न: यदि ऐसा कॉल आए तो क्या करें?
उत्तर: तुरंत कॉल काटें और 1930 साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी थाने से संपर्क करें।

प्रश्न: क्या पुलिस फोन पर पैसे ट्रांसफर करने को कहती है?
उत्तर: नहीं, कोई भी सरकारी एजेंसी फोन पर धनराशि ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती।

समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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