पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकसंगीत की जीवित परंपरा भोर की पहली रौशनी के साथ जाग उठती है। जब पूरब का आसमान हल्की गुलाबी आभा से भर जाता है, तब गाँव केवल उठता नहीं—धीरे-धीरे गुनगुनाने लगता है। खेत की मेड़ पर हल जोतते किसान के होंठों से अनायास निकल पड़ता है—“हो रामा…”, और आँगन में बैठी माएँ-बहनें सोहर की मधुर लय छेड़ देती हैं। यह किसी मंच का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन की सहज लय है, जो पीढ़ियों से गीत बनकर बहती आई है।
पूर्वांचल की धरती पर गीत बनाए नहीं जाते, वे अपने आप उगते हैं—जैसे गेहूँ की बालियाँ, जैसे आम के बौर। बेटा परदेस जाए तो बिरहा जन्म लेता है; सावन की पहली फुहार पड़े तो कजरी फूट पड़ती है; फगुनवा आए तो फगुआ रंगों में भीग उठता है। यहाँ लोकसंगीत मनोरंजन भर नहीं, बल्कि रिश्तों की धड़कन और जीवन की सांस है।
गाँव में कोई अकेला नहीं गाता। गीत यहाँ सामूहिक होते हैं—जैसे दुख साझा होता है, जैसे हँसी बाँटी जाती है। रोपनी करते हाथ जब थक जाते हैं, तो स्वर उन्हें सहारा देते हैं। बारात में गारी गाते हुए जो ठिठोली होती है, वह केवल रस्म नहीं—एक सामाजिक संवाद है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : लोकधुनों की जड़ें
पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकसंगीत की जड़ें भारतीय संगीत परंपरा में गहराई तक समाई हुई हैं। वेदों के सामगान से लेकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन तक संगीत जनजीवन का हिस्सा रहा। निर्गुण संत कबीर और रैदास की वाणी ने लोकभाषाओं में आध्यात्मिक चेतना को स्वर दिया, जिसकी गूंज आज भी गाँवों में सुनाई देती है।
मुगल और नवाबी काल में ठुमरी, दादरा और कजरी को शास्त्रीय रंग मिला, किंतु ग्रामीण समाज ने इन्हें अपनी सहज शैली में अपनाया। बनारस घराने की ठुमरी और पूर्वांचली कजरी के बीच सांस्कृतिक सामंजस्य इसका प्रमाण है।
प्रमुख लोकगीत शैलियाँ
(क) बिरहा: वीरता, प्रेम और विरह का सशक्त लोकगीत। प्रायः पुरुष मंडलियों द्वारा गाया जाने वाला बिरहा ऊँचे स्वर, तात्कालिक रचना और संवाद शैली के लिए जाना जाता है।
(ख) कजरी: सावन-भादो की वर्षा ऋतु में स्त्रियों द्वारा गाई जाने वाली कजरी प्रेम और प्रतीक्षा की अभिव्यक्ति है।
(ग) सोहर: शिशु जन्म के अवसर पर घर की महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला मंगल गीत।
(घ) बारहमासा: बारह महीनों के माध्यम से विरहिणी नायिका की भावनाओं का चित्रण।
(ङ) चैता और फगुआ: चैत्र और होली के अवसर पर गाए जाने वाले उत्सवधर्मी गीत।
वाद्ययंत्र और संगीत संरचना
पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकसंगीत में ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम, नगाड़ा, बांसुरी और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। इसकी संरचना में शास्त्रीयता की झलक मिलती है, परंतु भाव की प्रधानता रहती है। तानें छोटी लेकिन मार्मिक होती हैं और लय खेतों की गति जैसी स्वाभाविक।
सामाजिक जीवन में भूमिका
शादी-विवाह में मयार, मड़वा, विदाई और गारी के गीत; कृषि कार्य में रोपनी और कटनी के सामूहिक स्वर; धार्मिक अवसरों पर देवी-देवताओं की आराधना—लोकगीत जीवन के हर चरण में उपस्थित रहते हैं। लोकगीतों में स्त्रियों की आवाज विशेष रूप से मुखर है, जो सामाजिक अनुभवों को स्वर देती है।
आधुनिक दौर और चुनौतियाँ
डिजिटल युग में पारंपरिक लोकधुनों के सामने नई चुनौतियाँ हैं। फिल्मी और पॉप संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है, किंतु सोशल मीडिया ने इन्हें नया मंच भी दिया है। कई लोककलाकार आज भी ग्रामीण मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
क्यों आज भी जीवित है यह परंपरा?
पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकसंगीत की जीवित परंपरा इसलिए कायम है क्योंकि यह सामूहिक है, जीवन से जुड़ी है और भाषाई आत्मीयता से भरपूर है। इसकी सरलता और लचीलापन इसे समय के साथ बदलने की शक्ति देता है। प्रवासी समुदाय भी इसे विदेशों में जीवित रखे हुए हैं।
सांस्कृतिक पहचान और भविष्य
यह लोकसंगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की पहचान है। यदि विद्यालयों में प्रशिक्षण, सांस्कृतिक मंचों पर प्रस्तुति और शोध संस्थानों में दस्तावेजीकरण को बढ़ावा मिले, तो यह परंपरा और सुदृढ़ हो सकती है।
जब सावन की पहली बारिश में कोई स्त्री कजरी गुनगुनाती है, जब बिरहा का गायक रात भर गाँव को जगाए रखता है, और जब नवजात शिशु के घर सोहर गूंजता है—तब स्पष्ट हो जाता है कि लोकसंगीत केवल परंपरा नहीं, जीवन की लय है। और जब तक मिट्टी में संवेदना जीवित है, तब तक पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकसंगीत की जीवित परंपरा भी जीवित रहेगी।






