“गाम सै खरकरा… रोहतक जिला।” इतना कहने भर से हरियाणा का आदमी सिर हिला देगा — “हाँ भई, जाणें सै।” अगर आप हरियाणा को सिर्फ कुश्ती, देसी घी और अक्खड़ बोली से जानते हैं, तो शायद आपने उसकी असली कहानी अभी नहीं सुनी। रोहतक के पास एक गाँव है — खरकरा। छोटा-सा नाम, लेकिन भीतर एक पूरा समाज छिपा हुआ है। यह गाँव बताता है कि बदलाव कैसे आता है — बिना शोर किए। और परंपरा कैसे टिकती है — बिना झंडा उठाए। सुबह का धुंधलका जब अभी पूरी तरह छँटा भी नहीं होता, तब रोहतक की धरती पर कहीं बैलों की घंटियों की धीमी आवाज़ सुनाई देती है। खेतों के बीच से गुजरती पगडंडी पर धूल नहीं, इतिहास चलता है। यही है खरकरा — एक गाँव, जो सिर्फ नक्शे पर दर्ज नहीं, बल्कि पीढ़ियों की हथेलियों की लकीरों में लिखा गया है। यहाँ घरों की चौखटें सिर्फ ईंट की नहीं, रिश्तों की बनी हैं। और चौपाल पर बैठा हर बुज़ुर्ग अपने भीतर आधी सदी का दस्तावेज़ लेकर बैठा है।
इतिहास की परतें : बसावट, बिरादरी और पहचान
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार खरकरा की बसावट चार–पाँच सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है। समय के साथ यहाँ विभिन्न गोत्रों और परिवारों ने अपनी जड़ें जमाईं, पर गाँव की सामाजिक संरचना में सामूहिकता का भाव हमेशा प्रमुख रहा। हरियाणा के ग्रामीण इतिहास में ज़मीन सिर्फ उत्पादन का साधन नहीं, प्रतिष्ठा और उत्तराधिकार की पहचान भी रही है। खरकरा भी इससे अछूता नहीं। यहाँ खेतों की मेड़ों ने कई पीढ़ियों के संघर्ष देखे हैं — बँटवारे भी, मेल-मिलाप भी। दरअसल, किसी भी गाँव का इतिहास सरकारी दस्तावेज़ों से पूरा नहीं होता; वह लोककथाओं, शादियों के गीतों और चौपाल की बहसों में दर्ज होता है। खरकरा का असली इतिहास भी वहीं जीवित है।
सड़क से जुड़ा, पर मिट्टी से बंधा
महम कस्बे के निकट स्थित यह गाँव कृषि प्रधान पट्टी में आता है। राष्ट्रीय और राज्य मार्गों की नजदीकी ने इसे बाहरी दुनिया से जोड़ा, पर इसकी आत्मा अब भी खेतों की हरियाली में बसती है। यहाँ की जमीन दोआब की तरह उपजाऊ तो नहीं कही जाती, पर मेहनतकश हाथों ने इसे सोना उगलना सिखाया है। गेहूँ, सरसों, बाजरा और चारा — ये सिर्फ फसलें नहीं, यहाँ के जीवन चक्र का हिस्सा हैं। पिछले दो दशकों में ट्यूबवेल, ट्रैक्टर और आधुनिक खेती के साधनों ने तस्वीर बदली है। लेकिन इसके साथ ही पानी का स्तर गिरना और लागत बढ़ना नई चुनौतियाँ लेकर आया है। यानी भूगोल अब सिर्फ खेत का नक्शा नहीं रहा; वह अर्थव्यवस्था और भविष्य का सवाल भी बन चुका है।
बदलती सोच और पुरानी जड़ें
खरकरा की सामाजिक संरचना पारंपरिक ग्रामीण ढांचे पर आधारित है — परिवार, बिरादरी, पंचायत और सामुदायिक निर्णय। लेकिन अब तस्वीर में बदलाव है। लड़कियाँ कॉलेज जा रही हैं। लड़के नौकरी के लिए दिल्ली, गुरुग्राम और विदेश तक जा रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट ने चौपाल की जगह तो नहीं ली, पर चर्चा का दायरा जरूर बढ़ा दिया है। यह वही हरियाणा है जहाँ कभी पढ़ाई को लेकर संकोच था; आज वही गाँव अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए शहर भेज रहा है। परंतु इसके साथ एक प्रश्न भी उभरता है — क्या पलायन गाँव को खाली कर देगा? या लौटकर आने वाली नई पीढ़ी इसे और मजबूत बनाएगी?
इसी बदलते दौर के बीच खरकरा का एक युवा नाम विशेष उल्लेख का पात्र है — मनदीप सिंह। गौसेवा और गौरक्षा के क्षेत्र में उनका समर्पण पूरे इलाके के लिए प्रेरणा का स्रोत बना है। उन्होंने सिर्फ व्यक्तिगत आस्था तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि युवाओं को संगठित कर इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का वातावरण तैयार किया। गाँव और आसपास के क्षेत्रों में गौसेवा के प्रति जागरूकता बढ़ाने, सेवा-भाव को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने और युवाओं को सकारात्मक कार्य में लगाने के उनके प्रयासों ने नई ऊर्जा पैदा की है। यही प्रेरणा आगे चलकर विचार का रूप भी बनी। हाल ही में उनकी प्रेरणा से समाचार दर्पण के प्रधान संपादक अनिल अनूप द्वारा “गौरक्षा जमीन से जिम्मेदारी तक” नामक एक उपयोगी पुस्तक लिखी गई है, जो शीघ्र ही बाज़ार में उपलब्ध होने वाली है। यह पुस्तक केवल आस्था का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व और व्यावहारिक दृष्टिकोण का संतुलित प्रस्तुतीकरण मानी जा रही है।
पहचान की नई परिभाषा
हर गाँव को पहचान देने वाले उसके लोग होते हैं। जब कोई बेटा या बेटी राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाता है, तो गाँव का नाम भी साथ चलता है। खरकरा के संदर्भ में भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यहाँ से निकले कुछ व्यक्तित्वों ने व्यापक पहचान बनाई, जिससे गाँव का नाम सीमाओं से बाहर पहुँचा। लेकिन असली पहचान सिर्फ प्रसिद्धि से नहीं बनती। वह बनती है रोज़ की ईमानदार मेहनत से — खेत में, स्कूल में, फौज में या कारोबार में। खरकरा के कई परिवारों में सैनिक परंपरा भी रही है। देश सेवा और खेती — दोनों यहाँ सम्मान के विषय माने जाते हैं।
चुनौतियाँ : विकास का संतुलन
हरियाणा के अन्य गाँवों की तरह यहाँ भी कुछ प्रश्न खड़े हैं — जल स्तर में गिरावट, युवाओं का शहरों की ओर झुकाव, खेती की बढ़ती लागत, सामाजिक संरचना में बदलती प्राथमिकताएँ पर इन सबके बीच एक चीज़ स्थिर है — सामूहिकता। गाँव में आज भी शादी-ब्याह, दुःख-सुख सामूहिक होते हैं। चौपाल में बैठकर फैसले लिए जाते हैं। यानी आधुनिकता आई है, मगर उसने परंपरा को विस्थापित नहीं किया — सिर्फ उसका रूप बदला है।
खरकरा क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह हरियाणा का प्रतिनिधि गाँव है। यह बताता है कि ग्रामीण भारत ठहरा हुआ नहीं है; वह बदल रहा है — धीरे, पर गहराई से। यहाँ की सुबह में अतीत की गूंज है, और शाम में भविष्य की आहट। जो लोग हरियाणा को सिर्फ एक छवि में देखते हैं, उन्हें खरकरा जैसे गाँव समझाते हैं कि असली कहानी बहुस्तरीय है — मेहनत, संघर्ष, बदलाव और आत्मसम्मान की कहानी।
मिट्टी का मोल
खरकरा कोई पर्यटन स्थल नहीं, न ही किसी बड़े औद्योगिक नक्शे का केंद्र। फिर भी यह महत्वपूर्ण है — क्योंकि यहाँ जीवन अपनी मूल अवस्था में दिखाई देता है। यह गाँव हमें सिखाता है कि विकास सिर्फ ऊँची इमारतों से नहीं मापा जाता; वह मापा जाता है शिक्षा, सम्मान और सामूहिकता से। “गाम सै खरकरा… रोहतक जिला।” अब यह वाक्य सिर्फ परिचय नहीं रहा — यह एक भाव है। एक ऐसा भाव, जिसमें हरियाणा की मिट्टी की सोंधी खुशबू है, और बदलते समय की धीमी पर स्थिर चाल भी।
खरकरा गाँव किस जिले में स्थित है?
खरकरा गाँव हरियाणा के रोहतक जिले में स्थित है और महम क्षेत्र के निकट आता है।
खरकरा की सामाजिक पहचान क्या है?
यह गाँव अपनी पारंपरिक सामूहिकता, कृषि-आधारित जीवन और बदलती शिक्षा व रोजगार प्रवृत्तियों के कारण विशेष पहचान रखता है।
गौसेवा के क्षेत्र में गाँव की क्या भूमिका है?
गाँव के युवा मनदीप सिंह जैसे व्यक्तित्वों ने गौसेवा और गौरक्षा के क्षेत्र में प्रेरक भूमिका निभाई है, जिससे युवाओं में सकारात्मक सामाजिक भागीदारी बढ़ी है।






