उम्र के फासले पर उठे सवाल : 15 साल के किशोर संग घर छोड़ने का मामला, शादी से पहले पुलिस की एंट्री

नाबालिग किशोर और वयस्क महिला को पुलिस हिरासत में लेते हुए, पृष्ठभूमि में पुलिस वाहन दिखाई दे रहा है

गोरखपुर। ✍️इरफान अली लारी की रिपोर्ट
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उम्र के फासले पर उठे सवाल— 15 वर्षीय किशोर और 35 वर्षीय महिला के एक साथ घर छोड़ने की घटना ने रिश्तों, अभिभावकीय सतर्कता और कानून की सीमाओं पर गंभीर बहस छेड़ दी। विवाह की तैयारी से पहले पुलिस की एंट्री ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।

उम्र के फासले पर उठे सवाल एक बार फिर तब सुर्खियों में आ गए, जब 15 वर्षीय किशोर और 35 वर्षीय महिला के साथ घर छोड़ने की घटना सामने आई। मामला सामने आते ही परिवार में हड़कंप मच गया और पुलिस को सूचना दी गई। प्रारंभिक स्तर पर इसे गुमशुदगी का मामला मानकर कार्रवाई शुरू की गई, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो स्थिति ने अलग ही रूप ले लिया। बताया गया कि दोनों विवाह की तैयारी में थे, तभी पुलिस मौके पर पहुंच गई।

कक्षा 9 में पढ़ने वाला किशोर और कथित संबंध

जानकारी के अनुसार, 15 वर्षीय किशोर स्थानीय विद्यालय में कक्षा 9 का छात्र है। परिजनों का कहना है कि वह पढ़ाई में सामान्य था और रोजमर्रा की तरह स्कूल जाता था। हालांकि, पिछले कुछ समय से उसकी गतिविधियों में बदलाव देखा जा रहा था। परिवार को संदेह नहीं था कि वह इस प्रकार घर छोड़ देगा। जब दोनों एक साथ गायब हुए तो घरवालों ने आसपास तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। इसके बाद थाने में सूचना दी गई।

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घर से लापता, पुलिस ने शुरू की तलाश

परिजनों द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर पुलिस ने गुमशुदगी का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। मोबाइल लोकेशन और स्थानीय इनपुट के आधार पर पता चला कि दोनों शहर में ही मौजूद हैं। इसके बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची और दोनों को हिरासत में लेकर थाने लाई। पूछताछ में दोनों ने विवाह करने की इच्छा जताई। हालांकि, चूंकि किशोर नाबालिग है, इसलिए कानून की दृष्टि से विवाह संभव नहीं था।

उम्र का फासला और कानूनी स्थिति

इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम पहलू उम्र का अंतर है। भारतीय कानून के अनुसार विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष निर्धारित है। 15 वर्षीय किशोर के मामले में यह स्पष्ट है कि वह नाबालिग है। ऐसे में किसी भी प्रकार का वैवाहिक निर्णय विधिसम्मत नहीं माना जा सकता। पुलिस सूत्रों का कहना है कि यदि परिजन औपचारिक शिकायत दर्ज कराते, तो मामले में गंभीर धाराएं भी लग सकती थीं।

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परिजनों की प्रतिक्रिया और सामाजिक पहलू

परिवार का कहना है कि दोनों के बीच बातचीत होती थी, लेकिन रिश्तेदारी के कारण किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। दरअसल, ग्रामीण परिवेश में पारिवारिक संवाद सामान्य बात मानी जाती है। इसी भरोसे ने शायद सतर्कता को कम कर दिया। घटना के बाद गांव में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव ने किशोरों की सोच और व्यवहार पर गहरा असर डाला है।

26 जनवरी को अचानक गायब

बताया गया कि 26 जनवरी की दोपहर दोनों घर से लापता हो गए। काफी तलाश के बाद भी जब कोई जानकारी नहीं मिली, तब पुलिस को सूचना दी गई। सोमवार तक दोनों विवाह करने की जिद पर अड़े रहे। अंततः परिजनों और पुलिस अधिकारियों की समझाइश के बाद दोनों घर लौटने को राजी हुए। फिलहाल किसी भी पक्ष की ओर से लिखित शिकायत नहीं दी गई है।

थाने में बुलाए गए मायके वाले

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने किशोर के माता-पिता और महिला के मायके पक्ष को थाने बुलाया। दोनों परिवारों के बीच लंबी बातचीत हुई। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि नाबालिग से जुड़ा कोई भी निर्णय कानून के दायरे में ही लिया जाएगा। चूंकि किसी भी पक्ष ने औपचारिक शिकायत नहीं दी, इसलिए पुलिस ने फिलहाल दोनों को परिजनों के सुपुर्द कर दिया है।

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विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था में भावनात्मक आकर्षण स्वाभाविक होता है, लेकिन अभिभावकीय मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। यदि संवाद की कमी हो जाए, तो बच्चे बाहरी प्रभावों में बह सकते हैं। वहीं समाजशास्त्री इसे पारिवारिक संरचना और निगरानी की कमजोरी से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि डिजिटल युग में अभिभावकों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

कानून और समाज के बीच संतुलन

यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रश्न भी खड़े करती है। उम्र का फासला, रिश्तों की मर्यादा और कानून की सीमाएं—इन सबके बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। हालांकि पुलिस ने इस मामले को फिलहाल समझाइश के आधार पर सुलझा लिया, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी घटनाएं चेतावनी देती हैं कि पारिवारिक संवाद और कानूनी जागरूकता दोनों की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: उम्र के फासले पर उठे सवाल केवल एक खबर नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा आईना हैं। नाबालिगों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता, कानूनी समझ और पारिवारिक सतर्कता—तीनों का संतुलन बेहद जरूरी है।
समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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