नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन: ईपीएफ-ईएसआई घोटाले ने खोली कार्यदायी संस्थाओं की परतें

नगर निगम ईपीएफ-ईएसआई गबन प्रकरण को दर्शाती सांकेतिक इमेज, जिसमें पैसों की बोरी, EPF-ESI लिखा बैग, रिश्वत लेता अधिकारी और नगर भवन की पृष्ठभूमि दिखाई गई है।

✍️कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन मामले ने न केवल पांच हजार से अधिक कर्मचारियों के ईपीएफ और ईएसआई धन की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि निगम की निगरानी व्यवस्था और कार्यदायी संस्थाओं की जवाबदेही को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।

नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन एक ऐसा मामला बनकर उभरा है जिसने प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता और श्रमिकों के अधिकारों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। वर्ष 2013 से 2015 के बीच कार्यरत हजारों कर्मचारियों के भविष्य निधि (EPF) और कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) अंशदान की राशि कथित रूप से संबंधित संस्थाओं द्वारा जमा नहीं की गई। यह खुलासा तब हुआ जब विधानसभा में प्रस्तुत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के बाद गठित लोक लेखा समिति ने विस्तृत जांच की।

जांच के निष्कर्षों के आधार पर नगर स्वास्थ्य अधिकारी (NSA) डॉ. पी.के. श्रीवास्तव ने हजरतगंज कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर दी। तहरीर में कई कंपनियों के नाम और कथित गबन की रकम का उल्लेख किया गया है। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों कर्मचारियों के भविष्य से भी जुड़ा है जिनके सामाजिक सुरक्षा अधिकारों के साथ खिलवाड़ हुआ।

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किन कंपनियों पर कितना आरोप?

एफआईआर की तहरीर में जिन कंपनियों के नाम सामने आए हैं, उनमें मेसर्स राजश्री पर 17.88 लाख रुपये और 14.31 लाख रुपये, स्वच्छकार इंटरप्राइजेज पर 3.57 करोड़ रुपये, पटवा एसोसिएट पर 3.57 करोड़ रुपये, ड्रैगन सिक्योरिटी पर 10.73 लाख रुपये, शार्क सिक्योरिटी पर 25 लाख रुपये, ईगल हंटिंग पर 28.62 लाख रुपये तथा आर्यन सिक्योरिटी पर 10.73 लाख रुपये गबन का आरोप लगाया गया है।

हालांकि कुल मिलाकर नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन प्राथमिक रूप से दर्ज किया गया है, किंतु लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में करोड़ों रुपये की अनियमितता का संकेत दिया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि मामले की परतें अभी पूरी तरह खुलनी बाकी हैं और जांच की दिशा आगे और भी बड़े खुलासों की ओर संकेत कर सकती है।

लोक लेखा समिति की जांच में क्या सामने आया?

लोक लेखा समिति ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि पांच हजार से अधिक कर्मचारियों का ईपीएफ और ईएसआई अंशदान नियमानुसार जमा नहीं किया गया। समिति ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए संबंधित संस्थाओं से वसूली की अनुशंसा की। समिति का मानना था कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित लापरवाही या संभावित मिलीभगत का परिणाम हो सकता है।

CAG रिपोर्ट के आधार पर गठित इस समिति ने स्पष्ट कहा कि कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा कोष के साथ इस प्रकार का व्यवहार न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह श्रमिकों के अधिकारों का भी हनन है।

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लॉयन सिक्योरिटी पर उठते सवाल

इस पूरे प्रकरण में लॉयन सिक्योरिटी और उससे जुड़ी फर्मों का नाम तहरीर में शामिल नहीं किया गया। नगर निगम का तर्क है कि इन फर्मों ने कथित गबन की गई राशि वापस जमा करा दी थी। हालांकि यह तर्क कई नए सवाल खड़े करता है। यदि गबन हुआ था और बाद में रकम लौटाई गई, तो क्या केवल राशि वापसी पर्याप्त है? क्या ऐसी संस्था को ब्लैकलिस्ट नहीं किया जाना चाहिए था?

विशेष रूप से तब, जब बताया जा रहा है कि उक्त कंपनी को शहर के तीन प्रमुख जोनों में कूड़ा उठाने और रोड स्वीपिंग का कार्य भी सौंपा गया। यह निर्णय नीति-निर्माण की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

कर्मचारियों के भविष्य पर असर

ईपीएफ और ईएसआई जैसी योजनाएं कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा का आधार होती हैं। यदि नियोक्ता या कार्यदायी संस्था कर्मचारी के वेतन से कटौती कर राशि जमा न करे, तो यह सीधा विश्वासघात है। पांच हजार से अधिक कर्मचारियों का पैसा समय पर जमा न होना उनके भविष्य, पेंशन और चिकित्सा सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

इस दृष्टि से नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की चिंता और असुरक्षा का प्रतीक है।

क्या निगम किसी को बचा रहा है?

सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कुछ संस्थाओं ने रकम वापस नहीं की है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गति क्या है? क्या वसूली की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है? क्या भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए निगरानी तंत्र मजबूत किया जाएगा?

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लॉयन सिक्योरिटी को ब्लैकलिस्ट न करने और उसे नए कार्य आवंटित करने का निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोष सिद्ध होता है तो केवल धनवापसी पर्याप्त दंड नहीं हो सकता। संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

प्रशासनिक जवाबदेही और आगे की राह

NSA द्वारा एफआईआर दर्ज कराने की पहल को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। किंतु वास्तविक सुधार तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष हो, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और कर्मचारियों की राशि पूर्ण रूप से सुरक्षित की जाए। साथ ही निगम को अपने अनुबंध तंत्र और निगरानी प्रणाली की समीक्षा करनी होगी।

पारदर्शिता, समयबद्ध ऑडिट और डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली जैसे उपाय भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने में सहायक हो सकते हैं।

निष्कर्ष: जवाबदेही तय होना जरूरी

अंततः नगर निगम में 1.14 करोड़ रुपये का गबन प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि सामाजिक सुरक्षा कोष के प्रबंधन में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती। कर्मचारियों का विश्वास तभी बहाल होगा जब दोषियों को दंडित किया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के ठोस कदम उठाए जाएं।

समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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