लुधियाना। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
अनिल अनूप की नई वैचारिक पुस्तक “औरत: पूजा से परछाईं तक” शीघ्र प्रकाशन के लिए तैयार है। यह पुस्तक स्त्री-अस्तित्व, सामाजिक नैतिकता, घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और देह बाज़ार जैसे जटिल विषयों पर गहन और संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
समाज से सीधा और असहज प्रश्न
पुस्तक का मूल प्रश्न अत्यंत सीधा है—औरत कहीं माँ है, कहीं बेटी है, कहीं पत्नी है, तो फिर वही औरत कहीं वेश्या, कहीं कॉल गर्ल, कहीं बार बाला क्यों? यही प्रश्न इस पूरी कृति की वैचारिक धुरी है।
भावुकता नहीं, संरचनात्मक विश्लेषण
यह पुस्तक किसी व्यक्ति या वर्ग को दोष देने के बजाय सामाजिक संरचना की परतों को खोलती है। इसमें आदर्शीकरण, विवाह संस्था, घरेलू हिंसा, तस्करी के जाल, ग्राहक की भूमिका, चयनात्मक नैतिकता तथा कानून और पुनर्वास की वास्तविक स्थिति पर गंभीर विमर्श किया गया है।
लेखक अनिल अनूप का दृष्टिकोण
अनिल अनूप तीन दशकों से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े हैं और सामाजिक विषयों पर उनकी संतुलित एवं निर्भीक दृष्टि के लिए पहचाने जाते हैं। वे इससे पूर्व “पतिता”, “गर्म गोश्त”, “सन्नाटे की आवाज”, “गौरक्षा जमीन से जिम्मेदारी तक” जैसे चर्चित शीर्षकों सहित अनेक प्रमुख पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। उनकी सभी पूर्व प्रकाशित कृतियाँ अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसे प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं और पाठकों द्वारा सराही गई हैं।
समाधान की दिशा में पहल
पुस्तक केवल समस्या नहीं बताती, बल्कि शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, कौशल विकास और सामाजिक पुनर्स्वीकृति जैसे संभावित विकल्पों पर भी गंभीर चर्चा करती है।
प्रकाशन एवं उपलब्धता
इस महत्वपूर्ण कृति का प्रकाशन हरिद्वार स्थित वैदिक प्रकाशन द्वारा किया जा रहा है। पुस्तक शीघ्र ही अमेज़न, फ्लिपकार्ट सहित सभी प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी, जिससे देश-विदेश के पाठक इसे आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।
एक पुस्तक नहीं, सामाजिक आईना
“औरत: पूजा से परछाईं तक” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि समाज के सामने रखा गया एक प्रश्न है। लेखक का संदेश स्पष्ट है—औरत को हमने ही पूजा बनाया और हमने ही परछाईं बनाया; अब समय है उसे मनुष्य के रूप में देखने का।






