यूपी बजट पर अखिलेश का बयान सामने आते ही प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत 9.12 लाख करोड़ रुपये के आम बजट को लेकर विधानसभा से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे महज “आंकड़ों की बाजीगरी” करार देते हुए सरकार के आर्थिक प्रबंधन और नीतिगत दिशा पर प्रश्नचिह्न लगाया। वहीं कांग्रेस नेताओं ने भी बजट को दिशाहीन और जनविरोधी बताते हुए कई मोर्चों पर सरकार को घेरा।
बजट के आकार पर सियासी सवाल
सरकार ने 9.12 लाख करोड़ रुपये के बजट को ऐतिहासिक बताते हुए इसे विकास का रोडमैप कहा है। हालांकि विपक्ष का तर्क है कि बजट का आकार बड़ा होना अपने आप में उपलब्धि नहीं होता। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार केवल बड़े आंकड़े पेश कर राजनीतिक संदेश देना चाहती है, जबकि वास्तविकता यह है कि पिछले बजटों में स्वीकृत राशि का पूरा उपयोग नहीं हो पाया। उन्होंने दावा किया कि सरकार 50 प्रतिशत राशि भी प्रभावी ढंग से खर्च नहीं कर सकी।
उनका कहना था कि यदि योजनाओं पर जमीन स्तर पर खर्च और परिणाम दिखाई नहीं देते, तो बजट का आकार महज कागजी दस्तावेज बनकर रह जाता है। उन्होंने बजट को “विदाई बजट” की संज्ञा देते हुए कहा कि जनता अब आंकड़ों से आगे ठोस बदलाव चाहती है।
जीएसडीपी और तीन ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य
अखिलेश यादव ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार के दावों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य दिखाया जा रहा है, जबकि इसके लिए प्रदेश की सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) को लगभग 90 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचाना होगा। वर्तमान अनुमान लगभग 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास बताया जा रहा है, जो लक्ष्य से काफी दूर है।
उन्होंने प्रति व्यक्ति आय का मुद्दा उठाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर निचले पायदान पर है। उनके अनुसार, जब तक आम नागरिक की आय, रोजगार और जीवन स्तर में सुधार नहीं होता, तब तक बड़े आर्थिक लक्ष्य केवल घोषणाएं ही रहेंगे।
महंगाई, बेरोजगारी और किसान आय पर सवाल
यूपी बजट पर अखिलेश का बयान केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने महंगाई और बेरोजगारी को प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उनका आरोप था कि युवाओं के लिए रोजगार सृजन की ठोस योजना बजट में स्पष्ट नहीं है। किसान आय दोगुनी करने का वादा भी अधूरा बताया गया।
उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि दवाओं और चिकित्सा व्यवस्था में लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं। कानून-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और अपराध के मामलों में कठोर कार्रवाई का अभाव दिखता है।
कांग्रेस की तीखी प्रतिक्रिया
कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा (मोना) ने बजट को “दिशाहीन और खोखला” बताया। उनका कहना था कि इतने बड़े बजट में नई योजनाओं के लिए बहुत सीमित प्रावधान किया गया है। उन्होंने आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि कुल बजट का छोटा हिस्सा ही नई योजनाओं के लिए निर्धारित है, जो सरकार के विजन पर सवाल खड़ा करता है।
उन्होंने इसे किसान विरोधी बताते हुए कहा कि युवाओं, महिलाओं और छोटे व्यापारियों के लिए कोई बड़ी नई पहल नजर नहीं आती। आउटसोर्सिंग कर्मचारियों और अनुदेशकों के मानदेय संबंधी मुद्दों पर भी स्पष्ट आवंटन न होने का आरोप लगाया गया।
मनरेगा और वित्तीय प्रबंधन पर बहस
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी बजट पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि मनरेगा जैसी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर संदेह है। उन्होंने मांग की कि सरकार पिछले बजट के खर्च का श्वेत पत्र जारी करे ताकि जनता को वास्तविक स्थिति का पता चल सके। कांग्रेस ने प्रदेशव्यापी पदयात्रा की घोषणा कर इस मुद्दे को जन-आंदोलन का रूप देने की बात कही।
सरकार का पक्ष और राजनीतिक संदर्भ
हालांकि सरकार का दावा है कि यह बजट प्रदेश के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और निवेश को गति देने वाला है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ के लिए बजट की आलोचना कर रहा है। उनका तर्क है कि बड़े निवेश और विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय अनुशासन और चरणबद्ध खर्च जरूरी होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी बजट पर अखिलेश का बयान आने वाले चुनावी परिदृश्य की झलक भी देता है। बजट केवल वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी होता है। ऐसे में विपक्ष की रणनीति सरकार के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने की दिखती है।
जनता की नजर में असली सवाल
आखिरकार सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इस बजट से आम नागरिक को क्या मिलेगा। क्या रोजगार के अवसर बढ़ेंगे? क्या किसानों की आय में सुधार होगा? क्या स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं में ठोस बदलाव आएगा? इन सवालों के उत्तर आने वाले महीनों में योजनाओं के क्रियान्वयन से स्पष्ट होंगे।
फिलहाल, यूपी बजट पर अखिलेश का बयान और कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक बहस को नई धार दे दी है। जहां सरकार इसे विकास का दस्तावेज बता रही है, वहीं विपक्ष इसे आंकड़ों का खेल करार दे रहा है। जनता की नजर अब इस पर है कि बजट के वादे जमीन पर कितनी तेजी और पारदर्शिता से उतरते हैं।






