रडयेलुपु देवी माता यात्रा : जंगलों के बीच उमड़ती आस्था, हर दो साल में सजता श्रद्धा का महासंगम

रडयेलुपु देवी माता यात्रा में बैल बंडी, ट्रैक्टर और पैदल आते श्रद्धालु, जंगलों के बीच मंदिर परिसर में उमड़ी भीड़ और महिलाओं द्वारा कलश यात्रा का दृश्य

✍️ सदानंद इंगिली की रिपोर्ट
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हूक प्वाइंट : रडयेलुपु देवी माता यात्रा सिरोंचा तालुका के समीप आयोजित होने वाला वह धार्मिक उत्सव है, जहां बिना प्रचार-प्रसार के भी हजारों श्रद्धालु बैल बंडी, ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों से पहुँचकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

रडयेलुपु देवी माता यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि ग्रामीण आस्था और परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है। सिरोंचा तालुका से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर तथा मेदाराम से मात्र 3 किलोमीटर अंदर, घने जंगलों से घिरे शांत वातावरण में स्थित यह छोटा सा मंदिर हर दो वर्ष में श्रद्धालुओं के महासागर में बदल जाता है। चारों ओर हरियाली और बीच से गुजरती डांबरी सड़क इस स्थान को और भी आकर्षक बना देती है। बिना किसी बड़े प्रचार के भी यहाँ हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो इस यात्रा की लोकप्रियता और श्रद्धा की गहराई को दर्शाती है।

आस्था का केंद्र : जंगलों के बीच स्थित छोटा सा मंदिर

रडयेलुपु देवी माता का मंदिर आकार में भले ही छोटा हो, किंतु श्रद्धालुओं के लिए यह आस्था का विराट केंद्र है। मंदिर परिसर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, जहां पहुँचते ही मन में शांति का संचार होता है। यात्रा के दिनों में यह परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठता है। बैल बंडी, ट्रैक्टर और टू-व्हीलर से आने वाले श्रद्धालु इस स्थान को एक विशाल मेले में बदल देते हैं। ग्रामीण परिवेश की सादगी और श्रद्धा की गहराई इस यात्रा की सबसे बड़ी पहचान है।

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देवी की कृपा और पुजारी पर दिव्य अवतार

इस मंदिर के पुजारी इंगिली पोचन्ना रामय्या के बारे में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मान्यता है कि यात्रा के दौरान देवी स्वयं उनके शरीर पर प्रकट होती हैं और भक्तों की समस्याओं का समाधान बताती हैं। लोग अपनी पारिवारिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परेशानियों को लेकर यहाँ आते हैं। विशेष रूप से जिन दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त नहीं होता, वे यहाँ देवी से प्रार्थना करते हैं और प्रसाद स्वरूप संतान प्राप्ति का आशीर्वाद पाते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा भक्तों के विश्वास को और मजबूत करती है।

महिलाओं की विशेष भागीदारी और मनोकामना पूर्ति की परंपरा

रडयेलुपु देवी माता यात्रा में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से देखने को मिलती है। वे बड़े प्रेम और श्रद्धा से माँ की पूजा-अर्चना करती हैं। अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ वे देवी के चरणों में नतमस्तक होती हैं। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर बकरी या मुर्गी की बलि भी चढ़ाते हैं, जो स्थानीय परंपरा का हिस्सा है। हालांकि यह परंपरा सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी है, परंतु भक्तों के लिए यह उनकी श्रद्धा और आस्था की अभिव्यक्ति है।

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हर दो साल में दो दिवसीय भव्य आयोजन

रडयेलुपु देवी माता यात्रा हर दो वर्ष में आयोजित होती है और यह दो दिन तक चलने वाला भव्य धार्मिक आयोजन है। इन दो दिनों में आसपास के गांवों और मंडलों से हजारों भक्त यहाँ पहुँचते हैं। तेलंगाना के नारायणपुर, सिरकोंडा, मेदाराम, रोमपल्ली, मर्रिगुडम, तिगलगुडम, झिंगानूर, सिरोंचा और चेन्नूर मंडल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं। बिना किसी सरकारी पहचान या बड़े प्रचार-प्रसार के भी इतनी विशाल भीड़ का जुटना इस यात्रा की लोकप्रियता का प्रमाण है।

15-20 वर्षों से चली आ रही परंपरा

लगभग 15 से 20 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही रडयेलुपु देवी माता यात्रा अब स्थानीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। मंदिर के संचालन और यात्रा के खर्च का भार स्वयं पुजारी द्वारा उठाया जाता है। यह तथ्य इस यात्रा की सादगी और समर्पण को दर्शाता है। बिना किसी बड़े प्रायोजन या सरकारी सहायता के भी यह आयोजन हर बार सफलतापूर्वक संपन्न होता है।

ग्रामीण आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक

रडयेलुपु देवी माता यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामुदायिक सहभागिता का भी प्रतीक है। विभिन्न गांवों और क्षेत्रों से आए लोग यहाँ मिलते हैं, संवाद करते हैं और एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा करते हैं। यह यात्रा ग्रामीण समाज को जोड़ने का माध्यम बन चुकी है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माँ रडयेलुपु सभी भक्तों को समान रूप से आशीर्वाद देती हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।

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बिना प्रचार भी उमड़ती भीड़ : आस्था की असली ताकत

आज के दौर में जहाँ हर आयोजन के लिए प्रचार-प्रसार आवश्यक माना जाता है, वहीं रडयेलुपु देवी माता यात्रा बिना किसी बड़े विज्ञापन या सोशल मीडिया प्रचार के ही हजारों लोगों को आकर्षित करती है। यह दर्शाता है कि सच्ची आस्था को किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। भक्त अपने अनुभवों के आधार पर अन्य लोगों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करते हैं और यही कारण है कि हर दो वर्ष में यहाँ श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो रडयेलुपु देवी माता यात्रा ग्रामीण संस्कृति, आस्था और परंपरा का अनूठा संगम है। जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर हर दो साल में श्रद्धा का केंद्र बन जाता है, जहाँ भक्त अपने विश्वास के साथ पहुँचते हैं और संतोष के साथ लौटते हैं। माँ रडयेलुपु की कृपा और आशीर्वाद से जुड़े अनुभव श्रद्धालुओं के मन में गहरी छाप छोड़ते हैं। यही कारण है कि यह यात्रा वर्षों से निरंतर जारी है और भविष्य में भी आस्था का यह दीप इसी प्रकार प्रज्वलित रहता रहेगा।

समाचार दर्पण 24 के संपादक कार्य करते हुए, संयमित शब्द और गहरे असर वाली पत्रकारिता का प्रतीकात्मक दृश्य
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