चलो गाँव की ओर: “अमृत सरोवर या अधूरी कहानी?”—जब कागज़ों की चमक, ज़मीन की सच्चाई से हार गई


🖊️ संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
सार समाचार: कागज़ों में ‘अमृत’, ज़मीन पर ‘अधूरापन’—चित्रकूट के गांवों में लाखों खर्च के बावजूद सूखते सरोवर और टूटता भरोसा, सवालों के घेरे में पूरी व्यवस्था।
चित्रकूट के रामनगर ब्लॉक के गांवों में अमृत सरोवर योजना की जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े कर रही है। लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद बल्हौरा, भखरवार और लोधौरा बरेठी में तालाबों की स्थिति बदहाल बनी हुई है। योजना के तहत विकास और सौंदर्यीकरण के दावे कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं, जबकि ग्रामीणों को अब भी अधूरे कार्य और अनसुनी शिकायतों का सामना करना पड़ रहा है। यह रिपोर्ट सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति और जवाबदेही पर गंभीर चर्चा को जन्म देती है।

गाँव की पगडंडियाँ कभी सिर्फ रास्ते नहीं होतीं—वे सच तक पहुँचने का जरिया होती हैं। जब “चलो गाँव की ओर” जागरूकता अभियान की टीम रामनगर ब्लॉक के भीतर दाखिल हुई, तो उद्देश्य साफ था—सरकार की महत्वाकांक्षी योजना “अमृत सरोवर” की हकीकत को करीब से देखना। लेकिन जो तस्वीर सामने आई, वह उम्मीदों की नहीं, बल्कि सवालों की थी।

नदी-नालों और तालाबों की साफ-सफाई व सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने की बात कही गई। कागज़ों में योजनाएँ चमकती दिखीं, रिपोर्टों में प्रगति के आंकड़े दमकते नजर आए। लेकिन जैसे ही बल्हौरा, भखरवार और लोधौरा बरेठी की ज़मीन पर कदम पड़ा, तो लगा जैसे सच्चाई कहीं और ही सांस ले रही है।

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📊 योजना, बजट और जमीनी अंतर

“अमृत सरोवर” योजना की शुरुआत केंद्र सरकार ने 2022 में की थी, जिसका उद्देश्य था—देशभर में 75-75 जलाशयों का निर्माण और पुनर्जीवन। उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत हजारों सरोवरों को विकसित करने का लक्ष्य रखा गया।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एक अमृत सरोवर पर औसतन 8 लाख से 15 लाख रुपये तक खर्च निर्धारित किया गया। इसमें शामिल थे— खुदाई, गहरीकरण, पाथवे निर्माण, पौधारोपण और सौंदर्यीकरण। लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है—अगर प्रति सरोवर इतना खर्च हुआ, तो बल्हौरा, भखरवार और लोधौरा बरेठी में यह पैसा गया कहां? क्योंकि जमीनी स्थिति इस बजट से मेल नहीं खाती।

कागज़ों का ‘अमृत’, ज़मीन का ‘सूखा’

बल्हौरा गांव के अमृत सरोवर के किनारे खड़े होकर पहली नजर में ही साफ हो जाता है कि यह “अमृत” से ज्यादा “अधूरा” है। तालाब का पानी गंदला है, किनारे टूटी-फूटी मिट्टी से भरे हैं और चारों ओर उगी झाड़ियां इस बात की गवाही देती हैं कि यहां सौंदर्यीकरण नहीं, उपेक्षा ने अपना डेरा डाल रखा है।

स्थानीय बुजुर्ग रामसजीवन कहते हैं, “बाबू, जब काम सुरू भओ रहै, तौ लगत रहै अब गाँव चमक जइहै। अब त देखत हौ—आधा-आधू करि के छोड़ दिहिन, सब ठंडा पड़ गओ।”

यह “ठंडा पड़ना” सिर्फ काम का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। अमृत सरोवर योजना में फंड कई स्रोतों से आता है—मनरेगा (MGNREGA), 15वां वित्त आयोग, राज्य योजना और CSR। लेकिन यही बहुस्तरीय फंडिंग जवाबदेही को धुंधला कर देती है।

📉 शिकायत तंत्र: आवाज़ है, असर नहीं

ग्रामीणों से बातचीत में एक बात बार-बार सामने आई—शिकायत तो की गई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। ग्राम पंचायत से लेकर ब्लॉक स्तर तक सूचना दी गई, लेकिन कार्रवाई या तो धीमी रही या हुई ही नहीं।

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यहां सवाल उठता है—क्या शिकायत तंत्र सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है? क्योंकि अगर शिकायत दर्ज हो और समाधान न हो, तो भरोसा टूटता है।

🔍 सोशल ऑडिट और तकनीकी खामियां

मनरेगा के तहत सामाजिक लेखा परीक्षा का प्रावधान है, लेकिन इन गांवों में इसका प्रभाव नजर नहीं आया। अगर सोशल ऑडिट मजबूत होता, तो शायद हालात इतने खराब न होते।

विशेषज्ञों के अनुसार समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि तकनीकी कमी भी है—जैसे जलस्तर का गलत आकलन, मिट्टी की अनदेखी और डिजाइन का पालन न होना।

भखरवार: जहां पानी से ज्यादा सवाल जमा हैं

भखरवार के अमृत सरोवर की स्थिति और भी विचलित करने वाली है। कहीं मिट्टी धंस चुकी है, कहीं संरचनाएं टूट रही हैं और कई जगह पानी की जगह कीचड़ है।

एक युवक कहता है—“सरकार ने फोटो खिंचवाने के लिए काम किया, उसके बाद किसी ने पीछे मुड़कर देखा ही नहीं।”

लोधौरा बरेठी: अधूरी तस्वीर

लोधौरा बरेठी का सरोवर एक अधूरी पेंटिंग जैसा है। पाथवे अधूरे हैं, पौधारोपण गायब है और संरचना असंतुलित।

एक महिला कहती हैं— “हमका तौ उहै पुरान तालाबै बढ़िया लागत रहै, बाबू। उहमें कछु आस तौ रहत रही, अब तौ बस नावै रहि गओ।”

जिम्मेदारी का सवाल

क्या यह प्रशासन की लापरवाही है? क्या ठेकेदारों की उदासीनता? या सिस्टम की खामी? जवाब शायद इन सबके बीच कहीं छिपा है।

सौंदर्यीकरण या दिखावा?

तालाबों का सौंदर्यीकरण सिर्फ मिट्टी डालने का नाम नहीं है, बल्कि टिकाऊ पर्यावरण बनाने की प्रक्रिया है। लेकिन यहां जो दिखता है, वह दिखावा ज्यादा और विकास कम है।

निष्कर्ष: भरोसे की परीक्षा

यह कहानी सिर्फ तीन गांवों की नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की है जहां योजनाएं शुरू तो होती हैं, लेकिन पूरी नहीं होतीं।

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गांव अब भी इंतजार में है—काम के पूरा होने का, भरोसे के लौटने का और उस “अमृत” का जो अभी तक कागज़ों में ही बह रहा है।

❓ FAQ

अमृत सरोवर योजना क्या है?

यह केंद्र सरकार की योजना है, जिसके तहत जलाशयों का निर्माण और पुनर्जीवन किया जाता है।

एक सरोवर पर कितना खर्च होता है?

औसतन 8 से 15 लाख रुपये प्रति सरोवर खर्च निर्धारित है।

समस्याएं क्यों आ रही हैं?

निगरानी की कमी, तकनीकी खामियां और जवाबदेही का अभाव प्रमुख कारण हैं।

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