मनरेगा योजना में सेक्रेटरी की भूमिका से जुड़ा भ्रष्टाचार का मामला शाहाबाद ब्लॉक की ग्राम पंचायत कोड़रा सरैया से जुड़कर चर्चा में है। मनरेगा के अंतर्गत कराए जा रहे एक मिट्टी कार्य में मस्टररोल से संबंधित प्रविष्टियों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। आरोप है कि एक ही फोटो को अलग-अलग मस्टररोल में उपयोग किया गया, जिससे मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति और भुगतान प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह पैदा हो गया है।
हूक पॉइंट: डिजिटल निगरानी और ऑनलाइन पोर्टल के बावजूद अगर मस्टररोल प्रविष्टियों पर सवाल उठ रहे हैं, तो क्या मनरेगा की जमीनी निगरानी पर्याप्त है?
किस कार्य से जुड़ा है मामला
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत कोड़रा सरैया में मनरेगा के तहत “राकेश कुमार के खेत वाया लौंगश्री के खेत तक मिट्टी कार्य” कराया जा रहा था। इसी कार्य से जुड़े मस्टररोल में दर्ज प्रविष्टियों को लेकर आपत्ति सामने आई है। आरोपों के मुताबिक, कार्य स्थल की एक ही फोटो को अलग-अलग मस्टररोल में अपलोड किया गया, जबकि प्रत्येक मस्टररोल में मजदूरों की संख्या अलग-अलग दर्शाई गई।
मस्टररोल प्रविष्टियों पर उठे सवाल
बताया जा रहा है कि मस्टररोल नंबर 6322 में फोटो के साथ 9 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की गई। वहीं, मस्टररोल नंबर 6323 में उसी फोटो को दोबारा उपयोग करते हुए 10 मजदूरों की हाजिरी दिखाई गई। इसके अलावा मस्टररोल नंबर 6324 में उसी फोटो के आधार पर 6 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की गई।
एक ही फोटो का अलग-अलग मस्टररोल में उपयोग और मजदूरों की संख्या में अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि मस्टररोल प्रविष्टियों की प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही या अनियमितता हो सकती है। यही कारण है कि इस प्रकरण को मनरेगा योजना में सेक्रेटरी की भूमिका से जुड़ा भ्रष्टाचार का मामला मानकर देखा जा रहा है।
मनरेगा की पारदर्शिता व्यवस्था पर प्रश्न
मनरेगा योजना को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने ऑनलाइन मस्टररोल, फोटो अपलोड, जियो-टैगिंग और सार्वजनिक पोर्टल जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह है कि फर्जी हाजिरी और गलत भुगतान की संभावना को रोका जा सके। लेकिन जब एक ही फोटो को कई मस्टररोल में उपयोग किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है।
सेक्रेटरी और पंचायत स्तर की भूमिका पर निगाहें
इस पूरे मामले में पंचायत सेक्रेटरी, ग्राम विकास अधिकारी और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। मस्टररोल की प्रविष्टि, फोटो अपलोड और सत्यापन प्रक्रिया में इनकी अहम भूमिका होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रविष्टियों की जांच और सत्यापन में आवश्यक सावधानी बरती गई या नहीं।
ग्रामीणों में असंतोष, जांच की मांग
मामले की जानकारी सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों में असंतोष देखा जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा योजना गरीब और जरूरतमंद मजदूरों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन यदि मस्टररोल में अनियमितता होती है तो इसका सीधा असर उन्हीं मजदूरों पर पड़ता है।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, संबंधित मस्टररोल, फोटो और भुगतान विवरण का सत्यापन हो तथा जो भी जिम्मेदार पाए जाएं, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
प्रशासन के सामने चुनौती
यह मामला प्रशासन के लिए भी एक चुनौती बन गया है। यदि मस्टररोल प्रविष्टियों में वास्तव में अनियमितता पाई जाती है, तो इससे मनरेगा योजना की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। वहीं, समय रहते पारदर्शी जांच और उचित कार्रवाई से यह भरोसा भी कायम किया जा सकता है कि योजना में गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आगे क्या?
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि इस मामले में जांच किस स्तर तक होती है और सेक्रेटरी सहित अन्य संबंधित कर्मचारियों की भूमिका को लेकर प्रशासन क्या कदम उठाता है। फिलहाल, मस्टररोल प्रविष्टियों पर उठे सवालों ने मनरेगा योजना के क्रियान्वयन को लेकर एक अहम बहस छेड़ दी है।

