12 फरवरी की आम हड़ताल से ठीक पहले दिल्ली और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक वर्ग की गतिविधियाँ असाधारण तीव्रता के साथ सामने आ रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर घोषित इस राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल को लेकर केंद्रीय ट्रेड यूनियनें, क्षेत्रीय संघ और विभिन्न श्रमिक संगठन सड़कों, फैक्ट्रियों के गेट, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों और औद्योगिक इलाकों में व्यापक जनसंपर्क और लामबंदी अभियान चला रहे हैं। पर्चे बाँटने से लेकर गेट मीटिंग, नुक्कड़ सभाएँ, साइकिल और टेम्पो रैलियाँ तथा नुक्कड़ नाट्य प्रस्तुतियाँ—हर माध्यम के जरिए श्रमिकों को यह संदेश दिया जा रहा है कि मौजूदा श्रम नीतियाँ उनके अधिकारों, सुरक्षा और भविष्य पर सीधा हमला हैं।
यह हड़ताल केवल काम बंद का आह्वान नहीं है, बल्कि उस आर्थिक और राजनीतिक दिशा के खिलाफ खुली चुनौती है, जिसमें श्रम को लागत और पूंजी को सर्वोच्च मूल्य मान लिया गया है।
संयुक्त मोर्चे की ताकत और व्यापक समर्थन
यह आम हड़ताल केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साझा मंच के साथ-साथ संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य सहयोगी संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से बुलाई गई है। इसे वामपंथी राजनीतिक दलों, छात्र-युवा संगठनों और कई जन संगठनों का समर्थन प्राप्त है। आंदोलन के केंद्र में चार नए श्रम कानूनों को रद्द करने, न्यूनतम मजदूरी की कानूनी गारंटी, सामाजिक सुरक्षा की रक्षा तथा निजीकरण और कॉरपोरेट-समर्थक नीतियों को वापस लेने की माँगें प्रमुख हैं। श्रमिक संगठनों का तर्क है कि ये कानून दशकों की श्रम-आधारित कानूनी उपलब्धियों को कमजोर करते हैं।
सीआईटीयू का गहन और संगठित अभियान
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीआईटीयू) राजधानी क्षेत्र में सबसे सक्रिय संगठनों में शामिल है। सीआईटीयू दिल्ली के महासचिव पीवी अनियन के अनुसार, हड़ताल की तैयारियाँ दिसंबर की शुरुआत से ही शुरू हो गई थीं। दिसंबर के दूसरे सप्ताह से आम सभाओं और सदस्य बैठकों का सिलसिला चला, जो जनवरी के अंतिम सप्ताह तक जारी रहा।
सीआईटीयू ने तीन जिलों के मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर श्रम संहिता रद्द करने की माँग वाले ज्ञापन सौंपे, जिनमें भारत के राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन भी शामिल था। 9 जनवरी को आयोजित संयुक्त ट्रेड यूनियन सम्मेलन में 12 फरवरी की आम हड़ताल की औपचारिक घोषणा की गई, जिसे नेताओं ने असाधारण प्रतिक्रिया वाला कार्यक्रम बताया।
झुग्गी बस्तियों तक पहुँच और सांस्कृतिक हस्तक्षेप
इस बार सीआईटीयू ने केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित न रहते हुए औद्योगिक इलाकों से सटी झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनियों तक पहुँचने की रणनीति अपनाई। श्रम संहिता पर जनसभाएँ, चर्चाएँ और ऑनलाइन वेबिनार आयोजित किए जा रहे हैं। जन नाट्य मंच द्वारा प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘श्रम संहिता का फंदा’ ने कई इलाकों में बड़ी भीड़ को आकर्षित किया है।
12 फरवरी को बड़े प्रदर्शन की तैयारी
12 फरवरी को दिल्ली सचिवालय, जंतर-मंतर तथा नोएडा और गाजियाबाद के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालयों सहित चार प्रमुख स्थानों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की योजना है। इसके अतिरिक्त लगभग 20 औद्योगिक क्षेत्रों में छोटे स्तर पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
एआईसीसीटीयू का लैंगिक और सामाजिक दृष्टिकोण
अखिल भारतीय केंद्रीय ट्रेड यूनियन परिषद (एआईसीसीटीयू) ने श्रम सुधारों के लैंगिक प्रभाव को प्रमुखता से उठाया है। संगठन का कहना है कि वेतन की नई परिभाषाएँ “समान काम के लिए समान वेतन” जैसे अधिकार को कमजोर कर सकती हैं और महिला श्रमिकों को अधिक असुरक्षित बना सकती हैं।
एआईटीयूसी का औद्योगिक इलाकों में सीधा संपर्क
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) ने मंगोलपुरी, कीर्ति नगर, ओखला और वज़ीरपुर जैसे औद्योगिक इलाकों में प्रत्यक्ष संपर्क अभियान चलाया। नेताओं ने श्रमिकों को बताया कि 44 श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करने से किस तरह श्रमिक अधिकारों को कमजोर किया गया है।
नोएडा–गौतमबुद्ध नगर में डोर-टू-डोर अभियान
गौतमबुद्ध नगर और नोएडा में सीआईटीयू और अन्य संगठनों ने गेट मीटिंग, नुक्कड़ सभाएँ और बाइक रैलियाँ आयोजित कीं। महिला संगठनों ने रिक्शा लाउडस्पीकर अभियानों के जरिए जागरूकता फैलाई। हालिया रैली में ₹26,000 मासिक न्यूनतम मजदूरी की माँग को दोहराया गया।
कुल मिलाकर, 12 फरवरी की आम हड़ताल दिल्ली-एनसीआर में श्रमिक वर्ग के संगठित असंतोष की स्पष्ट अभिव्यक्ति बनती जा रही है। यह केवल एक दिन का विरोध नहीं, बल्कि श्रम नीतियों की दिशा पर गंभीर सवाल है।
“हम खबर को चीखने नहीं देंगे,
असर छोड़ने देंगे।”
