विकास का भ्रम और नागरिक की थकान ; काग़ज़ों में विकास, ज़मीन पर नागरिक ग़ायब

बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र के मानिकपुर में पानी की कमी, टूटी सड़कें, अधूरे पुल और कीचड़ में फंसी एंबुलेंस के बीच रोज़मर्रा का संघर्ष करता ग्रामीण जीवन।
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
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बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र में स्थित मानिकपुर सरकारी रिकॉर्ड में एक “कवर” इलाका है। सड़क, नल-जल, स्वास्थ्य, शिक्षा—हर सूची में इसका नाम है। योजनाओं की फाइलें बताती हैं कि यहां आधारभूत सुविधाओं का विस्तार हो चुका है। लेकिन नागरिक जीवन की कसौटी पर मानिकपुर आज भी अनिश्चित, असुरक्षित और अधूरा है। समस्या योजनाओं की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि परिणामों की विफलता है।

यह इलाका कभी दस्यु-प्रभाव में रहा। जंगल, पथरीली ज़मीन और दुर्गमता ने लंबे समय तक राज्य की मौजूदगी को सीमित रखा। दस्यु चले गए, लेकिन नागरिक को जो स्थिरता मिलनी थी, वह नहीं मिली। आज डर का स्वरूप बदला है—अब वह बंदूक नहीं, बल्कि अधूरे काम, स्थानीय दबदबा और शिकायत का जोखिम है। यह रिपोर्ट योजनाओं का ब्योरा नहीं देती। यह नागरिक जीवन का बयान दर्ज करती है—वह बयान, जो अक्सर शिलापट्टों के पीछे छूट जाता है।

पानी: नल लगा है, भरोसा नहीं

मानिकपुर के अधिकांश गांवों में नल लगे हैं। यह तथ्य सही है। यह भी सही है कि पानी का समय तय नहीं। कई गांवों में पानी 20–40 मिनट आता है। कहीं एक दिन छोड़कर, कहीं दो दिन में एक बार। गर्मियों में आपूर्ति और घट जाती है। मोटर खराब हुई तो पूरी बस्ती सूखी रहती है। शिकायत पर जवाब मिलता है—“ऊपर से पानी नहीं आया।” यह “ऊपर” कोई व्यक्ति नहीं, एक व्यवस्था है, जो नीचे की प्यास नहीं देखती।

इस अनिश्चितता का सबसे सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। पानी यहां सुविधा नहीं, दैनिक योजना है। किस बर्तन में कितना पानी—यही तय करता है कि घर कैसे चलेगा। बच्चों का स्कूल जाना, बुज़ुर्गों की दवा, पशुओं का पानी—सब इसी गणित पर टिका है। यह श्रम किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होता, लेकिन यही श्रम बताता है कि नल लगना और जल मिलना दो अलग बातें हैं।

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पानी की कमी स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। सीमित पानी में स्वच्छता समझौता बन जाती है। गर्मियों में जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ता है। योजना पूरी होने का दावा यहां नागरिक जीवन को राहत नहीं देता—वह केवल आँकड़ा देता है।

सड़कें: बनी हुई, लेकिन भरोसे के बाहर

मानिकपुर और आसपास संपर्क मार्ग मौजूद हैं। शिलापट्ट मौजूद हैं। बरसात आते ही इनका उपयोग संदिग्ध हो जाता है। कई रास्तों पर जलनिकासी नहीं है। पहली तेज़ बारिश में सड़क कट जाती है। कुछ गांवों में बरसात के महीनों में बाइक नहीं निकलती। यह असुविधा नहीं, अलगाव है।

इन्हीं सड़कों से बच्चे स्कूल जाते हैं, दूध बाजार पहुंचता है और बीमार अस्पताल। जब सड़क टूटती है, तो पूरा गांव रुक जाता है। निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, लेकिन सवाल पूछना यहां भविष्य के काम से बाहर होना भी हो सकता है। इसलिए लोग शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं। सड़क बनी रहती है, भरोसा नहीं बनता।

पुल और पुलिया: “लगभग पूरा” का ख़तरा

पाठा में पुल जीवन-रेखा हैं। कई जगह पुल बने हैं, लेकिन अप्रोच रोड अधूरी है या सुरक्षा नहीं है। बरसात में लोग जानते हैं कि पुल पार करना जोखिम है, फिर भी करते हैं—क्योंकि विकल्प नहीं है। यहां विकास अक्सर “लगभग पूरा” होता है। और यही “लगभग” हर साल जोखिम बनता है। अधूरा पुल सुविधा नहीं, खुला ख़तरा है।

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ग्रामीण बताते हैं कि पुल बन जाने के बाद भी साल भर निर्बाध आवागमन सुनिश्चित नहीं होता। कहीं ढलान गलत है, कहीं रेलिंग नहीं, कहीं मिट्टी भरान पहली बारिश में बह जाता है। काग़ज़ों में काम पूरा है, ज़मीन पर अधूरा।

स्वास्थ्य: सुविधा दर्ज है, समय नहीं

स्वास्थ्य केंद्र सूचीबद्ध हैं। एंबुलेंस सेवा काग़ज़ों में है। लेकिन नागरिक अनुभव बताता है कि इलाज हालात पर निर्भर है। गंभीर बीमारी या प्रसव में सबसे पहले रास्ता देखा जाता है। अगर नाला उफनाया है या सड़क कटी है, तो एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंचती।

स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने पर भी भरोसा पूरा नहीं होता—दवा और जांच की उपलब्धता स्थिर नहीं है। लोग आख़िरी समय तक इंतज़ार करते हैं। यहां समस्या इलाज की नहीं, समय पर इलाज की है।

शिक्षा: भवन है, निरंतरता नहीं

स्कूल हैं, नामांकन दर्ज है। लेकिन स्कूल तक पहुंचने का रास्ता और स्कूल के भीतर की सुविधाएं कमजोर हैं। कई स्कूलों में पानी अनियमित है। शौचालय हैं, पर रखरखाव नहीं। बरसात में रास्ता खराब होने से उपस्थिति गिरती है। इसका सबसे अधिक असर बच्चियों पर पड़ता है।

यह ड्रॉपआउट तत्काल नहीं दिखता, लेकिन वर्षों बाद यही बच्चे अकुशल श्रम में दिखाई देते हैं। शिक्षा का यह मौन नुकसान किसी योजना के मूल्यांकन में दर्ज नहीं होता।

रोजगार: गांव से बाहर जाती आवाज़

खेती मुख्य आधार है, लेकिन पूरी तरह बारिश पर निर्भर। सिंचाई सीमित है। मनरेगा अनियमित। स्थायी रोजगार गांव में नहीं है। युवा बाहर जाता है—प्रयागराज, कानपुर, दिल्ली, मध्य प्रदेश। गांव में बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं।

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यह पलायन सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक और राजनीतिक है। जब युवा बाहर होता है, तो सवाल पूछने वाली आवाज़ भी बाहर होती है।

दबदबा और चुप्पी: बदली हुई सत्ता

दस्यु नहीं रहे, लेकिन सत्ता का केंद्रीकरण खत्म नहीं हुआ। अब यह ठेके, सिफ़ारिश और स्थानीय प्रभाव से चलता है। शिकायत करना जोखिम माना जाता है। इसलिए चुप्पी यहां रक्षा रणनीति बन चुकी है।

अंतिम रिकॉर्ड

मानिकपुर की समस्या यह नहीं कि योजनाएं नहीं आईं। समस्या यह है कि योजनाएं अंतिम नागरिक तक परिणाम नहीं बनीं। नल लगा, लेकिन पानी तय नहीं हुआ। सड़क बनी, लेकिन बरसात में चली नहीं। पुल बना, लेकिन सुरक्षित नहीं हुआ। स्वास्थ्य सुविधा दर्ज हुई, लेकिन समय पर नहीं मिली। रोजगार आया, लेकिन गांव में नहीं टिका।

काग़ज़ पूरे हैं। ज़िंदगी अधूरी है। यह रिपोर्ट किसी सरकार या विभाग पर आरोप नहीं है। यह उस नागरिक जीवन का दर्ज बयान है, जो हर योजना के बाद भी असुरक्षित है। यह निष्कर्ष नहीं—यह रिकॉर्ड है।

और यह रिकॉर्ड बताता है—जब तक विकास को आख़िरी घर, आख़िरी रास्ते और आख़िरी बीमार तक नहीं मापा जाएगा, तब तक मानिकपुर योजनाओं में रहेगा—ज़िंदगी में नहीं।

❓ क्या मानिकपुर में वास्तव में विकास कार्य हुए हैं?

हाँ, योजनाएं आई हैं और ढांचे बने हैं, लेकिन उनका प्रभाव नागरिक जीवन में स्थायी रूप से नहीं दिखता।

❓ सबसे बड़ी समस्या क्या है?

योजनाओं और ज़मीनी परिणामों के बीच की खाई—जहांवदझझझझ काम पूरा दिखता है, लेकिन उपयोग अधूरा रहता है। लव ऋव

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