रात के सन्नाटे में गरजते डंपर, टूटते खेत — मोहनलालगंज–बंथरा बेल्ट में अवैध खनन “अनुमत” है या “लूट”

📌 कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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लखनऊ के दक्षिणी हिस्से — मोहनलालगंज, बंथरा, गोसाईगंज व आस–पास के क्षेत्रों में रात के सन्नाटे में गरजते डंपर, खेतों में उतरती जेसीबी मशीनें और तेज़ रफ्तार का आतंक आम बात बन चुके हैं। गाँवों के बाहरी हिस्सों में अनियमित मिट्टी–बालू खनन की गतिविधियों से खेत, सड़कें और जनजीवन लगातार क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। ग्रामीणों की शिकायत है कि अवैध खनन से उत्पन्न धूल, दुर्घटनाएँ और धमकियों ने इन क्षेत्रों में डर का माहौल बना दिया है।

समस्या सिर्फ़ यह नहीं कि खनन हो रहा है, बल्कि यह कि कानूनी और अवैध खनन की गतिविधियाँ आपस में इस कदर गड्डमड्ड हो चुकी हैं कि आम आदमी पहचान ही नहीं पाता कि सामने क्या वैध है और क्या लूट।

मोहनलालगंज–बंथरा व आसपास के इलाकों में मिट्टी व बालू खनन केवल अवैध नेटवर्क तक सीमित नहीं है; यहाँ सरकार द्वारा अधिकृत वैध खनन भी चलता है। उत्तर प्रदेश में माइनर मिनरल (मिट्टी/रेत) खनन के लिए लीज़ भू-विज्ञान एवं खनन निदेशालय द्वारा ई–नीलामी और पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया के बाद जारी होती है। जिस एजेंसी/ठेकेदार के नाम सरकारी LOI (Letter of Intent) और पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) जारी हो जाती है, वही “सरकारी अधिकृत एजेंसी” कहलाती है।

मोहनलालगंज तहसील में ऐसे कई अधिकृत प्रोजेक्ट मौजूद हैं, जिनमें गौरिया कला, निज़ामपुर, मऊ, कसिमपुर विरूहा और धौरहारा सहित कई गांवों के गाटा शामिल हैं। मिट्टी के छोटे पट्टों में सामान्यतः 5,000 से 20,000 घनमीटर प्रति सीज़न की सीमा तय होती है, जबकि बड़े नदी–बालू पट्टों में यह सीमा सालाना लाखों घनमीटर तक हो सकती है। वैध खनन अपने निर्धारित क्षेत्र, गहराई और मात्रा के भीतर किया जाए तो वह कानूनी माना जाता है।

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चुनौती तब पैदा होती है जब —
(1) अनुमति से अधिक खुदाई की जाए,
(2) गाटा सीमा के बाहर प्रवेश किया जाए,
(3) माल को बिना रिटर्न दाखिल किए या अवैध मार्ग से सप्लाई किया जाए,
(4) वैध पट्टे की आड़ में आसपास की ज़मीनों से चोरी हो,
(5) और डंपर बिना सुरक्षा मानकों के दौड़ाए जाएँ।

असली विवाद यहीं से शुरू होता है — कानूनी पट्टा और अवैध खनन का अंतर अक्सर ज़मीन पर धुंधला कर दिया जाता है। यही कारण है कि किसानों, ग्रामीणों और स्थानीय व्यापारियों को यह समझ पाना मुश्किल होता है कि सामने चल रहा खनन “अनुमत” है या “लूट”।

इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि पट्टे किसके नाम हैं, बल्कि यह है कि जितनी मात्रा की अनुमति दी गई है, क्या उतनी ही मात्रा में खनन हो रहा है? इसी प्रश्न का उत्तर प्रशासनिक जांच, उपग्रह निरीक्षण और RTI आधारित दस्तावेज़ ही दे सकते हैं — और यही इस पूरे मुद्दे की संवेदनशीलता और गंभीरता है।

🔹 सार्वजनिक क्षति — खेत, पर्यावरण और जनजीवन पर गहरा प्रहार

अवैध (या अनुमति से अधिक) खनन के कारण सबसे पहली चोट कृषि पर पड़ती है। ऊपरी उपजाऊ मिट्टी कटने से खेतों की उत्पादकता घटती है; कुछ भूमि असमान होकर खेती लायक भी नहीं रहती। बरसात के समय गहरे गड्ढों के कारण पानी भराव और कटाव तीव्र हो जाता है, जिससे जलस्तर और नालों की स्वाभाविक दिशा प्रभावित होती है।

सड़कें भी भारी वाहनों की वजह से टूटती हैं। गोसाईगंज और बंथरा के बाज़ारों में दुकानदारों ने व्यापार पर चौतरफा असर दर्ज किया — धूल, दुर्घटना और रात के डर से आम आवागमन कम हो गया है। स्वास्थ्य पर भी प्रभाव गंभीर है — सांस की समस्याएँ, एलर्जी, आंखों में जलन और लगातार शोर से मानसिक तनाव तक की शिकायतें बढ़ी हैं।

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🔹 ग्रामीणों की आवाज़ — गहरे दर्द की बिना नाम की चीख

किसानों का आरोप — “हमारे खेत की ऊपरी मिट्टी ही खत्म हो गई, दो सीज़न से पैदावार आधी रह गई।”
दुकानदारों की पीड़ा — “डंपर इतने तेज़ निकलते हैं कि दुकानों के सामने बच्चों को खड़ा करने का मन नहीं करता।”
युवाओं की शिकायत — “वीडियो पोस्ट करने पर फोन आते हैं — ‘तुम्हारा क्या जा रहा है, मत डाला करो…’”
नतीजा — विरोध करने का साहस कम होता जा रहा है।

🔹 कानून बनाम ज़मीन — प्रशासन की कार्रवाई और उसकी सीमाएँ

कार्रवाई होती है — कभी डंपर पकड़ाए, कभी जुर्माना लगा, कभी एफआईआर दर्ज हुई। परंतु समस्या यह है कि यह कार्रवाइयाँ प्रायः अस्थायी और प्रतीकात्मक दिखती हैं। जब तक वैध–अवैध की आड़ में होने वाली “अतिरिक्त खुदाई” पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक माफिया के लिए जोखिम कम और लाभ बड़ा रहेगा।

🔹 समाधान — कार्रवाई नहीं, इच्छाशक्ति सबसे आवश्यक

  • रीयल टाइम निगरानी (ड्रोन और सैटेलाइट आधारित)
  • अनुमति बनाम वास्तविक खनन डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर
  • ग्रामीण शिकायत पर संरक्षण — व्हिसलब्लोअर मॉडल
  • राजनीतिक–प्रशासनिक स्तर पर “शून्य संरक्षण नीति”

तभी खनन उद्योग विकास का साधन बन सकेगा, शोषण का हथौड़ा नहीं। मोहनलालगंज–बंथरा की त्रासदी सिर्फ़ मिट्टी की चोरी नहीं — यह भविष्य की उर्वरता, जलस्रोतों और ग्रामीण जीवन के अधिकारों की चोरी है। विकास तभी सार्थक है जब वह खेतों, बच्चों और इंसानों की कीमत पर न हो। लाभ और कानून के बीच संतुलन बनाना सरकार की ज़िम्मेदारी है और आवाज़ उठाना समाज का अधिकार भी… और कर्तव्य भी।

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“अधिकृत एजेंसी” कौन होती है?

उत्तर प्रदेश में बालू/मौरंग/मिट्टी जैसे माइनर मिनरल के खनन के लिए पट्टे भू-विज्ञान एवं खनन निदेशालय, उत्तर प्रदेश और ज़िला खनन अधिकारी (DMO) के माध्यम से ई-टेंडर/ई-नीलामी से दिए जाते हैं। हर पट्टे के लिए एक लीज़ होल्डर (प्रोपोनेंट / ठेकेदार / फर्म / व्यक्ति) होता है – वही आपकी रिपोर्ट की भाषा में “अधिकृत एजेंसी” है। उस पर आधारित एक माइनिंग प्लान + पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) जारी होती है, जिसमें लीज एरिया (हेक्टेयर में), कुल भू-संसाधन (Geological reserve), Total Mineable Reserve, और प्रति वर्ष/प्रति सीज़न अनुमत उत्पादन (m³ में) लिखा होता है।

Village Gauriya Kala, Nizampur, Mau, Dhaurhara, Kasimpur Viruha आदि — सभी में विभिन्न गाटों पर ‘Ordinary Soil Excavation’ के प्रस्ताव SEAC/SEIAA के मिनट्स में दर्ज हैं। एरिया सामान्यतः 0.25–1.5 हेक्टेयर और अनुमत उत्पादन 5–20 हज़ार m³ प्रति वर्ष जैसी सीमा में होता है।


📌 सवाल–जवाब (क्लिक करें और जवाब देखें)

मोहनलालगंज–बंथरा में खनन पूरी तरह अवैध है?

नहीं। यहाँ वैध और अवैध दोनों प्रकार का खनन होता है — विवाद तब पैदा होता है जब वैध पट्टों की आड़ में अतिरिक्त और अवैध खुदाई की जाती है।

क्या ग्रामीण शिकायत करने पर सुरक्षा मिलती है?

ग्रामीणों के अनुसार अक्सर शिकायत करने वालों पर दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है। शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा के लिए अलग तंत्र की माँग बढ़ रही है।

क्या प्रशासन कार्रवाई करता है?

कार्रवाई होती है — डंपर पकड़े जाते हैं, जुर्माना भी लगता है — लेकिन ग्रामीणों की नज़र में ये कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं बन पा रही।

समाधान क्या है?

वास्तविक मात्रा की रीयल टाइम निगरानी, उपग्रह आधारित सत्यापन, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा और “शून्य संरक्षण नीति” ही स्थायी समाधान माने जा रहे हैं।

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