महिला सशक्तिकरण का महोत्सव — हर मंच पर ‘देवी’ की नियुक्ति

अनिल अनूप : समाचार दर्पण

देश में महिला सशक्तिकरण इस कदर प्रगति पर है कि अब किसी भी आयोजन में सबसे पहले पुष्पगुच्छ देने का अधिकार महिला को ही होता है। मंच पर पुरुष नेता बोलें या अभिनेता नाचें, लेकिन स्वागत की थाली अब हर हाल में महिला के हाथ में होनी चाहिए — यही आज़ादी का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र माना जा रहा है।

जहाँ देखो वहाँ नारी — क्योंकि हर आयोजन अधूरा बिना नारी!

कभी किसी अफसर के दौरे पर जाइए — वहाँ रिबन काटने के लिए जोड़ीदार महिला मिलेगी। किसी नेता के कार्यक्रम में जाइए — वहाँ स्वागत करने को महिलाएँ कतार में होंगी। धार्मिक आयोजन हो तो ‘पहली पंक्ति में’ महिलाओं के लिए विशेष आसन आरक्षित होगा। यह आरक्षण इसलिए नहीं कि वे नेतृत्व करेंगी, बल्कि इसलिए कि मंच पर ‘संतुलन’ बना रहे। आखिर बिना महिला फोटो खिंचे कार्यक्रम अधूरा लगता है!

सच कहें तो अब हर पुरुष आयोजक को ‘महिला उपस्थिति’ की उतनी ही चिंता रहती है जितनी खाने में नमक की। कहीं कमी रह गई तो सारा स्वाद बिगड़ गया।

सशक्तिकरण का नया सूत्र — फूल, तिलक और तालियाँ

हमारे समाज ने सशक्तिकरण का जो सहज सूत्र खोज लिया है, वह बड़ा व्यावहारिक है — महिलाओं को मंच पर बुलाओ, फूल दो, फोटो खिंचवाओ, और फिर सारी नीतियाँ पुरुष तय कर लें। यह इतनी सुंदर व्यवस्था है कि किसी को शिकायत का मौका ही नहीं मिलता।

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कई बार तो कार्यक्रम इस तरह सजते हैं कि महिला मंच पर होती हैं लेकिन माइक पुरुष के पास होता है। जैसे कोई प्रतीक-पूजा हो रही हो — बोलने का अधिकार भगवान को और सुनने का अवसर भक्तों को।

महिला सशक्तिकरण या पुरुषों का आत्मसंतोष?

पुरुष वर्ग अब इतना उदार हो चुका है कि वह हर जगह महिला की मौजूदगी चाहता है — बशर्ते निर्णय वही लें। कुछ पुरुष तो अपने दफ्तरों में भी ‘सशक्तिकरण दिवस’ मनाते हैं और उसी दिन महिला कर्मियों से दो गुना काम कराते हैं। आखिर सम्मान का भी तो मूल्य होता है!

राजनीति में भी नारी अब शोभा का केंद्र है। चुनावी मंचों पर नेता गर्व से कहते हैं — “देखिए, हमारे बीच महिलाएँ भी हैं।” जैसे वह कोई प्रजाति संरक्षण योजना चला रहे हों। और जब बात टिकट देने की आती है, तो कहते हैं — “अगली बार देंगे, इस बार तो प्रतीकात्मक भागीदारी ही काफी है।”

सशक्तिकरण की असली उपलब्धि — हर नारे में नारी

हमने हर क्षेत्र में महिला को जोड़ा है। खेल में महिला, शिक्षा में महिला, योजनाओं में महिला — बस नीति बनाने में पुरुष। यह इतना पवित्र संतुलन है कि वर्षों से बना हुआ है। जब-जब कोई महिला आगे बढ़ती है, समाज गर्व से कहता है — “देखो, हमने सशक्त किया!” जैसे कि यह सफलता किसी की कृपा से आई हो।

आजकल तो पुरुष वर्ग भी अपने संवेदनशील चेहरे को दिखाने में पीछे नहीं। कोई मंत्री महिला दिवस पर गुलाब बाँटते हैं, कोई अधिकारी ट्वीट करते हैं — “महिलाओं के बिना समाज अधूरा है।” लेकिन अधूरा समाज पूरा करने की ज़िम्मेदारी वही महिलाओं पर छोड़ देते हैं।

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नारी के बिना आयोजन नहीं, पर निर्णय में क्यों नहीं?

हर बड़े आयोजन की सफलता अब नारी उपस्थिति पर निर्भर है। लेकिन निर्णय-निर्माण समितियों में अब भी वही पुराने नाम चमकते हैं। मानो महिलाएँ मंच पर फूलों के साथ ही खिलें, लेकिन फाइलों में उनका नाम न जाए। यह व्यवस्था इतनी गहराई से गड़ी है कि किसी को अजीब भी नहीं लगता।

हमारे समाज ने सशक्तिकरण का इतना सुंदर रूप रच लिया है कि महिला अब सर्वत्र है — पर बराबरी कहीं नहीं। यह नया लोकतंत्र है जहाँ स्त्री को माला पहनाने का अधिकार तो मिल गया, पर निर्णय लेने का नहीं।

पुरुषों की संगत — सशक्तिकरण का गुप्त सूत्र

असल में सशक्तिकरण के इस दौर में पुरुषों की संगत की भी बड़ी भूमिका है। हर सफल महिला के पीछे एक पुरुष खड़ा होता है — कभी बॉस बनकर, कभी सलाहकार बनकर, कभी पति के रूप में। और कई बार वही तय करता है कि उसे कितनी सफलता चाहिए। यह ‘संगत’ सशक्तिकरण का अदृश्य स्तंभ है।

कहने को तो महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं, पर कई बार दिशा वही तय कर रहे हैं जो पीछे खड़े हैं। यह उस गाड़ी की तरह है जिसमें ड्राइवर महिला है लेकिन स्टीयरिंग पुरुष पकड़े हुए है — और दोनों संतुष्ट हैं कि गाड़ी चल रही है!

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व्यंग्य में छिपा सच — सशक्तिकरण की परेड

महिला दिवस पर हर संस्था में मिठाई बाँटी जाती है, भाषण होते हैं, पोस्टर लगते हैं — “महिलाएँ शक्ति का प्रतीक हैं।” अगले ही दिन वही शक्ति पेरोल की लाइन में सबसे पीछे लगाई जाती है। यह विरोधाभास अब इतना सामान्य हो गया है कि किसी को विडंबना भी नहीं लगती।

अगर किसी महिला को सच में नेतृत्व मिल जाए तो कहा जाता है — “वो अपवाद है।” और अपवाद बनाना भी हमारी सफलता का प्रतीक बन गया है।

अंत में — बराबरी की असली तस्वीर

समाज तब तक बराबर नहीं होगा जब तक महिलाएँ सम्मान की पात्र नहीं बल्कि निर्णय की साझेदार नहीं बनतीं। व्यंग्य यह नहीं कि महिलाएँ मंच पर क्यों हैं, बल्कि यह कि वे अब भी दर्शक क्यों हैं।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ है — आवाज़ देना नहीं, सुनना सीखना। पुरुषों की भूमिका तब सार्थक होगी जब वे संरक्षण नहीं, साझेदारी देंगे। और तब शायद हमें मंचों पर ‘देवी’ की नहीं, ‘नेता’ की कुर्सी पर बैठी महिला दिखेगी — जो तालियाँ नहीं, निर्णय लेगी।


यह फीचर हास्य-प्रधान व्यंग्य के रूप में लिखा गया है। किसी व्यक्ति, संस्था या वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का उद्देश्य नहीं है। यह लेख मूल एवं कॉपीराइट सुरक्षित है।

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