करोड़ों की रोशनी, सड़कों पर अंधेरा : चित्रकूट की एलईडी योजना की बुझती चमक


🖊️ संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

📌 संपादक की टिप्पणी:
चित्रकूट के दूरस्थ इलाकों की धूल भरी पगडंडियों से लेकर प्रशासनिक फाइलों की चमकदार दुनिया तक, एक ऐसा फासला है जिसे भरने का काम बहुत कम लोग करते हैं—और उन्हीं में से एक नाम है संजय सिंह राणा। ज़मीनी सच्चाइयों को बिना लाग-लपेट सामने रखने की उनकी शैली सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि व्यवस्था से सीधा संवाद है। इस बार उनकी नजर पड़ी है पर्यटन विभाग की उस चमकदार परियोजना पर, जो कागजों में रोशनी बिखेरती दिखती है, लेकिन हकीकत में कई जगह अंधेरे में डूबी हुई है। यह रिपोर्ट सिर्फ खराब लाइटों की कहानी नहीं, बल्कि उन सवालों की परत खोलती है, जिनका जवाब व्यवस्था को देना ही होगा।

चित्रकूट की शामें कभी अपने आप में एक अलग ही राग छेड़ती थीं—धूल भरी सड़कों पर ढलती धूप, मंदाकिनी के किनारे उतरती शांति, और दूर से आती आरती की आवाज़। लेकिन अब इन शामों में एक अजीब सा खालीपन भी घुल गया है। कारण सिर्फ रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर उठते सवाल हैं, जिसने करोड़ों रुपये खर्च करके रोशनी का वादा किया था।

यह कहानी सिर्फ कुछ खराब एलईडी लाइटों की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जिसमें विकास को दिखाने की जल्दी, उसे टिकाऊ बनाने की जिम्मेदारी पर भारी पड़ जाती है।

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परियोजना का सपना: रोशनी से पर्यटन का विस्तार

चित्रकूट, जो धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है, वहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एलईडी स्ट्रिप लाइट परियोजना शुरू की गई। इस परियोजना का उद्देश्य साफ था—सड़क किनारे डिवाइडरों पर आधुनिक रोशनी की व्यवस्था कर न सिर्फ शहर की खूबसूरती बढ़ाना, बल्कि रात में आने वाले पर्यटकों के लिए सुरक्षित और आकर्षक माहौल तैयार करना।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस परियोजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। यूपी-एमपी बॉर्डर से लेकर प्रमुख मार्गों तक लगभग 5 किलोमीटर के क्षेत्र में सैकड़ों खंभों पर एलईडी स्ट्रिप लाइटें लगाई गईं। योजना कागजों पर बेहद आकर्षक थी—”स्मार्ट लाइटिंग, सुरक्षित शहर और बढ़ता पर्यटन”। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है।

जमीन पर हकीकत : अंधेरे में डूबती रोशनी

चित्रगोकुलपुर से बेड़ी पुलिया तक के इस मार्ग पर जब रात होती है, तो कई जगहों पर अंधेरा छा जाता है। करीब 300 खंभों में से लगभग 50 लाइटें पूरी तरह बंद पाई गईं। यानी हर छह में से एक खंभा अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल है।

कुछ जगहों पर लाइटें टिमटिमाती हैं, जैसे किसी थकी हुई सांस की तरह, और कुछ पूरी तरह बुझ चुकी हैं। यह स्थिति सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं लगती, बल्कि रखरखाव की कमी का साफ संकेत देती है।

पब्लिक व्यू: उम्मीद से निराशा तक का सफर

इस परियोजना से लोगों को उम्मीद थी कि चित्रकूट की पहचान और मजबूत होगी। लेकिन अब वही लोग सवाल पूछ रहे हैं। एक ऑटो चालक, बबलू, अपने अंदाज में कहते हैं, “सरकार पैसा खर्च कर देती है, लेकिन बाद में देखने वाला कोई नहीं रहता। रात में कई जगह इतना अंधेरा हो जाता है कि डर लगता है।”

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एक महिला श्रद्धालु बताती हैं, “यह पर्यटन स्थल है, यहां सुरक्षा सबसे जरूरी है। लेकिन रात में सड़कें ठीक से दिखाई नहीं देतीं।”

सरकारी पक्ष: समस्या स्वीकार, समाधान अधूरा

पर्यटन विभाग के उप निदेशक आर. के. रावत ने इस स्थिति को स्वीकार किया है। उनका कहना है कि कुछ लाइटों में तकनीकी समस्या आई है, और कुछ स्थानों पर छेड़छाड़ व अवैध कनेक्शन भी सामने आए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि अगर छेड़छाड़ हुई, तो निगरानी क्यों नहीं थी? और अगर समस्या सामने आई, तो समाधान में देरी क्यों?

आंकड़ों की भाषा: खर्च और परिणाम का अंतर

इस परियोजना पर अनुमानतः 2 से 5 करोड़ रुपये खर्च हुए होंगे। लेकिन अगर 15-20% लाइटें कुछ ही महीनों में खराब हो जाएं, तो यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न है।

व्यवस्था की कमजोरी: रखरखाव का अभाव

परियोजनाएं बन जाती हैं, लेकिन उनका रखरखाव अक्सर पीछे छूट जाता है। यही स्थिति यहां भी दिखाई देती है। समस्या यह नहीं कि लाइटें खराब हुईं, बल्कि यह कि उन्हें समय पर ठीक क्यों नहीं किया गया।

पर्यटन पर प्रभाव: सिर्फ रोशनी नहीं, भरोसा भी जरूरी

चित्रकूट के लिए पर्यटन सिर्फ आय का साधन नहीं, बल्कि पहचान है। खराब व्यवस्था से पर्यटकों का अनुभव प्रभावित होता है और इससे क्षेत्र की छवि पर भी असर पड़ता है।

जिम्मेदारी का सवाल: कौन जवाबदेह?

परियोजना किस एजेंसी ने लगाई? मेंटेनेंस की जिम्मेदारी किसकी है? क्या नियमित निरीक्षण हो रहा है? इन सवालों का जवाब तय होना जरूरी है।

संभावित समाधान: रास्ता अभी भी खुला है

नियमित निरीक्षण, त्वरित मरम्मत, अवैध कनेक्शन पर कार्रवाई, स्थानीय जागरूकता और स्पष्ट जिम्मेदारी तय कर इस परियोजना को सुधारा जा सकता है।

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रोशनी का अर्थ सिर्फ चमक नहीं

चित्रकूट की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास का अर्थ सिर्फ निर्माण नहीं, बल्कि निरंतर देखभाल भी है। जब लाइटें बुझती हैं, तो सिर्फ अंधेरा नहीं फैलता, बल्कि भरोसा भी कमजोर होता है।

❓ FAQ

क्या एलईडी परियोजना पूरी तरह विफल हो गई है?

नहीं, लेकिन कई लाइटें खराब होने से इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठे हैं।

समस्या का मुख्य कारण क्या है?

रखरखाव की कमी, तकनीकी खराबी और कुछ जगहों पर छेड़छाड़।

क्या समाधान संभव है?

हाँ, नियमित निरीक्षण और त्वरित मरम्मत से स्थिति सुधारी जा सकती है।

लेखक, कवि, पत्रकार और संपादक के द्वंद्व पर आधारित संपादकीय फीचर इमेज जिसमें संपादक अनिल अनूप की तस्वीर और समाचार दर्पण थीम दर्शाई गई है।

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