बांदा। सोशल मीडिया रील की सनक अब केवल समय की बर्बादी या मानसिक विचलन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह कई बार परिवारों को ऐसी त्रासदी में धकेल रही है, जिससे निकल पाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां वायरल होने की चाह में एक मां ने अपनी जान गंवा दी और उसकी चार वर्षीय मासूम बेटी अनजाने में इस मौत की गवाह बन गई।
रील बनाने की चाह और एक परिवार का बिखरना
करुइडा पुरवा निवासी महिला मोहनी सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थी। वह दिन-रात नए-नए वीडियो बनाने और ट्रेंडिंग रील्स देखने में डूबी रहती थी। परिवार के अनुसार, बीते एक महीने से उसकी गतिविधियों में असामान्य बदलाव दिखने लगे थे। वह बार-बार यूट्यूब पर फंदा लगाने से जुड़े वीडियो खोजती थी और अलग-अलग तरीकों को समझने की कोशिश करती रहती थी।
मासूम बेटी के हाथ में मोबाइल, कैमरे के सामने मां
घटना वाले दिन मोहनी ने अपनी चार साल की बेटी को मोबाइल फोन थमाया और कहा कि वह वीडियो रिकॉर्ड करे। बच्ची के लिए यह एक सामान्य खेल जैसा था—मां अक्सर वीडियो बनाती थी। लेकिन इस बार कैमरे के सामने जो हुआ, वह किसी भी बच्चे के जीवन का सबसे भयावह दृश्य बन सकता है। कुछ ही क्षणों में बच्ची ने देखा कि उसकी मां अचेत हो गई है।
डर और घबराहट में बच्ची रोने लगी और घर के अन्य सदस्यों को आवाज दी। परिजन दौड़कर पहुंचे और मोहनी को फंदे से नीचे उतारा गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यह पल न केवल एक महिला की मौत का था, बल्कि एक मासूम बचपन के टूट जाने का भी।
पति की चेतावनी और अनसुनी जिद
पति जगदीश ने बताया कि उसने कई बार मोहनी को रील बनाने और लगातार वीडियो देखने से रोका था। वह समझाता रहा कि सोशल मीडिया की यह लत खतरनाक हो सकती है, लेकिन मोहनी पर उसका कोई असर नहीं हुआ। वायरल होने की चाह ने उसे इस कदर जकड़ लिया था कि वह जोखिम और वास्तविकता के बीच का फर्क भूलती चली गई।
पुलिस जांच और मोबाइल की भूमिका
कोतवाली प्रभारी राजेंद्र सिंह राजावत के अनुसार, महिला के मोबाइल फोन को जब्त कर लिया गया है और उसकी डिजिटल गतिविधियों की गहन जांच की जा रही है। यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि क्या यह केवल एक खतरनाक प्रयोग था या इसके पीछे कोई गहरी मानसिक समस्या छिपी हुई थी।
मनोवैज्ञानिक नजरिया: यह सिर्फ एक हादसा नहीं
मनोवैज्ञानिक डॉ. विनीत सचान का कहना है कि यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि डिजिटल लत और मानसिक असंतुलन का गंभीर उदाहरण है। उनका मानना है कि इस घटना का सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव उस चार वर्षीय बच्ची पर पड़ेगा, जिसने अपनी मां को मरते हुए देखा—वह भी कैमरे के फ्रेम में।
डॉ. सचान के अनुसार, ऐसे बच्चे भविष्य में डर, अपराधबोध, अवसाद और सामाजिक असुरक्षा से जूझ सकते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी यह सदमा लंबे समय तक मानसिक घाव बनकर रहेगा।
सोशल मीडिया की लत: समाज के लिए चेतावनी
यह मामला समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मिलने वाली तात्कालिक लोकप्रियता कई लोगों को असल जीवन से काट देती है। लाइक, व्यू और शेयर की गिनती कब जीवन से ज्यादा कीमती हो जाती है, यह पता ही नहीं चलता।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब व्यक्ति वास्तविक पहचान से ज्यादा डिजिटल पहचान में जीने लगता है, तब मानसिक संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है। यह घटना इसी खतरनाक मोड़ का परिणाम मानी जा सकती है।
कानून, तकनीक और जिम्मेदारी
हालांकि तकनीक अपने आप में न तो अच्छी है और न बुरी, लेकिन उसका उपयोग किस तरह किया जाता है, यही निर्णायक होता है। इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे खतरनाक कंटेंट को बढ़ावा देने से रोकें?
एक मौत, कई सवाल
मोहनी की मौत केवल एक महिला की मृत्यु नहीं है, यह एक परिवार की स्थायी टूटन है। एक पति जिसने अपनी पत्नी खो दी, एक बच्ची जिसने मां को खो दिया, और एक समाज जिसने फिर एक चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया।
यह घटना हमें मजबूर करती है कि हम सोशल मीडिया की अंधी दौड़ पर ठहरकर सोचें—क्या वाकई कुछ सेकंड की लोकप्रियता, एक पूरे जीवन से ज्यादा कीमती हो सकती है?
“हम खबर को
चीखने नहीं देंगे,
असर छोड़ने देंगे।”





