हरियाणा में गौहत्या और गौतस्करी के खिलाफ संत समाज की मुखर चेतावनी, वीडियो 👇

गौरक्षा और गौसेवा पर आधारित पुस्तक ‘गौरक्षा: ज़मीन से ज़िम्मेदारी तक’ का विमोचन, संत समाज और गौ रक्षकों की मौजूदगी में हरियाणा में दिया गया ज्ञापन

✍️मनदीप सिंह खरकरा की रिपोर्ट
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हरियाणा के झज्जर जिले के छारा गाँव में गौहत्या और गौतस्करी की घटनाओं को लेकर संत समाज और गौ-रक्षा से जुड़े संगठनों की चिंता अब केवल आंतरिक विमर्श तक सीमित नहीं रह गई है। हाल के दिनों में इन गतिविधियों को लेकर जिस तरह की सूचनाएं और घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने सामाजिक संतुलन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था से जुड़े कई सवाल खड़े किए हैं। इसी पृष्ठभूमि में हरियाणा में संत समाज और गौसेवा से जुड़े संगठनों ने एकजुट होकर प्रशासन के समक्ष अपनी बात रखी और ठोस कार्रवाई की मांग की।

ज्ञापन के ज़रिए प्रशासन तक पहुंची संत समाज की आवाज

गौरक्षा से जुड़े बाबा जत्तीवाले धाम के गद्दीनशीन एवं राष्ट्र ब्रजप्रांत अध्यक्ष बाबा सुनील सागर महाराज के नेतृत्व में संत प्रकोष्ठ हरियाणा और बृजवासी गौ रक्षक सेना के संत प्रकोष्ठ की ओर से एक ज्ञापन सौंपा गया। यह ज्ञापन राष्ट्र ब्रजप्रांत अध्यक्ष जोगिंदर सिंह कालू छारा द्वारा प्रस्तुत किया गया। ज्ञापन में राज्य में गौतस्करी और गौहत्या से जुड़े मामलों पर गंभीर चिंता जताते हुए प्रशासन से सख़्त और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की गई।

संत समाज का कहना है कि गौतस्करी अब कई स्थानों पर संगठित रूप ले चुकी है, जिससे न केवल धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आधारित आजीविका भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने मांग की कि ऐसे मामलों में जांच को केवल औपचारिकता न बनाया जाए, बल्कि नेटवर्क की जड़ तक पहुंचकर कार्रवाई की जाए।

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कानून के दायरे में रहकर समाधान की अपील

ज्ञापन में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया कि गौसंरक्षण के नाम पर किसी भी प्रकार की हिंसा या कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति स्वीकार्य नहीं है। संत समाज ने स्पष्ट किया कि उनकी मांगें पूरी तरह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में हैं। उनका कहना है कि गौ-रक्षा का रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संवाद, कानून और प्रशासनिक जवाबदेही से होकर निकलता है।

इस अवसर पर गौसेवा से जुड़े कई कार्यकर्ता मौजूद रहे, जिनमें सुनील गौ सेवक और दलजीत गौ सेवक प्रमुख रूप से शामिल थे। सभी ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हुए यह अपेक्षा जताई कि प्रशासन संवेदनशीलता के साथ इस विषय को गंभीरता से लेगा।

गौसेवा का मौन पक्ष: बिना प्रचार, ज़मीनी सहयोग

इस पूरे घटनाक्रम के बीच गौसेवा से जुड़ा एक ऐसा पक्ष भी सामने आया है, जो आमतौर पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं बनता। यह पक्ष है—मौन, निरंतर और बिना प्रचार के किया गया सहयोग। समाचार दर्पण के प्रधान संपादक अनिल अनूप द्वारा बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों की विभिन्न गोशालाओं को समय-समय पर व्यक्तिगत और गुप्त रूप से सहयोग दिया जाता रहा है।

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यह सहयोग कभी किसी मंच से घोषित नहीं किया गया और न ही इसे किसी प्रकार के सामाजिक या राजनीतिक लाभ से जोड़ा गया। इसका उद्देश्य केवल इतना रहा कि संकट के समय गोशालाओं को सहारा मिले और गौसेवा का कार्य बाधित न हो। गौसेवा से जुड़े लोगों का मानना है कि इस तरह का मौन सहयोग ही वास्तव में सेवा की आत्मा को जीवित रखता है।

अनुभव से विचार तक: एक पुस्तक की तैयारी

इन्हीं ज़मीनी अनुभवों, संवादों और वर्षों के अध्ययन के आधार पर समाचार दर्पण द्वारा एक महत्वपूर्ण पुस्तक जारी की जा रही है, जिसका नाम है गौरक्षा: ज़मीन से ज़िम्मेदारी तक। गौसेवा और गौरक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि यह पुस्तक भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर एक व्यावहारिक और वैचारिक मार्गदर्शन प्रदान करती है।

पुस्तक में गौतस्करी की संरचना, कानून की सीमाएं, प्रशासनिक चुनौतियां, न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक जिम्मेदारियों जैसे विषयों को संतुलित दृष्टि से रखा गया है। इसका उद्देश्य गौसंरक्षण को केवल आंदोलन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करना है।

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गौसंरक्षण पर बदलता विमर्श

हरियाणा में दिया गया यह ज्ञापन और उससे जुड़ा वैचारिक प्रयास यह संकेत देता है कि गौसंरक्षण पर विमर्श अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। संत समाज, सामाजिक संगठन और वैचारिक मंच अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि गौ-रक्षा को केवल भावनात्मक मुद्दा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।

‘गौरक्षा: ज़मीन से ज़िम्मेदारी तक’ जैसी पुस्तकें और इस तरह की पहलें यह स्पष्ट करती हैं कि अब सवाल केवल विरोध का नहीं, बल्कि समाधान, नीति और जवाबदेही का है।

❓ FAQ

हरियाणा में संत समाज ने ज्ञापन क्यों सौंपा?

गौहत्या और गौतस्करी की बढ़ती घटनाओं को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने और सख़्त कार्रवाई की मांग के लिए।

क्या संत समाज कानून हाथ में लेने के पक्ष में है?

नहीं, संत समाज ने स्पष्ट किया है कि गौसंरक्षण का रास्ता कानून और संवाद के दायरे में ही होना चाहिए।

‘गौरक्षा: ज़मीन से ज़िम्मेदारी तक’ पुस्तक का उद्देश्य क्या है?

इस पुस्तक का उद्देश्य गौसंरक्षण को भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर व्यावहारिक, कानूनी और जिम्मेदारी आधारित विमर्श में बदलना है।

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