दिल्ली जैसे महानगर में, जहाँ स्मार्ट सिटी, विश्वस्तरीय शिक्षा और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं एक सरकारी विद्यालय में हजारों विद्यार्थी आज भी पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा के लिए तरस रहे हैं। यह कोई तकनीकी बाधा नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता का जीवंत उदाहरण है। सवाल यह नहीं है कि पानी क्यों नहीं है, सवाल यह है कि जब समस्या सबके सामने है तो समाधान क्यों नहीं है।
विद्यालय में सूखे नल और प्रशासनिक चुप्पी
विद्यालय परिसर में लगे पानी के नल सूखे हैं, टंकियां खाली हैं और गर्मी की शुरुआत के साथ ही विद्यार्थियों की परेशानी बढ़ती जा रही है। बच्चे बोतलें लेकर आते हैं, लेकिन दोपहर तक पानी खत्म हो जाता है। कई छात्र-छात्राएं पानी न मिलने के कारण बीमार तक पड़ रहे हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई।
अस्थायी समाधान, स्थायी उदासीनता
शुक्रवार को जब अभिभावकों ने साउथ ईस्ट जिले की डीडीई से शिकायत की, तो प्रशासन हरकत में आया। एक टीम भेजी गई, निरीक्षण हुआ और कागज़ों में खानापूर्ति कर दी गई। उप-प्रधानाचार्य विनीत कुमार ने स्थानीय विधायक सहीराम पहलवान से संपर्क कर आनन-फानन में दिल्ली जल बोर्ड का टैंकर मंगवाया, ताकि बच्चों को उस दिन पानी मिल सके। साथ ही विद्यालय की खराब विद्युत व्यवस्था को दुरुस्त कराने के निर्देश भी दिए गए।
लेकिन यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि क्या टैंकर बुलाना ही समाधान है? क्या रोज़-रोज़ ऐसे अस्थायी इंतज़ामों के सहारे हजारों बच्चों की ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं? स्पष्ट है कि यह केवल तात्कालिक राहत है, स्थायी समाधान नहीं।
पीडब्ल्यूडी, एमसीडी और जल बोर्ड की भूमिका
यदि प्रशासन वास्तव में समाधान चाहता है तो विकल्प स्पष्ट हैं। पीडब्ल्यूडी और एमसीडी विभाग विद्यालय परिसर में भूमिगत वाटर टैंक का निर्माण कर सकते हैं। उन टैंकों में सबमर्सिबल पंप लगाकर ऊपर रखी टंकियों को नियमित रूप से भरा जा सकता है। विद्यालय के वाटर कनेक्शन को तत्काल जोड़ा जाना चाहिए और दिल्ली जल बोर्ड को पेयजल आपूर्ति की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
यह कोई जटिल योजना नहीं है, न ही इसमें वर्षों लगने हैं। फिर भी अफ़सोस की बात यह है कि इन विभागों के बीच तालमेल की कमी बच्चों की प्यास पर भारी पड़ रही है।
गर्मी की दस्तक और बढ़ती चिंता
अभी गर्मी ने पूरी तरह अपना प्रचंड रूप नहीं लिया है। यदि इस समय बच्चों को पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है, तो आने वाले महीनों में हालात कितने भयावह होंगे, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। पानी की कमी न केवल स्वास्थ्य पर असर डालती है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, एकाग्रता और मानसिक स्थिति पर भी गंभीर प्रभाव डालती है।
क्या यही है बच्चों के भविष्य की प्राथमिकता?
शिक्षा नीतियों, मुफ्त किताबों और स्मार्ट क्लास की बातें तब खोखली लगने लगती हैं, जब एक छात्र को सबसे बुनियादी जरूरत — पानी — के लिए भी संघर्ष करना पड़े। यह समस्या किसी एक विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम के सोचने के तरीके पर सवाल खड़ा करती है।
मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, शिक्षा निदेशक और शिक्षा सचिव के सामने यह मुद्दा अब खुलकर आ चुका है। देखना यह है कि क्या वे इसे केवल एक औपचारिक फाइल मानेंगे या फिर वास्तव में बच्चों की पीड़ा को समझते हुए ठोस निर्णय लेंगे।
अभिभावकों की चिंता, बच्चों की बेबसी
अभिभावक रोज़ अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय आशंकित रहते हैं। कई माता-पिता मजबूरी में बच्चों को अतिरिक्त बोतलें देकर भेज रहे हैं, लेकिन यह स्थायी हल नहीं है। बच्चों की आँखों में सवाल है — क्या स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह है या उन्हें यहाँ बुनियादी इंसानी जरूरतें भी नहीं मिलेंगी?
स्थायी समाधान ही एकमात्र रास्ता
इस पूरे मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि समस्या संसाधनों की नहीं, इच्छाशक्ति की है। जब तक स्थायी जल आपूर्ति की व्यवस्था नहीं होती, तब तक हर टैंकर, हर निरीक्षण और हर आदेश केवल दिखावा ही रहेगा। हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को देखते हुए अब आधे-अधूरे समाधान नहीं, बल्कि ठोस और दीर्घकालिक निर्णय की जरूरत है।
FAQ
विद्यालय में पानी की समस्या का मुख्य कारण क्या है?
स्थायी जल कनेक्शन और उचित जल संरचना की कमी इस समस्या का मुख्य कारण है।
क्या टैंकर से पानी आपूर्ति पर्याप्त समाधान है?
नहीं, टैंकर केवल अस्थायी राहत है, स्थायी समाधान नहीं।
कौन-कौन से विभाग इस समस्या का समाधान कर सकते हैं?
पीडब्ल्यूडी, एमसीडी और दिल्ली जल बोर्ड समन्वय से स्थायी समाधान कर सकते हैं।
यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो क्या असर पड़ेगा?
विद्यार्थियों के स्वास्थ्य, पढ़ाई और उपस्थिति पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।






