कमांडो बनने तक देश साथ था , शादी के बाद लड़की अकेली क्यों रह गई?
महिला कमांडो की हत्या, पूरे सिस्टम पर सवाल

महिला कमांडो की शादी और वर्दी वाली तस्वीर, दहेज हत्या के मामले में सिस्टम पर उठते सवाल दर्शाती प्रतीकात्मक इमेज

✍️जोगिंदर सिंह की रिपोर्ट
IMG-20260131-WA0029
previous arrow
next arrow

समाचार सार : हरियाणा के सोनीपत जिले के भादी गांव की महिला कमांडो की संदिग्ध मौत केवल एक हत्या नहीं, बल्कि दहेज, विवाह, सामाजिक सोच और न्यायिक प्रणाली पर गंभीर सवाल है। यह रिपोर्ट उस पूरी कहानी की तह तक जाती है, जिसे अक्सर फाइलों में दबा दिया जाता है।

हर सुबह की तरह वह सुबह भी आई थी। लेकिन फर्क बस इतना था कि उस सुबह के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा। हरियाणा के सोनीपत जिले के भादी गांव की वह तंग कच्ची सड़क, जिस पर कभी एक मां अपनी बेटी के साथ सपनों की रिहर्सल करती थी, अब सन्नाटे की गवाही दे रही है। सूरज निकलने से पहले साइकिल के पैडल की वह लय, बेटी के जूतों की थाप और मां की हांफती सांसें—सब जैसे अचानक थम गए।

यह कोई साधारण हत्या नहीं थी। यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें मेहनत, अनुशासन, सपने, सिस्टम, शादी और अंततः दहेज—सब एक-दूसरे से टकराते हैं। और अंत में जीतता है वह ज़हर, जिसे समाज आज भी “रिवाज” कहकर स्वीकार करता है।

सपनों की नींव: मिट्टी से निकली फौलादी तैयारी

भादी गांव में जहां ज़्यादातर घरों में लड़कियों के भविष्य का मतलब “अच्छी शादी” माना जाता है, वहीं एक मां ने अपनी बेटी के लिए भविष्य का मतलब “मुकाबला” तय किया। न कोई कोच, न अकादमी, न महंगे उपकरण—बस एक साइकिल, खेतों की पगडंडियां और मां का अडिग विश्वास।

इसे भी पढें  गौरक्षा और गौसेवा क्यों?आस्था से आगे, उत्तरदायित्व की खोज

बेटी जब दौड़ती थी तो गांव के लोग अक्सर मुस्कुराकर कहते थे— “लड़की है, कब तक दौड़ेगी?” लेकिन मां के चेहरे पर हर सुबह एक ही जवाब लिखा होता था— “जब तक जीत न जाए।” साइकिल मां चलाती थी और बेटी आगे-आगे दौड़ती थी। कभी स्प्रिंट, कभी लंबी दौड़, कभी पुश-अप्स और कभी जंप। गर्मी, सर्दी और बरसात—कुछ भी ट्रेनिंग नहीं रोक सका।

यही अनुशासन आगे चलकर उसे महिला कमांडो बनाता है—एक ऐसी पहचान, जिस पर पूरे गांव को गर्व होना चाहिए था।

वर्दी तक का सफर: संघर्ष, ताने और चुप्पी

कमांडो बनने का सफर किसी सरकारी विज्ञापन जितना आसान नहीं था। फिजिकल टेस्ट, मेडिकल और लिखित परीक्षाओं के हर चरण में उसे यह साबित करना पड़ा कि वह “लड़की” नहीं, बल्कि “योग्य उम्मीदवार” है। अक्सर ताने सुनने पड़े— “इतनी मेहनत क्यों? आखिर शादी ही तो करनी है।” लेकिन हर पास होती परीक्षा के साथ ये ताने कमजोर पड़ते गए।

जब पहली बार उसने वर्दी पहनी, तो वही गांव जो कभी हंसता था, अब तस्वीरें खींचने लगा। सोशल मीडिया पर बधाइयां आईं, रिश्तेदारों ने फोन किए और सबने कहा— “लड़की ने नाम रोशन कर दिया।” लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि यही पहचान आगे चलकर उसके लिए खतरा बन जाएगी।

शादी: जहां सपनों को ‘समझौते’ में बदला गया

कमांडो बनने के बाद शादी की बातचीत तेज़ हो गई। लड़की ने साफ शब्दों में कहा था— “मैं नौकरी नहीं छोड़ूंगी।” लड़के वाले मान तो गए, लेकिन यह सहमति कागज़ों तक सीमित थी। सोच में नहीं। शादी धूमधाम से हुई। दहेज दिया गया—जितना मां-बाप दे सकते थे, उससे कहीं ज़्यादा।

इसे भी पढें  गणतंत्र दिवस पर झंडोत्तोलन ;खरकरा गोशाला में देशभक्ति और सेवा भावना का संगम

लोगों ने तर्क दिया— “कमांडो बहू आई है, कुछ तो देना पड़ेगा।” यहीं से कहानी का रुख बदल गया।

दहेज: मांग, ताना और मानसिक हिंसा

शादी के कुछ ही महीनों बाद शिकायतें शुरू हो गईं—कभी बाइक कम है, कभी कार चाहिए, कभी नकद पैसे की मांग। कमांडो की नौकरी अब उसकी ताकत नहीं, बल्कि घर में “अहंकार” बताई जाने लगी। उसे कहा जाता— “वर्दी घर में मत लाया करो” और “ज्यादा उड़ो मत, ये ससुराल है।”

मानसिक हिंसा धीरे-धीरे रोज़मर्रा का हिस्सा बन गई। फोन पर मां से बात करते वक्त वह कहती— “सब ठीक है।” लेकिन आवाज़ का कंपन सच्चाई बयां कर देता था।

विरोध की कीमत: जब ‘न’ कहना अपराध बन गया

एक दिन उसने साफ कह दिया— “अब और दहेज नहीं आएगा।” यही वाक्य उसकी ज़िंदगी का सबसे महंगा वाक्य बन गया। इसके बाद उत्पीड़न बढ़ गया। खाना बंद, ताने तेज़ और अकेलापन गहरा होता गया। घर में उसकी ट्रेनिंग का मज़ाक उड़ाया जाने लगा— “किस काम की है ये ताकत?”

यह वही ताकत थी, जिसने उसे देश की सेवा के लिए चुना था। लेकिन घरेलू दीवारों के भीतर वही ताकत बेकार साबित की जा रही थी।

इसे भी पढें  जब नाम हथियार बनें, चुप्पी टूटेहरियाणा में गौ रक्षा की अगली कतार

हत्या की रात: सवाल जो आज भी हवा में हैं

उस रात क्या हुआ, इस पर पुलिस की फाइलें बोलती हैं लेकिन पूरी सच्चाई अब भी अधूरी है। घर के भीतर झगड़े के निशान, शरीर पर चोटों के घाव और फिर मौत। पहले इसे घरेलू विवाद बताया गया, फिर आत्महत्या का एंगल जोड़ा गया। लेकिन परिवार ने साफ कहा— “यह आत्महत्या नहीं, हत्या है।”

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने भी कई सवाल खड़े किए। चोटों की प्रकृति, समय और परिस्थितियां—सब कुछ संदेह पैदा करता है।

पुलिस जांच और सिस्टम की चुप्पी

मामला दर्ज हुआ। दहेज हत्या और घरेलू हिंसा की धाराएं लगीं। लेकिन जांच की रफ्तार वही रही, जो ऐसे मामलों में अक्सर देखी जाती है। परिवार के बयान हुए, पड़ोसियों से पूछताछ हुई, लेकिन सबसे अहम सवाल— “दहेज की मांग कब और कैसे हुई?”—अब भी अधूरा है।

अंत नहीं, एक आरोप

यह रिपोर्ट किसी भावनात्मक अंत के लिए नहीं है। यह एक आरोप है—समाज पर, सिस्टम पर और उस सोच पर, जो आज भी औरत की मेहनत को “शादी तक” सीमित मानती है। अगर समाज उस मां और बेटी के साथ दौड़ता, तो शायद यह कहानी शोक नहीं, प्रेरणा होती।

लेकिन दहेज ने जुनून से बनाई ज़िंदगी को निगल लिया। और यह सच, आज भी हमारे सामने एक जीवित सवाल की तरह खड़ा है।

हरियाणा के छारा गांव का सांकेतिक दृश्य, जिसमें अखाड़ा संस्कृति, ग्रामीण जीवन, गौ-पालन, ऐतिहासिक स्मृति और स्वाभिमान की परंपरा झलकती है
छारा गाँव — जहाँ अखाड़े की मिट्टी, इतिहास का साहस और ग्रामीण जीवन का स्वाभिमान आज भी एक साथ सांस लेते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top