डूबते गांव की ढाल बने किसान — जलभराव से मुक्ति के लिए नाला बनाने को दी अपनी ज़मीन

हरदोई के पिहानी ब्लॉक के रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा में जलभराव से मुक्ति के लिए नाले के निर्माण हेतु अपनी ज़मीन देने पर सहमत किसान

✍️अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट
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डूबते गांव की ढाल बने किसान</strong—यह पंक्ति हरदोई जिले के पिहानी ब्लॉक स्थित रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा की मौजूदा स्थिति को सबसे सटीक रूप में बयान करती है। वर्षों से जलभराव की समस्या से जूझ रहे इस गांव में जब प्रशासन की कोशिशें अधूरी रहीं, तब किसानों ने स्वयं आगे आकर समाधान की जिम्मेदारी उठाई। जलभराव से मुक्ति के लिए नाला बनाने को किसानों द्वारा अपनी ज़मीन देने का फैसला न केवल एक प्रशासनिक समाधान है, बल्कि ग्रामीण समाज की सामूहिक चेतना और त्याग का उदाहरण भी है।

समाचार सार

रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा में शारदा नहर से निकले रजवाहे के अधूरे निर्माण के कारण भारी जलभराव हो गया था। सैकड़ों बीघा फसल बर्बाद होने के बाद गुरुवार को राजस्व टीम मौके पर पहुंची। किसानों ने नाले के लिए अपनी ज़मीन देने की सहमति दी, जिसके बाद सिंचाई विभाग एक मीटर चौड़ा नाला बनाएगा।

अधूरा रजवाहा बना गांव के लिए अभिशाप

पिहानी ब्लॉक के रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा में जलभराव की समस्या अचानक पैदा नहीं हुई। इसकी जड़ें शारदा नहर से निकाले गए उस रजवाहे में छिपी हैं, जिसका निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया। योजना के अनुसार इस रजवाहे के पानी को अलावलपुर से पूरब बहादुर नगर होते हुए नहर विभाग की ज़मीन पर रजुआपुर–झावर क्षेत्र में गिराया जाना था, लेकिन रजवाहा बीच रास्ते में ही समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप आसपास के गांवों से होकर बहने वाला पानी लक्ष्मीपुरवा की ओर मुड़ गया और गांव धीरे-धीरे जलभराव में डूबता चला गया।

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खेत बने तालाब, मेहनत पानी में बह गई

जलभराव का सबसे बड़ा नुकसान किसानों को उठाना पड़ा। गांव और उसके आसपास के खेतों में पानी भर जाने से सैकड़ों बीघा गेहूं, आलू, गन्ना, लाही समेत अन्य फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं। जिन किसानों ने बीज, खाद और सिंचाई पर भारी खर्च किया था, उनकी सारी मेहनत कुछ ही दिनों में पानी में बह गई। कई किसानों के सामने अब परिवार के भरण-पोषण और कर्ज़ चुकाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

घरों तक पहुंचा पानी, जनजीवन ठप

स्थिति केवल खेतों तक सीमित नहीं रही। जलभराव के चलते कई किसानों के घरों में पानी घुस गया। गांव की गलियां तालाब का रूप ले चुकी थीं। आवागमन पूरी तरह बाधित हो गया और बच्चों, महिलाओं तथा बुजुर्गों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। स्कूल जाने वाले बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, वहीं बीमार और बुजुर्ग लोगों के लिए घर से बाहर निकलना भी जोखिम भरा हो गया।

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प्रशासन तक पहुंची आवाज़, राजस्व टीम मौके पर

ग्रामीणों की लगातार शिकायतों के बाद आखिरकार प्रशासन हरकत में आया। गुरुवार को मजिस्ट्रेट संध्या यादव के नेतृत्व में पांच सदस्यीय राजस्व टीम रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा पहुंची। टीम में कानूनगो संजय मिश्रा भी शामिल थे। अधिकारियों ने गांव का दौरा कर जलभराव की स्थिति का जायजा लिया और किसानों से सीधे बातचीत कर समस्या की गंभीरता को समझा।

किसानों का ऐतिहासिक फैसला, ज़मीन देने पर बनी सहमति

जांच के दौरान एक अहम मोड़ तब आया, जब लक्ष्मीपुरवा के किसान बाबूराम, जगदीश, दिनेश सहित कई अन्य किसानों ने नाले के निर्माण के लिए अपनी निजी ज़मीन देने की सहमति जता दी। किसानों का कहना था कि यदि नाले का निर्माण नहीं हुआ तो हर साल गांव इसी तरह जलभराव की त्रासदी झेलेगा। व्यक्तिगत नुकसान की परवाह किए बिना उन्होंने गांव और आने वाली पीढ़ियों के हित में यह बड़ा फैसला लिया।

एक मीटर चौड़ा नाला बनेगा, सिंचाई विभाग को निर्देश

किसानों की सहमति के बाद प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाए। सिंचाई विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं। योजना के तहत एक मीटर चौड़ा नाला बनाया जाएगा, जिससे गांव में जमा पानी को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला जा सके। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा, ताकि भविष्य में जलभराव की समस्या से स्थायी राहत मिल सके।

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राहत की उम्मीद, लेकिन निगरानी ज़रूरी

ग्रामीणों को नाले के निर्माण से राहत की उम्मीद है, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि काम समय पर और गुणवत्ता के साथ पूरा हो। पूर्व में अधूरी योजनाओं के अनुभव ने लोगों को सतर्क कर दिया है। किसानों का कहना है कि यदि नाला सही ढंग से बना तो न केवल जलभराव से निजात मिलेगी, बल्कि खेती और गांव का भविष्य भी सुरक्षित होगा।

डूबते गांव की ढाल बने किसान

रजुआपुर मजरा लक्ष्मीपुरवा की यह घटना बताती है कि जब प्रशासन और समाज मिलकर काम करते हैं, तो सबसे गंभीर समस्याओं का भी समाधान संभव है। जलभराव से मुक्ति के लिए नाला बनाने को अपनी ज़मीन देने वाले किसान वास्तव में डूबते गांव की ढाल बनकर सामने आए हैं। यह कहानी केवल एक नाले के निर्माण की नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष, त्याग और जिम्मेदारी की मिसाल है।

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