देवरिया के बंगरा बाजार चौराहे पर स्थापित लोकनायक और स्वतंत्रता सेनानी भागवत भगत उर्फ ‘खजड़ी वाले बाबा’ की मूर्ति को अराजक तत्वों ने तोड़ दिया। यह घटना केवल एक प्रतिमा का ध्वंस नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, आज़ादी के जनआंदोलन और स्मृति-परंपरा पर किया गया हमला मानी जा रही है। आक्रोशित लोगों ने धरना दिया, जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचे और प्रशासन ने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया।
गेहुआं के रोटियां, रहरिया के दलिया तनी घिव भी मिलिहे ना। जब मिली अजदिया त तनी सा घिव भी मिलिहे ना।
यह पंक्तियां केवल एक भोजपुरी लोकगीत नहीं थीं—ये भूख, अन्याय और गुलामी के बीच आज़ादी का सपना थीं। यही गीत, यही स्वर, यही खजड़ी—देवरिया की धरती पर एक समय लोगों के भीतर आज़ादी की आग सुलगा दिया करती थी। उसी आग को फूंकने वाले लोकनायक भागवत भगत उर्फ ‘खजड़ी वाले बाबा’ की मूर्ति गुरुवार की रात अराजक तत्वों द्वारा तोड़ दी गई। सुबह होते-होते यह खबर जैसे ही फैली, बंगरा बाजार और आसपास के गांवों की हवा में आक्रोश, पीड़ा और अपमान की कसक घुल गई।
मूर्ति का टूटना नहीं, स्मृति का अपमान
यह घटना किसी चौराहे पर खड़ी एक प्रतिमा के टूटने भर की नहीं थी। यह उस स्मृति पर हमला था, जिसने साधारण किसानों, मजदूरों और युवाओं को यह सिखाया कि आज़ादी केवल नेताओं की सभाओं से नहीं आती, बल्कि लोकगीतों, पैदल यात्राओं और सामूहिक चेतना से जन्म लेती है। बंगरा बाजार चौराहा वर्षों से इसी चेतना का प्रतीक रहा है—जहां हर आने-जाने वाला भागवत भगत की प्रतिमा को देखकर ठहरता था, जैसे इतिहास से मौन संवाद कर रहा हो।
सुबह होते ही उमड़ा जनसैलाब
शुक्रवार की सुबह जैसे ही लोगों को मूर्ति क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिली, आसपास के गांवों से लोग स्वतः ही बंगरा बाजार की ओर चल पड़े। कोई नारे लगाता हुआ आया, कोई मौन पीड़ा में डूबा हुआ। देखते ही देखते सैकड़ों लोग जमा हो गए और क्षतिग्रस्त मूर्ति के सामने धरने पर बैठ गए। मांग एक ही थी—दोषियों की पहचान हो, गिरफ्तारी हो और भागवत भगत के सम्मान को बहाल किया जाए।
खजड़ी और लोकगीतों से उठा आज़ादी का आंदोलन
देवरिया जिले के छठियांव गांव में जन्मे भागवत भगत किसी बड़े घराने से नहीं आए थे। वे एक गरीब किसान परिवार के बेटे थे, लेकिन उनकी आवाज़ में वह ताकत थी जो बड़े-बड़े मंचों को भी फीका कर दे। हाथ में खजड़ी, पैरों में नंगे पांव की धूल और कंठ में लोकगीत—यही उनका शस्त्र था। वे सुबह घर से निकलते और गांव-गांव घूमते हुए लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़ा करते।
उनका वही मशहूर गीत—“गेहुआं के रोटियां, रहरिया के दलिया तनी घिव भी मिलिहे ना…”—गरीबी की पीड़ा भी कहता था और आज़ादी की उम्मीद भी जगाता था। गीत के हर अंतरे पर भीड़ में से कोई न कोई मुट्ठी कस लेता, जैसे प्रण ले रहा हो कि यह हाल हमेशा नहीं रहेगा।
नमक सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक
भागवत भगत 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे—अहिंसा, सत्य और जनभागीदारी उनके आंदोलन की रीढ़ थी। वे मानते थे कि जब तक गांव नहीं जागेंगे, तब तक देश नहीं जागेगा। यही कारण था कि उनकी राजनीति मंचों से ज्यादा खेतों और चौपालों में दिखाई देती थी।
बंगरा बाजार: संघर्ष और बलिदान का चौराहा
बिहार सीमा से सटा बंगरा बाजार भागवत भगत के संघर्ष का साक्षी रहा है। यहीं एक बार अंग्रेजी पुलिस के लाठीचार्ज में वे गंभीर रूप से घायल हुए थे। खून बहा, शरीर टूटा, लेकिन गीत नहीं रुका। जेल की दीवारों ने भी उनके हौसले को कैद नहीं कर पाईं। आज़ादी के लिए उन्होंने कई बार कारावास झेला, पर खजड़ी की थाप कभी खामोश नहीं हुई।
साथियों ने संजोई थी स्मृति
आजादी के बाद, भागवत भगत के साथी और पूर्व सांसद स्वर्गीय हर केवल प्रसाद ने बंगरा बाजार चौराहे पर उनकी मूर्ति स्थापित करवाई। यह प्रतिमा किसी राजनीतिक गौरव का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि लोकसंघर्ष की विरासत थी। हर साल 4 दिसंबर को यहां स्मृति कार्यक्रम होते—लोकगीत गूंजते, बुजुर्ग किस्से सुनाते और नई पीढ़ी इतिहास को महसूस करती।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
मूर्ति तोड़े जाने की खबर मिलते ही जनप्रतिनिधि और प्रशासन सक्रिय हुए। क्षेत्रीय विधायक सभा कुंवर कुशवाहा मौके पर पहुंचे और लोगों को समझा-बुझाकर शांत कराया। वहीं सलेमपुर से सपा सांसद रामाशंकर विद्यार्थी ने इसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का खुला अपमान बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना था कि जो समाज अपने लोकनायकों का सम्मान नहीं करता, वह अपनी जड़ों से कट जाता है।
पुलिस जांच और आगे की राह
पुलिस ने अज्ञात अराजक तत्वों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। सीसीटीवी फुटेज, स्थानीय सूचनाएं और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की तलाश जारी है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और मूर्ति का सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापन कराया जाएगा।
लोकनायकों की रक्षा, हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
भागवत भगत की मूर्ति का टूटना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमने अपनी स्मृतियों की रक्षा के लिए पर्याप्त चौकसी बरती है। लोकनायक केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थलों, गीतों और परंपराओं में जीवित रहते हैं। जब उन पर हमला होता है, तो वह पूरे समाज की चेतना पर हमला होता है।
आज जरूरत है कि हम खजड़ी वाले बाबा को केवल श्रद्धांजलि के फूलों में नहीं, बल्कि उनके गीतों की आत्मा में जिंदा रखें—ताकि आने वाली पीढ़ियां समझ सकें कि आज़ादी किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि अनगिनत लोकस्वरों का संगम है।






