सुनील शुक्ला की रिपोर्ट
सीतापुर। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में इन दिनों प्रशासनिक तंत्र को लेकर जो दृश्य उभर रहा है, वह केवल एक खबर नहीं बल्कि शासन-प्रशासन के बदलते चरित्र की गवाही है। जिलाधिकारी राजा गणपति आर और पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल की जोड़ी ने जिले की कमान संभालते ही यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि अब सीतापुर में सिफारिश, दबाव और लापरवाही की नहीं बल्कि जवाबदेही और परिणाम की राजनीति चलेगी। इसका असर यह है कि जहां आम नागरिकों के बीच उम्मीद और भरोसे की लहर दौड़ पड़ी है, वहीं भ्रष्टाचार, अतिक्रमण और कामचोरी के आदी तंत्र में खलबली मची हुई है।
■ प्रशासनिक शैली में बदलाव : आदेश नहीं, अमल दिख रहा है
सीतापुर में लंबे समय से यह शिकायत आम रही कि योजनाएं फाइलों में सिमट जाती हैं और आदेश कागजों से बाहर नहीं निकलते। लेकिन नए प्रशासनिक नेतृत्व ने इस परंपरा को तोड़ने का काम किया है। जिलाधिकारी राजा गणपति आर ने कार्यभार ग्रहण करते ही साफ कर दिया कि सरकारी कार्यालयों में बैठकर सिर्फ निर्देश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज़मीनी हकीकत का मूल्यांकन भी उतना ही ज़रूरी है। इसी सोच के तहत विभागीय बैठकों के साथ-साथ अचानक निरीक्षण, फील्ड विजिट और प्रत्यक्ष संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है।
■ स्वास्थ्य और शिक्षा पर सीधा प्रहार
प्रशासन की सक्रियता का सबसे प्रत्यक्ष असर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति, दवाओं की कमी और अव्यवस्थाओं को लेकर जो शिकायतें वर्षों से सुनाई देती थीं, उन पर अब तत्काल कार्रवाई हो रही है। औचक निरीक्षणों के दौरान लापरवाह पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों को न सिर्फ फटकार लगाई गई, बल्कि जवाबदेही भी तय की गई।
इसी तरह शिक्षा विभाग में भी स्कूलों की नियमितता, शिक्षकों की उपस्थिति और छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं की जांच तेज कर दी गई है। संदेश साफ है—सरकारी सेवा अब औपचारिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
■ पुलिसिंग में सख्ती : थाने अब फरियादियों के लिए
पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल ने पुलिस महकमे की कार्यशैली में ठोस बदलाव लाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। थानों पर फरियादियों की अनदेखी, टालमटोल और दबाव में कार्रवाई जैसी पुरानी शिकायतों को गंभीरता से लिया गया है। थानाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि हर शिकायत दर्ज होगी और उसका समयबद्ध निस्तारण होगा।
रात्रि गश्त, अपराध नियंत्रण और महिला सुरक्षा को लेकर भी पुलिस की सक्रियता बढ़ी है। इसका नतीजा यह है कि आम लोगों में सुरक्षा का भाव मजबूत हुआ है, जबकि अपराधियों में डर साफ नजर आ रहा है।
■ अतिक्रमण पर बुलडोजर नहीं, नीति और निरंतरता
सीतापुर शहर की सड़कों पर वर्षों से जमे अतिक्रमण को हटाना किसी भी प्रशासन के लिए चुनौती रहा है। लेकिन मौजूदा प्रशासन ने इसे सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि सतत नीति के रूप में लागू किया है। सड़क किनारे अवैध कब्जों, ठेलों और स्थायी अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई की जा रही है।
खास बात यह है कि डीएम और एसपी खुद मौके पर पहुंचकर अभियान की निगरानी कर रहे हैं। इससे न केवल प्रशासनिक अमला सतर्क हुआ है, बल्कि जनता को भी यह भरोसा मिला है कि कार्रवाई चयनात्मक नहीं, बल्कि समान रूप से लागू हो रही है।
■ जनता दरबार : शिकायत नहीं, समाधान का मंच
प्रशासनिक बदलाव की सबसे सकारात्मक तस्वीर ‘जनता दरबार’ में देखने को मिल रही है। यहां लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंच रहे हैं और उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि समाधान भी मिल रहा है। हर शिकायत को विभागवार चिन्हित कर समयसीमा तय की जा रही है और बाद में उसका फीडबैक भी लिया जा रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों बाद उन्हें यह अहसास हुआ है कि जिला प्रशासन वास्तव में उनकी सुन रहा है। यह विश्वास ही किसी भी शासन की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
■ प्रशासनिक संदेश : ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नारा नहीं
डीएम और एसपी की कार्यशैली से यह स्पष्ट हो चुका है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ अब महज़ भाषणों तक सीमित नहीं है। भ्रष्टाचार, लापरवाही और अनुशासनहीनता पर सख्त रुख अपनाया गया है। जिन कर्मचारियों को पहले राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त था, वे भी अब नियमों के दायरे में हैं।
■ निष्कर्ष : क्या यही है रामराज्य की दिशा?
सीतापुर में उभर रही यह प्रशासनिक तस्वीर किसी आदर्श लोककथा जैसी नहीं, बल्कि ठोस निर्णयों और निरंतर निगरानी का परिणाम है। यदि यह कार्यशैली निरंतर बनी रहती है, तो यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जब प्रशासन संवेदनशील, निष्पक्ष और सक्रिय हो जाए, तो शासन अपने आप जनहितकारी बन जाता है। शायद यही वह राह है, जिसे लोग प्रतीकात्मक रूप से ‘रामराज्य’ कहते हैं।
■ पाठकों के सवाल (क्लिक करें)
क्या सीतापुर में सचमुच प्रशासनिक सख्ती बढ़ी है?
हां, स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिसिंग और अतिक्रमण जैसे क्षेत्रों में लगातार कार्रवाई और निगरानी से यह साफ दिख रहा है।
जनता दरबार में शिकायतों का निस्तारण कितना प्रभावी है?
प्रशासन द्वारा तय समयसीमा और फीडबैक व्यवस्था के कारण निस्तारण की दर पहले से बेहतर हुई है।
क्या यह बदलाव स्थायी रह सकता है?
यदि यही नीति और निरंतरता बनी रही, तो यह बदलाव स्थायी प्रशासनिक संस्कृति का रूप ले सकता है।









