संतोष कुमार सोनी की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से आया यह फैसला केवल एक अदालत का निर्णय नहीं है, बल्कि वह सामाजिक चेतावनी है जो बताती है कि मासूमियत पर हमला करने वालों के लिए कानून में अब कोई नरमी नहीं बची है। छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध में फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दोषी को फांसी की सजा सुनाया जाना, न्याय व्यवस्था की तत्परता और संवेदनशीलता दोनों को रेखांकित करता है।
घटना की वह रात, जिसने एक परिवार की नींद छीन ली
यह मामला बांदा जिले के कालिंजर थाना क्षेत्र का है। 25 जुलाई 2025 को गांव महोरछा में रहने वाली छह साल की मासूम बच्ची रोज़ की तरह अपने घर के आसपास खेल रही थी। इसी दौरान अमित रैकवार नामक व्यक्ति ने टॉफी का लालच देकर उसे बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया। बच्ची को अंदाज़ा भी नहीं था कि वह जिस दरवाज़े के भीतर जा रही है, वहां उसका बचपन लहूलुहान कर दिया जाएगा।
अमित ने घर के भीतर बच्ची के साथ दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया और जाते-जाते उसे जान से मारने की धमकी दी कि अगर किसी को कुछ बताया तो अंजाम और बुरा होगा। डर और दर्द से सहमी बच्ची किसी तरह घर पहुंची। उस वक्त उसके माता-पिता खेत में काम करने गए हुए थे।
माता-पिता की वापसी और सच का सामना
जब माता-पिता घर लौटे तो बच्ची को जोर-जोर से रोते देखा। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद बच्ची गिर गई होगी या किसी ने डराया होगा, लेकिन जब बच्ची ने हिम्मत जुटाकर पूरी आपबीती बताई, तो मानो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बिना देरी किए पिता बच्ची को लेकर कालिंजर थाने पहुंचे और घटना की सूचना दी।
मामले की गंभीरता को समझते हुए थानाध्यक्ष दीपेंद्र कुमार सिंह स्वयं मौके पर पहुंचे और बच्ची को तत्काल ननैनी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। वहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने हालत गंभीर देखते हुए उसे बांदा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
11 दिन तक ज़िंदगी और मौत से जूझती मासूम
बांदा मेडिकल कॉलेज में भी बच्ची की स्थिति बेहद नाजुक थी, जिसके बाद उसे कानपुर रेफर किया गया। कानपुर में बच्ची 11 दिन तक भर्ती रही। ऑपरेशन के बाद जब वह बोलने की स्थिति में आई, तब जाकर पुलिस उसका बयान दर्ज कर सकी।
डॉक्टरों और पुलिस दोनों के लिए बच्ची की हालत झकझोर देने वाली थी। उसके शरीर पर कई जगह गहरे ज़ख्म थे, दांत से काटने के निशान थे, बायां हाथ टूटा हुआ था, जीभ और गले पर गंभीर चोटें थीं। यह केवल अपराध नहीं था, बल्कि इंसानियत के खिलाफ की गई बर्बरता थी।
24 घंटे में गिरफ्तारी, पुलिस पर फायरिंग
घटना के बाद पुलिस अधीक्षक पलाश बंसल के निर्देश पर आरोपी की गिरफ्तारी के लिए कालिंजर थाना पुलिस, एसओजी और अन्य टीमों का गठन किया गया। 26 जुलाई 2025 को आरोपी अमित रैकवार को ग्राम गुढ़ाकला के पास से गिरफ्तार किया गया।
गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर फायरिंग की। जवाबी कार्रवाई में उसके दोनों पैरों में गोली लगी और वह घायल हो गया। इसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
56 दिन में चार्जशीट से फांसी तक
पुलिस ने इस मामले में असाधारण तत्परता दिखाई। मेडिकल, फॉरेंसिक और तकनीकी साक्ष्यों को मजबूत तरीके से संकलित किया गया। 7 अक्टूबर 2025 को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी गई। 12 नवंबर 2025 को अदालत में 10 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
सिर्फ 56 दिनों के भीतर फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने पॉक्सो एक्ट के तहत आरोपी को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। इसके साथ ही 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
अदालत की टिप्पणी, जो समाज को आईना दिखाती है
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे अपराधियों के प्रति नरमी दिखाना पीड़िता के साथ अन्याय होगा। न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दोषी को तब तक फांसी के फंदे पर लटकाया जाए, जब तक उसकी जान न निकल जाए। यह टिप्पणी केवल सजा नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है।
रोते माता-पिता और न्याय की तसल्ली
फैसला सुनते ही अदालत परिसर में भावनात्मक माहौल बन गया। बच्ची के माता-पिता की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को आखिरकार न्याय मिला है। हालांकि कोई भी सजा उनके जख्मों को पूरी तरह भर नहीं सकती, लेकिन यह फैसला उन्हें यह भरोसा देता है कि कानून अब मासूमों के साथ खड़ा है।
यह फैसला क्यों है समाज के लिए अहम
यह मामला केवल एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि त्वरित जांच, मजबूत सबूत और संवेदनशील न्याय प्रणाली मिलकर कैसे भरोसा कायम कर सकती है। यह फैसला उन तमाम परिवारों के लिए उम्मीद है, जो न्याय के लिए सालों भटकते रहते हैं।
महत्वपूर्ण सवाल-जवाब
क्या फांसी की सजा तुरंत लागू होगी?
नहीं, फांसी की सजा पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील की प्रक्रिया होती है। सभी कानूनी चरण पूरे होने के बाद ही सजा लागू होती है।
यह फैसला कितने समय में आया?
चार्जशीट दाखिल होने के मात्र 56 दिनों के भीतर फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फैसला सुनाया।
क्या यह पॉक्सो एक्ट के तहत दुर्लभ सजा मानी जाएगी?
हाँ, पॉक्सो एक्ट के मामलों में फांसी की सजा दुर्लभतम मामलों में दी जाती है, और यह फैसला उसी श्रेणी में आता है।










