जलसा ए दस्तारबंदी में 45 छात्रों को दी गई हाफिज़-ए-कुरान की उपाधि—यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला ऐसा अवसर था, जहां कुरान, शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पर गहन विमर्श हुआ। उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद अंतर्गत रामपुर कारखाना क्षेत्र के कौलाछापर गांव में स्थित मदरसा अरबिया इस्लामिया क़सीमुल उलूम में गुरुवार की देर रात अजीमुशान जलसा-ए-दस्तारबंदी का आयोजन किया गया, जिसमें कुरान शरीफ को पूरी तरह हिफ़्ज़ करने वाले 45 विद्यार्थियों को हाफिज़-ए-कुरान की उपाधि प्रदान की गई।
भव्य आयोजन, आध्यात्मिक वातावरण
जलसा-ए-दस्तारबंदी का माहौल शुरू से ही रूहानियत से भरा हुआ था। मदरसे का परिसर रोशनी से जगमगा रहा था और दूर-दराज़ से आए अभिभावक, उलेमा-ए-किराम, समाज के प्रबुद्ध लोग तथा ग्रामीण बड़ी संख्या में मौजूद थे। इस आयोजन का मूल उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को सम्मानित करना ही नहीं था, बल्कि कुरान से जुड़ाव, शिक्षा के महत्व और समाज की सामूहिक जिम्मेदारियों को रेखांकित करना भी था।
तिलावत-ए-कुरान से हुआ जलसे का आगाज़
कार्यक्रम का शुभारंभ कारी नूरुल कलाम द्वारा तिलावत-ए-कुरान शरीफ से हुआ। कुरान की आयतों की मधुर और भावपूर्ण तिलावत ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इसके बाद मशहूर नातख़्वां कारी सुहेल ने नबी-ए-करीम ﷺ की शान में नात पढ़ी, जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे। नात और तिलावत ने जलसे को एक विशेष आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।
मुख्य वक्ता का संदेश: कुरान जीने का तरीका है
जलसे के मुख्य वक्ता मौलाना इरफान क़ासमी ने अपने प्रभावशाली संबोधन में कहा कि कुरान करीम का हर एक शब्द इंसान के दिल और दिमाग पर गहरा असर डालता है। जब कोई व्यक्ति कुरान को सिर्फ पढ़ता ही नहीं, बल्कि उसे अपने दिल में उतार लेता है, तब वह वास्तव में एक बड़ी नेमत हासिल करता है। उन्होंने कहा कि कुरान कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि इंसान को जीने का तरीका सिखाने वाली मुकम्मल हिदायत है।
मौलाना इरफान क़ासमी ने आगे कहा कि कुरान के शब्दों को सीने में बसाने का मतलब केवल हिफ़्ज़ करना नहीं, बल्कि उसके मायनों को समझना, उस पर गौर करना और उसे अपने अमल में उतारना है। यही रास्ता इंसान को गुमराही से बचाकर सीधा मार्ग दिखाता है। जिस व्यक्ति ने कुरान को अपने सीने में जगह दी, उसने मानो एक अनमोल खजाना पा लिया।
कुरान और सुन्नत से जुड़ाव ही इज़्ज़त का रास्ता
अपने संबोधन में मौलाना इरफान क़ासमी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुसलमान जब तक कुरान और सुन्नत के साथ जुड़ा रहता है, तब तक वह इज़्ज़त, क़ुव्वत, शान और शौकत के साथ जीवन जीता है। लेकिन जैसे ही कुरान से रिश्ता कमजोर होता है, समाज में कमजोरी और रुसवाई का दौर शुरू हो जाता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे कुरान से अपने रिश्ते को मजबूत रखें और उसे अपनी जिंदगी का मार्गदर्शक बनाएं।
इस्लाम अमन और शिक्षा का पैगाम देता है
कानपुर से आए हज़रत मौलाना मोहम्मद सईद क़ासमी ने कहा कि इस्लाम अमन और शांति का धर्म है। उन्होंने शिक्षा को जीवन का सबसे अहम अंग बताते हुए कहा कि शिक्षा के बिना कोई भी व्यक्ति अधूरा है। समाज की वास्तविक कामयाबी उसी समय संभव है, जब हमारे बच्चे कुरान को सीने से लगाए रखें और उसके बताए हुए हुक्मों पर अमल करें।
उन्होंने खास तौर पर अभिभावकों को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का संतुलन ही मजबूत और जागरूक समाज की नींव रखता है।
दहेज प्रथा पर कड़ा संदेश
हज़रत मौलाना मुनीर अहमद ने अपने संबोधन में समाज में फैली दहेज प्रथा को एक गंभीर सामाजिक कलंक बताया। उन्होंने कहा कि दहेज जैसी बुराई को खत्म करने के लिए समाज के शिक्षित वर्ग को आगे आना होगा। खासकर युवा पीढ़ी यदि ठान ले, तो दहेज जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त किया जा सकता है।
मानवता सबसे बड़ा धर्म
मुफ्ती साजिद साहब क़ासमी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जब भी किसी असहाय या जरूरतमंद की मदद करें, तो उसका धर्म मत पूछें। उन्होंने कहा कि ऐसे नेक काम के लिए अल्लाह तआला का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने आपको इस कार्य के लिए चुना। मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और यही इस्लाम का मूल संदेश भी है।
45 हाफिज़ों का सम्मान, अभिभावक हुए भावुक
कार्यक्रम के सबसे भावुक क्षण तब आए, जब कुरान शरीफ को कंठस्थ करने वाले 45 विद्यार्थियों को मंच पर बुलाया गया। उनके सिर पर पगड़ी बांधकर उन्हें हाफिज़-ए-कुरान की उपाधि दी गई और उपहार भेंट किए गए। अपने बच्चों को इस मुकाम पर पहुंचते देखकर अभिभावकों की आंखें गर्व और खुशी से भर आईं। पूरा माहौल तालियों और दुआओं से गूंज उठा।
अध्यक्षता और संचालन
इस भव्य जलसा-ए-दस्तारबंदी की अध्यक्षता मदरसा अरबिया इस्लामिया क़सीमुल उलूम के प्रधानाचार्य हज़रत कारी अब्दुल वहीद ने की, जबकि कार्यक्रम का संचालन मौलाना सलीम क़ासमी ने बेहद सधे और प्रभावशाली ढंग से किया। अंत में सामूहिक दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।






