हे प्राणप्रिय सखी! जिस तरह ऋतुएँ बिना पूछे आती हैं, वैसे ही बजट भी हर वर्ष आता है—न बुलावा, न सहमति। फर्क बस इतना है कि ऋतु देह को छूती है और बजट सीधे आत्मा पर वार करता है। यह कोई साधारण सरकारी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि शब्दों में लिपटा वह औज़ार है, जिससे उम्मीदों को साधा जाता है और यथार्थ को ‘समायोजन’ कहकर टाल दिया जाता है। इसलिए सखी, यह समय आंखें मूंदकर सपने देखने का नहीं, बल्कि आंखें खोलकर सच को पहचानने का है।
राहत की भाषा और वास्तविकता की खामोशी
यह जो कहा जा रहा है कि गरीबों को राहत देने वाला बजट आ गया है—इसी वाक्य में इस पूरे दस्तावेज़ का व्यंग्य छुपा है। राहत किसे, कितनी और कब—इन तीन प्रश्नों के उत्तर हर बार घोषणाओं की धुंध में गुम हो जाते हैं। राहत अब सूखे खेत पर छिड़की गई पानी की कुछ बूंदों जैसी हो गई है, जिन्हें देखकर कहा जाता है कि सिंचाई हो चुकी है। सखी, इस देश में गरीबी मिटाने की योजनाएँ उतनी ही पुरानी हैं जितनी खुद गरीबी। फर्क बस इतना है कि योजनाएँ हर साल नए नाम और नए पोस्टर के साथ आती हैं, जबकि गरीबी वही पुरानी साड़ी पहने चुपचाप खड़ी रहती है।
करों का शोर नहीं, रसोई की आवाज़
करों को लेकर मचे शोर को ‘कोरा बावेला’ कहा जा रहा है, लेकिन यह शोर नहीं—यह खाली बर्तनों की खनक है। यह बच्चों की फीस की पर्ची देखकर माथे पर उभरती लकीर है। यह दवा की दुकान पर खड़ा वह बुज़ुर्ग है, जो तय करता है कि दवा ले या दूध। कर केवल आर्थिक बोझ नहीं होते, वे मानसिक दबाव भी होते हैं। और जब यह दबाव लगातार बढ़ता है, तो आदमी बोलना छोड़ देता है—विरोध नहीं करता, बस सहता है।
गरीबी मिटाने के नाम पर किस पर बोझ
कहा जा रहा है कि गरीबी मिटाने के लिए कर लगाना आवश्यक था। तर्क सुसंगत है, पर प्रश्न यह है कि कर किस पर। वही पुराना वेतनभोगी, वही मध्यम वर्ग, वही उपभोक्ता—जिसकी जेब पहले ही जवाब दे चुकी है। अमीरी की छत पर बैठे लोग नीचे हो रहे इस आर्थिक जलभराव को देखकर भीगते नहीं, क्योंकि उनके लिए बजट महज़ आंकड़े हैं। लेकिन जिनके लिए बजट जीवन है, उनके लिए यह हर साल बिना सिलेबस की परीक्षा बन जाता है।
वसंत, बजट और झरती उम्मीदें
पहले वसंत आया था, अब बजट आया है। वसंत में फूल खिलते हैं, बजट में घोषणाएँ। फूल झड़ जाते हैं, घोषणाएँ भी। फर्क यह है कि फूलों के झड़ने के बाद पेड़ फिर हरा हो जाता है, लेकिन घोषणाओं के झड़ने के बाद आम आदमी के पास अगली उम्मीद भी नहीं बचती। वसंत में तू चहकी थी सखी, क्योंकि तब महंगाई की बात रोमांटिक नहीं लगती थी। अब जब आटे-दाल का भाव सामने है, तो चुप्पी ओढ़ ली है—और यही सबसे खतरनाक संकेत है।
बजट आता है, कीमतें रुकती नहीं
कहा जाता है—बजट तो हर साल आता है और चला जाता है। यह बात वही कह सकता है, जिसके लिए बजट अख़बार की खबर है, जीवन का सच नहीं। जिनके लिए हर बजट पिछले से भारी पड़ता है, उनके लिए यह कोई मौसमी मेहमान नहीं बल्कि स्थायी दबाव बन चुका है। बजट चला जाता है, पर कीमतें नहीं जातीं।
ईमानदारी बनाम व्यवस्था का संकेत
यह भी कहा जा रहा है कि केवल वेतन पर निर्भर रहना अब व्यावहारिक नहीं। यही बजट का सबसे तीखा व्यंग्य है। एक ओर ईमानदारी के उपदेश, दूसरी ओर व्यवस्था का मौन संकेत—कि अगर वेतन से नहीं चलता तो रास्ते बदल लो। जब नीति यह संदेश देने लगे कि ईमानदारी से गुज़ारा कठिन है, तो प्रश्न बजट का नहीं, उसकी नैतिकता का हो जाता है।
घाटा और उसकी भरपाई
घाटे के बजट में घाटा उपभोक्ता से ही पूरा किया जाता है—यह कोई रहस्य नहीं, बल्कि स्थापित परंपरा है। पेट्रोल, गैस, शिक्षा, स्वास्थ्य—सब महंगे; आय ‘आर्थिक सुधारों के बाद’ की कतार में। सुधार आते-जाते रहते हैं, आम आदमी वहीं खड़ा रहता है—लाइन में।
चुनी हुई सरकार और चुनी हुई चुप्पी
यह सरकार हमने ही चुनकर भेजी थी—यह वाक्य अब ढाल बन चुका है। चुनाव के समय जनता लोकतंत्र होती है, चुनाव के बाद उपभोक्ता। तब कहा जाता है—धैर्य रखो, सब हित में है। हित का अर्थ अब इतना लचीला हो गया है कि नुकसान भी उसमें समा जाता है।
दो कमाने वाले, फिर भी अधूरा घर
अब सलाह दी जा रही है कि घर चलाने के लिए दोनों को कमाना होगा। यह सलाह नहीं, स्वीकारोक्ति है—कि एक आय अब पर्याप्त नहीं। यह उस व्यवस्था की हार है, जिसने मेहनत के बदले सम्मानजनक जीवन का वादा किया था।
लाइन में खड़ा आम आदमी
“उठ, चल और लग जा लाइन में”—यह केवल नौकरी की नहीं, हर उस कतार की बात है जिसमें आम आदमी खड़ा है—इलाज की, शिक्षा की, न्याय की। बजट में इन लाइनों को छोटा करने के वादे होते हैं, पर लाइनें बढ़ती जाती हैं, क्योंकि नीति में आदमी नहीं, प्रबंधन प्राथमिक होता है।
व्यंग्य क्यों ज़रूरी है
यह व्यंग्य हँसाने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। बजट कोई देववाणी नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा बनाया गया दस्तावेज़ है—और मनुष्य की तरह इसमें भी पक्षधरता और प्राथमिकताएँ होती हैं। जब तक हम इसे ऋतु मानकर सहते रहेंगे, तब तक हर साल यही ‘आंकड़ों का वसंत’ हमारे हिस्से की हरियाली खाता रहेगा।
इसलिए सखी, आंखें बंद कर सपना मत देख। आंखें खोलकर सवाल पूछ। क्योंकि यदि बजट सच में हमारे लिए है, तो उसे हमारे सवालों से डरना नहीं चाहिए।
पाठकों के सवाल
क्या हर बजट वास्तव में आम आदमी के लिए होता है?
बजट में आम आदमी का उल्लेख ज़रूर होता है, लेकिन प्राथमिकताएँ अक्सर आंकड़ों और राजकोषीय संतुलन के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जीवन की वास्तविक कठिनाइयों के इर्द-गिर्द नहीं।
कर बढ़ाना ही गरीबी मिटाने का उपाय है?
कर राजस्व का साधन हो सकता है, समाधान नहीं। समाधान तब होगा जब कर का बोझ और लाभ दोनों न्यायसंगत रूप से बंटे।
मध्यम वर्ग हर बार सबसे अधिक प्रभावित क्यों होता है?
क्योंकि मध्यम वर्ग न तो नीति-निर्माण की ताकत रखता है, न ही राहत योजनाओं की परिभाषा में आसानी से फिट बैठता है।
व्यंग्य से क्या बदलता है?
व्यंग्य सवाल पैदा करता है, और सवाल लोकतंत्र की पहली शर्त होते हैं।






