उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में करनैलगंज से पूर्व विधायक रहे कुंवर अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भैया के निधन के बाद उनका परिवार अब खुले तौर पर वारिसाना अधिकार को लेकर आमने-सामने आ गया है। वर्षों से भीतर ही भीतर सुलग रहा यह पारिवारिक विवाद अब प्रशासनिक प्रक्रिया तक पहुँच चुका है। परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज कराने को लेकर दो पत्नियों के पक्षों के बीच चल रही खींचतान ने न केवल स्थानीय स्तर पर चर्चा को जन्म दिया है, बल्कि प्रशासन के लिए भी यह मामला एक जटिल कानूनी और सामाजिक चुनौती बन गया है।
परिवार रजिस्टर बना विवाद की जड़
करनैलगंज क्षेत्र के कटरा शहबाजपुर गांव से जुड़ा यह मामला तब और गंभीर हो गया जब परिवार रजिस्टर में वारिसों की संख्या तय करने को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आए। प्रशासन के समक्ष मूल प्रश्न यही है कि पूर्व विधायक के वास्तविक वारिस कौन-कौन हैं और परिवार रजिस्टर में कुल कितने नाम दर्ज किए जाएँ। एक पक्ष का कहना है कि पूर्व विधायक के केवल दो ही पुत्र हैं, जबकि दूसरा पक्ष दावा कर रहा है कि दूसरी पत्नी से भी उनके दो पुत्र हैं, जिन्हें जानबूझकर अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
प्रशासन को करना पड़ा हस्तक्षेप
मामले की संवेदनशीलता और बढ़ते तनाव को देखते हुए प्रशासन को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा। इसी क्रम में बृहस्पतिवार को कटरा शहबाजपुर गांव के प्राथमिक विद्यालय परिसर में एक खुली बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का उद्देश्य दोनों पक्षों को आमने-सामने सुनना, उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करना और परिवार रजिस्टर से संबंधित निर्णय की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना था।
एसडीएम की अध्यक्षता में हुई चार घंटे लंबी बैठक
बैठक की अध्यक्षता एसडीएम नेहा मिश्रा ने की। उनके साथ बीडीओ सुशील कुमार पांडेय, एडीओ पंचायत राजेश वर्मा समेत कई प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। बैठक की शुरुआत दोनों पक्षों से आवेदन और दस्तावेज प्रस्तुत कराने से हुई। प्रशासन के सामने यह स्पष्ट कर दिया गया कि निर्णय केवल भावनाओं या दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजों, बयानों और साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के बाद ही लिया जाएगा।
दूसरी पत्नी के पुत्रों का दावा
बैठक में पूर्व विधायक की दूसरी पत्नी स्वर्गीय मीनाक्षी सिंह के पुत्र होने का दावा करने वाले कुंवर कमलेन मोहन सिंह और कुंवर अजेन मोहन सिंह ने परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि वे पूर्व विधायक की दूसरी पत्नी की संतान हैं और उनके पास इस संबंध में सभी आवश्यक प्रमाण उपलब्ध हैं। उन्होंने जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षिक अभिलेख, फोटो और वीडियो जैसे दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए अपने दावे को मजबूत बताया।
उनका यह भी कहना था कि वर्षों तक पारिवारिक स्तर पर उन्हें नजरअंदाज किया गया और अब जब अधिकार की बात आई है तो उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ग्रामीणों पर दबाव डालकर उनके खिलाफ बयान दिलवाए गए हैं।
पहली पत्नी के पक्ष की कड़ी आपत्ति
दूसरी ओर, पहली पत्नी ममता सिंह के पुत्र कुंवर वेंकटेश मोहन सिंह और कुंवर शारदेन मोहन सिंह, साथ ही परिवार की बहन कुंवरि शैल सिंह ने इन दावों का कड़ा विरोध किया। उनका स्पष्ट कहना था कि दोनों आवेदक पूर्व विधायक के पुत्र नहीं हैं और उनका परिवार से कोई वैधानिक संबंध नहीं है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि बिना ठोस और निर्विवाद प्रमाण के किसी का नाम परिवार रजिस्टर में शामिल न किया जाए।
पहली पत्नी के पक्ष का तर्क था कि यदि गलत तरीके से नाम दर्ज हो गए तो इससे न केवल संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े विवाद बढ़ेंगे, बल्कि आगे चलकर कानूनी लड़ाइयों का सिलसिला भी लंबा हो जाएगा।
ग्रामीणों की राय ने बढ़ाई उलझन
बैठक के दौरान प्रशासन ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए ग्रामीणों की राय भी दर्ज की। कुल 49 ग्रामीणों ने पूर्व विधायक के केवल दो पुत्र होने की बात कही, जबकि नौ ग्रामीणों ने दूसरी पत्नी से भी दो पुत्र होने के दावे का समर्थन किया। यह अंतर प्रशासन के लिए निर्णय को और अधिक जटिल बनाने वाला साबित हुआ।
ग्रामीणों की गवाही के दौरान माहौल कई बार तनावपूर्ण हो गया। दोनों पक्षों के समर्थक आमने-सामने आ गए, जिसके चलते पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। लगभग चार घंटे तक चली इस बैठक के बाद ही कोरम पूरा हो सका।
न्यायालय जाने के संकेत
कुंवर कमलेन मोहन सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि यदि प्रशासनिक स्तर पर फैसला उनके पक्ष में नहीं आता है, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका कहना था कि यह केवल नाम दर्ज कराने का मामला नहीं है, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।
एसडीएम का आधिकारिक बयान
एसडीएम नेहा मिश्रा ने बैठक के बाद बताया कि दोनों पक्षों के बयान दर्ज कर लिए गए हैं। पहले पक्ष ने अपने दस्तावेज प्रस्तुत कर दिए हैं, जबकि दूसरे पक्ष ने अतिरिक्त साक्ष्य देने के लिए समय मांगा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी अभिलेखों, दस्तावेजों, ग्रामीणों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि परिवार रजिस्टर में किन-किन नामों को शामिल किया जाएगा।
एसडीएम ने यह भी कहा कि प्रशासन की प्राथमिकता निष्पक्ष और कानूनी रूप से सही निर्णय लेना है, ताकि भविष्य में किसी भी तरह का विवाद या न्यायिक उलझन पैदा न हो।
सियासी विरासत और पारिवारिक दरार
पूर्व विधायक लल्ला भैया की पहचान केवल एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में प्रभावशाली सामाजिक हस्ती के रूप में भी रही है। ऐसे में उनकी सियासी और सामाजिक विरासत से जुड़ा यह पारिवारिक विवाद स्थानीय स्तर पर गहरी चर्चा का विषय बन गया है। लोग इसे केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि प्रभाव और अधिकार की लड़ाई के रूप में भी देख रहे हैं।
अब सबकी निगाहें प्रशासन के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल परिवार रजिस्टर के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भविष्य में होने वाली किसी भी कानूनी कार्रवाई की दिशा भी तय करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज होना क्यों जरूरी है?
परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज होने से व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में वैधानिक पहचान मिलती है, जिससे संपत्ति, उत्तराधिकार और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएँ आसान होती हैं।
क्या प्रशासन का फैसला अंतिम होगा?
प्रशासनिक फैसला रिकॉर्ड के आधार पर होता है, लेकिन असंतुष्ट पक्ष न्यायालय का रुख कर सकता है।
ग्रामीणों की राय का कितना महत्व होता है?
ग्रामीणों की राय सहायक साक्ष्य होती है, लेकिन अंतिम निर्णय दस्तावेजी प्रमाण और कानूनी आधार पर ही लिया जाता है।






