चित्रकूट। ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सदर ब्लॉक कर्वी की ग्राम पंचायत रानीपुर खाकी में वृक्षारोपण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह झुठलाती नज़र आ रही है। तालाब के भीटों से लेकर तालाब के समीप स्थित पहाड़ी क्षेत्र तक, जहां हरियाली होनी चाहिए थी, वहां सूखी ज़मीन और बंजर तस्वीर दिखाई देती है।
मनरेगा योजना के तहत हरियाली का दावा, ज़मीन पर सन्नाटा
मनरेगा के अंतर्गत ग्राम पंचायत रानीपुर खाकी में बोड़ी तालाब के भीटों तथा तालाब के बगल पहाड़ पर वृक्षारोपण कराए जाने का उल्लेख सरकारी बोर्ड और अभिलेखों में दर्ज है। योजना स्थल पर मनरेगा का बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें वित्तीय वर्ष, लागत, श्रमिक दिवस और कार्य की प्रकृति का विवरण साफ़-साफ़ लिखा है। लेकिन जब मौके पर जाकर स्थिति देखी गई, तो वहां न तो कतारबद्ध पौधे दिखाई दिए, न सिंचाई की कोई व्यवस्था और न ही पौधों के संरक्षण के संकेत।
बोर्ड मौजूद, हरियाली नदारद
स्थल पर लगा मनरेगा का बोर्ड यह साबित करता है कि काग़ज़ों में कार्य पूरा दिखाया गया है। बोर्ड पर पौधारोपण की संख्या, लागत और श्रमिक दिवस तक का उल्लेख है, लेकिन ज़मीन पर इन दावों का कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में पौधे लगाए गए होते, तो उनके गड्ढे, सुरक्षा घेरा या कम से कम कुछ पौधे तो दिखाई देते।
तालाब और पहाड़ी क्षेत्र—दोनों जगह सवाल
बोड़ी तालाब के भीटों पर वृक्षारोपण का उद्देश्य मिट्टी कटाव रोकना और जल संरक्षण को बढ़ावा देना होता है, वहीं पहाड़ी क्षेत्र में पौधारोपण से वर्षा जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन मजबूत होता है। लेकिन रानीपुर खाकी में इन दोनों ही स्थानों पर हरियाली की जगह वीरानी दिखाई देती है, जिससे पूरे कार्य की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
अन्य पंचायतों में भी दोहराई जा रही कहानी
रानीपुर खाकी का मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। आसपास की कई ग्राम पंचायतों में भी वृक्षारोपण के बाद पौधों के गायब होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं कहा जाता है कि पौधे सूख गए, कहीं जानवरों ने नुकसान कर दिया, तो कहीं देखरेख के अभाव का बहाना बना दिया जाता है। सवाल यह है कि यदि पौधे लगाए गए थे, तो उनकी निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी।
खण्ड विकास अधिकारी की चुप्पी
मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों की निगरानी और सत्यापन की जिम्मेदारी खण्ड विकास अधिकारी और संबंधित विभागीय अधिकारियों की होती है। इसके बावजूद, वृक्षारोपण के नाम पर हुए खर्च और मौके पर दिखाई दे रही स्थिति के बीच भारी अंतर सामने आ रहा है। अब तक इस पूरे प्रकरण पर खण्ड विकास अधिकारी की ओर से कोई स्पष्ट बयान या जांच की घोषणा सामने नहीं आई है।
उपायुक्त श्रम रोजगार की भूमिका भी संदेह के घेरे में
मनरेगा से जुड़े भुगतान, श्रमिक दिवस और कार्य प्रगति से संबंधित रिपोर्टें उपायुक्त श्रम रोजगार स्तर से होकर गुजरती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब ज़मीन पर वृक्षारोपण दिखाई नहीं दे रहा, तो भुगतान किस आधार पर किया गया। यह स्थिति पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
ग्राम प्रधान और सचिव पर मनमानी के आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों की मौन सहमति से ग्राम प्रधान और सचिव मनरेगा कार्यों में मनमानी कर रहे हैं। काग़ज़ों में कार्य पूरा दिखाकर भुगतान निकाल लिया जाता है, जबकि ज़मीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही होती है। यदि आरोप सही हैं, तो यह न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य के साथ भी खुला खिलवाड़ है।
कब होगी निष्पक्ष जांच?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि ग्राम पंचायत रानीपुर खाकी सहित अन्य पंचायतों में वृक्षारोपण के नाम पर हुए इस कथित फर्जीवाड़े की जांच कब कराई जाएगी। क्या उच्च स्तर से स्वतंत्र जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा। जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक मनरेगा जैसी योजनाओं पर भरोसा कमजोर होता रहेगा।
ग्रामीणों की मांग—हरियाली चाहिए, काग़ज़ी दावा नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें बोर्ड और आंकड़ों से ज़्यादा ज़मीन पर हरियाली चाहिए। यदि योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो, तो गांवों का पर्यावरण सुधरे और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर भविष्य मिले। इसके लिए पारदर्शिता, निगरानी और सख्त कार्रवाई अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या रानीपुर खाकी में सच में वृक्षारोपण हुआ?
दस्तावेज़ों में दावा है, लेकिन मौके पर इसके स्पष्ट प्रमाण दिखाई नहीं देते।
मनरेगा वृक्षारोपण की निगरानी कौन करता है?
खण्ड विकास अधिकारी और संबंधित विभागीय अधिकारी इसकी निगरानी के जिम्मेदार होते हैं।
क्या इस मामले में कार्रवाई संभव है?
निष्पक्ष जांच होने पर जिम्मेदारों पर कार्रवाई और धन की वसूली संभव है।










