सरोजिनी नगर से बन्थरा तक बेखौफ कटान,करोड़ों पौधारोपण पर सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी से सटे ग्रामीण अंचलों में वनविभाग अधिकारियों की मनमानी और लकड़ी माफियाओं के साथ उनकी कथित सांठगांठ अब किसी से छिपी नहीं है। सरोजिनी नगर तहसील क्षेत्र अंतर्गत थाना बिजनौर, थाना सरोजिनी नगर और थाना बन्थरा क्षेत्र में बीते कई वर्षों से सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों हरे-भरे पेड़ों की अवैध कटान धड़ल्ले से जारी है। हैरानी की बात यह है कि न तो लकड़ी माफियाओं को किसी कार्रवाई का भय है और न ही विभागीय अधिकारियों को जवाबदेही की चिंता।
भ्रष्टाचार पर सख्ती के दावे, ज़मीन पर उलटी तस्वीर
भले ही सरकार सार्वजनिक मंचों से भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाने की बात करती हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत नजर आती है। पौधारोपण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत किया जाता है। अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सत्ता से जुड़े लोग कैमरे के सामने पौधा लगाकर सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हैं, लेकिन उन्हीं इलाकों में रातों-रात सैकड़ों पेड़ काट दिए जाते हैं। यह विरोधाभास केवल दिखावे की राजनीति और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को उजागर करता है।
चार वर्षों से जमे अधिकारी, माफियाओं को खुली छूट
सूत्रों के अनुसार, सरोजिनी नगर क्षेत्र में बीते लगभग चार वर्षों से तैनात वनविभाग के कुछ क्षेत्रीय अधिकारी स्थानीय दबंगों, तथाकथित छुटभैय्या नेताओं और लकड़ी माफियाओं के साथ गहरी सांठगांठ बनाए हुए हैं। इसी संरक्षण के चलते क्षेत्र की दर्जनों ग्राम पंचायतों में अवैध कटान का ऐसा तांडव देखने को मिल रहा है, जिसने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
कटान की भयावह सूची: गांव-गांव उजड़े बाग
थाना बन्थरा क्षेत्र अंतर्गत आम के बाग गढ़ी चुनौटी में लगभग 40 आम के पेड़ काटे गए। लतीफ नगर व वादेखेड़ा में करीब 100 पेड़ों का सफाया किया गया। नटकूर में 20, नीवा गांव में आम और नीम के लगभग 40 पेड़, किशनपुर कौड़ियां में आम, शीशम और सागौन के बहुमूल्य वृक्ष काटे गए। मझगवां और कैथी में करीब 45 आम-नीम के पेड़, वहीं हरौनी से लेकर ऐन और औरामा तक आम के बाग उजाड़ दिए गए। बन्थरा के सिकंदरपुर और गुदौली जैसे इलाकों में हजारों पेड़ पहले ही समाप्त किए जा चुके हैं।
सूचना देने के बावजूद कार्रवाई शून्य
इन सभी अवैध गतिविधियों की जानकारी समय-समय पर संबंधित क्षेत्रीय वनविभाग अधिकारियों को फोन और लिखित माध्यम से दी गई, लेकिन हर बार या तो अनदेखी की गई या मामले को दबा दिया गया। आरोप है कि अवैध आरा मशीनें बिना लाइसेंस वर्षों से संचालित हो रही हैं, जहां नीम, आम और सागौन की लकड़ी भेजकर मोटी अवैध वसूली की जाती है।
RTI भी बनी मज़ाक
दिनांक 01 मार्च 2024 को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत वनविभाग से अवैध कटान और कार्रवाई से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी, लेकिन आज तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभागीय स्तर पर पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
ताज़ा मामला: मशीनों के साथ खुलेआम कटान
सूत्रों के मुताबिक, 03 जनवरी 2026 से अब तक करीब 30 आम के पेड़ काटे जा चुके हैं। 05 जनवरी 2026 को मौके पर पहुंचे मीडिया कर्मियों ने देखा कि पिनवट क्षेत्र में पिंटू पासवान और इमरान नामक लकड़ी माफिया अपनी आरा मशीन, जेसीबी और छोटा हाथी वाहनों के जरिए मोटे पेड़ों की लकड़ी सड़कों पर खुलेआम ढो रहे थे।
अधिकारियों के बयान और सवाल
जब इस संबंध में क्षेत्रीय वनविभाग अधिकारी प्रीति त्रिपाठी से संपर्क किया गया तो पहले उन्होंने अनभिज्ञता जताई, बाद में जुर्माना लगाने की बात कही। सवाल यह उठता है कि जब अवैध कटान जारी है, मशीनें चल रही हैं और लकड़ी ढुलाई हो रही है, तो केवल जुर्माना किस कानून के तहत पर्याप्त माना जा सकता है?
मामले की जानकारी फॉरेस्ट अधिकारी एस.एन. सिंह को भी दी गई, जिन्होंने मौके पर पहुंचने की बात कही, लेकिन समाचार लिखे जाने तक किसी ठोस कार्रवाई या आधिकारिक पुष्टि की जानकारी सामने नहीं आई।
निष्कर्ष: व्यवस्था पर जनता का भरोसा डगमगाया
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग इस पूरे तंत्र से भली-भांति परिचित हैं। यदि ईमानदार और सक्षम अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो सच्चाई अपने-आप सामने आ जाएगी। लेकिन जब तक संरक्षण की राजनीति जारी रहेगी, तब तक पर्यावरण, कानून और जनता—तीनों ही हारते रहेंगे।
❓ सवाल-जवाब
क्या वनविभाग अवैध कटान रोकने में विफल रहा है?
स्थानीय स्तर पर कार्रवाई न होने से यही प्रतीत होता है कि विभागीय नियंत्रण कमजोर या मिलीभगत से प्रभावित है।
क्या RTI के तहत जानकारी देना अनिवार्य नहीं?
हाँ, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जानकारी देना कानूनी बाध्यता है।
क्या केवल जुर्माना लगाना पर्याप्त कार्रवाई है?
नहीं, अवैध कटान पर मशीनों की जब्ती और आपराधिक मुकदमा आवश्यक है।








