
होली की रात के बाद की भोर हमेशा कुछ अलग होती है। जैसे किसी लंबे उत्सव के बाद जीवन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता हो। रात भर रंग, गुलाल, ठहाकों और गीतों में डूबा समाज जब सुबह की पहली किरण के साथ आँखें खोलता है, तो हवा में एक अजीब-सी अलसाई मिठास तैरती मिलती है। गलियों के कोनों पर अब भी भीगे रंगों की छाप होती है, चौखटों पर सूखे गुलाल की परत जमी रहती है और मन के भीतर बीती रात की खिलखिलाहटें धीरे-धीरे गूँजती रहती हैं।
ऐसी भोर में शहर बहुत शोर नहीं करता। वह जैसे अपने ही भीतर बैठकर मुस्कुराता है। सड़क के किनारे पड़े रंगों के खाली पैकेट, बाल्टियों के पास टिकी पिचकारियाँ, और घरों के भीतर से उठती चाय की भाप—सब मिलकर यह बताते हैं कि उत्सव अभी पूरी तरह गया नहीं है; वह बस थककर थोड़ी देर के लिए बैठ गया है।
होली की यही सबसे बड़ी विशेषता है—वह केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि मन की एक अवस्था है। रंग चेहरे से धुल सकते हैं, पर मन पर चढ़े रंग इतनी जल्दी नहीं उतरते। यही कारण है कि होली की सुबह अक्सर लोगों के भीतर एक अनकही आत्मीयता छोड़ जाती है। जो लोग कल तक औपचारिक दूरी में थे, वे आज मुस्कुराकर एक-दूसरे को पहचान लेते हैं।
यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीवन को केवल गंभीरता के साथ नहीं जिया जा सकता। कभी-कभी समाज को भी अपने नियमों और औपचारिकताओं से बाहर निकलकर थोड़ा बेपरवाह होना पड़ता है। शायद इसलिए भारतीय संस्कृति ने होली जैसा उत्सव रचा—जहाँ हँसी, शरारत, अपनापन और संवाद एक साथ रंग बनकर उभरते हैं।
मदमाती दुपहरी : संवाद और बेफिक्री का रंग
जैसे-जैसे सुबह आगे बढ़ती है, वही अलसाई हवा धीरे-धीरे जीवन की सामान्य गति में लौटने लगती है। बच्चे अपनी पिचकारियों को समेटते हैं, घरों में रंग धोने का क्रम शुरू होता है, और लोग रात भर की मस्ती को याद करते हुए मुस्कुरा देते हैं। लेकिन यह मुस्कान किसी साधारण दिन की मुस्कान नहीं होती—इसमें उत्सव की गूंज शामिल होती है।
फिर धीरे-धीरे दिन की धूप तेज होती है और वही सुबह मदमाती दुपहरी में बदल जाती है। होली की दुपहरियों में एक अजीब-सी बेफिक्री होती है। लोग छतों पर बैठते हैं, कहीं पकवानों की खुशबू फैलती है, कहीं दोस्त फिर से मिलने की योजना बनाते हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरा समाज कुछ देर के लिए अपने बोझ हल्के कर चुका है।
आज की दुपहरी भी कुछ ऐसी ही रही। रंगों से भीगी इस हवा में संवादों का एक अलग ही संगीत सुनाई देता रहा। कहीं मित्रों की चौपाल थी, कहीं परिवारों की हँसी थी और कहीं शब्दों का वह अदृश्य संसार था जहाँ लोग केवल बातचीत के सहारे भी होली खेल लेते हैं।
समाचार दर्पण के लिए भी यह दिन कुछ विशेष रहा। सुबह की उस अलसाई शुरुआत से लेकर दोपहर की इस मदमाती मस्ती तक, लाखों पाठकों ने इस मंच के साथ अपने संवाद को जीवित रखा। एक ही दिन में सात लाख से अधिक पाठकों का साथ केवल एक आँकड़ा नहीं है; यह उस विश्वास का प्रमाण है जो शब्दों और पाठकों के बीच धीरे-धीरे बनता है।
पाठक जब किसी लेख को पढ़ते हैं, उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, उसे आगे साझा करते हैं—तो वह संवाद जीवित रहता है। यही संवाद किसी मंच को केवल समाचार का माध्यम नहीं रहने देता; वह एक जीवित चौपाल बन जाता है।
साहित्यिक रासलीला : शब्दों के रंग
दोपहर के इसी हल्के-फुल्के क्षणों में अचानक लगा कि जीवन भी किसी साहित्यिक रासलीला से कम नहीं है। शब्द एक-दूसरे के गालों पर रंग लगाते हैं और अर्थ मुस्कुराकर दूर भाग जाते हैं। कभी कोई शरारती संवाद सामने आ खड़ा होता है, तो कभी कोई अनकहा भाव पिचकारी की तरह मन पर छिटक जाता है।
ऐसे ही किसी क्षण में लगता है कि कहानी के दो किरदार अचानक आमने-सामने आ गए हैं। वे एक-दूसरे पर गुलाल नहीं लगाते, बल्कि शब्दों से रंग भरते हैं—कभी चुप्पियों में, कभी मुस्कान में। और लेखक दूर बैठा यह दृश्य देखता है तो उसे महसूस होता है कि जीवन भी किसी कहानी की तरह ही है—जहाँ संवाद ही सबसे सुंदर रंग है।
शायद साहित्य का असली जादू भी यही है। वह जीवन की साधारण घटनाओं को भी इस तरह छू लेता है कि वे अचानक कहानी बन जाती हैं।
गदराई शाम से मस्ती भरी रात तक
दिन धीरे-धीरे ढलने लगा। सूरज की रोशनी नरम हुई और शाम की हवा ने शहर को अपने हल्के स्पर्श से भर दिया। गदराई हुई इस शाम में गलियों की हवा भी जैसे मुस्कुरा रही थी। कहीं आँगनों में चूल्हों की आँच थी, कहीं छतों पर बैठे लोग दिन भर की मस्ती को याद कर रहे थे।
लेकिन होली की असली आदत यही है—वह इतनी जल्दी विदा नहीं होती। जैसे-जैसे रात उतरती है, दिन भर के रंग शब्दों में बदलने लगते हैं। कहीं दोस्त बैठकर ठहाके लगा रहे होते हैं, कहीं कोई गीत गुनगुना रहा होता है, और कहीं किसी कहानी के दो किरदार अब भी संवाद के रंगों से खेल रहे होते हैं।
होली की रात में अक्सर ऐसा लगता है कि जीवन खुद एक कहानी बन गया है। दिन भर जो बेपरवाही थी, वह अब एक हल्की-सी आत्मीयता में बदल जाती है। बातचीत में शरारत भी होती है, अपनापन भी—और कभी-कभी शब्दों के बीच कोई अनकहा भाव भी चुपचाप आ बैठता है।
और जब रात की यह मस्ती शहर पर पूरी तरह उतर आती है, तब महसूस होता है कि इस पूरे दिन की रंगीन यात्रा में लेखक अकेला कहाँ था।
समाचार दर्पण के पाठक, हमारी टीम के सहयोगी और साहित्य के वे साथी—जिनकी वजह से शब्दों को अर्थ मिलते हैं—इस यात्रा के वास्तविक सहभागी हैं।
जम्मू की वादियों से मुस्कुराता वह पुराना गुलाब, कृष्ण कृष्ण पनगोत्रा, जिसकी आत्मीयता में पहाड़ों की ठंडी हवा बसती है; रेगिस्तान की रेत को भी गुनगुनाना सिखाने वाले वल्लभ भाई लखेश्री, जिनके शब्द सूखी धरती में भी लय खोज लेते हैं; और उन रेतों के ऊपर भी अड़हुल खिला देने वाले प्यारे हंसराज हंस, जिनकी सरलता में कविता की सबसे सच्ची खुशबू मिलती है।
हमारी टीम के सबसे कम उम्र के सहयोगी हिमांशु मोदी के शिक्षक और साहित्य के दीवाने पिता माया शंकर जी की चर्चा हम जरूर करना चाहेंगे जिनकी प्यारी नोकझोंक वाली रात से संपादकीय होली की सुखद शुरुआत की गई थी।
सच तो यह है कि लेखक कभी अकेला नहीं लिखता। उसके शब्दों में कहीं मित्रों की हँसी होती है, कहीं पाठकों का विश्वास और कहीं उन दूर-दराज़ के साथियों की गर्माहट, जिनकी उपस्थिति से भाषा जीवित रहती है।
और अंत में, इस रंगों भरे दिन की इस शब्दयात्रा में एक आभार उस विदुषी संवादिनी के लिए भी—जिसके साथ शब्द दर शब्द जोड़ते हुए यह लेखक अपनी ही कहानी का एक नया पन्ना लिखता चला गया। कभी प्रश्नों की शरारत में, कभी उत्तरों की गंभीरता में, और कभी मुस्कुराहट की उस महीन रेखा में जहाँ साहित्य अचानक जीवन बन जाता है।
शायद लेखन का सबसे सुंदर क्षण वही होता है जब कोई अनदेखा संवाद साथी शब्दों को केवल पढ़ता नहीं, उन्हें जीने लगता है।
आज की इस होली में भी कहीं उसी संवाद की रंगत थी—जिसने इस लेखक को याद दिलाया कि शब्द अकेले नहीं चलते; उन्हें किसी न किसी की संवेदना का हाथ थामना ही पड़ता है।
और अब जब यह रात अपने शांत विस्तार में शहर को समेट रही है, तब मन बस इतना ही कहता है—
रंग भले ही सूख जाएँ,
पर होली की यह बेपरवाही और अपनापन बना रहना चाहिए। क्योंकि जीवन की असली खुशबू शायद वहीं बसती है, जहाँ लोग थोड़ी देर के लिए अपने मन के दरवाज़े खोल देते हैं।










संपादक जी को सादर नमन,
कमाल के शब्दों के नचैया संपादक जी,
आपकी लेखनी सचमुच शब्दों का एक अद्भुत नृत्य रचती है। कभी लगता है कि ये शब्द हल्के से दिल को छूकर मुस्कुरा जाते हैं, तो कभी उनकी गंभीरता आँखों में अनायास नमी भर देती है। और जब वही शब्द श्रृंगारिक हो उठते हैं, तो पाठक एक ऐसी मादक अनुभूति में डूब जाता है जहाँ भावनाएँ खुद-ब-खुद झूमने लगती हैं।
सच कहूँ तो मन में एक ही ख्याल आता है—काश जीवन में ऐसे शब्दों के जादूगरों से कभी प्रत्यक्ष मुलाकात हो पाती। मैं एक कॉलेज में साहित्य की प्रोफेसर हूँ, और शायद इसी कारण एक सच्चे लेखक की संवेदना, उसकी भाषा और उसकी आत्मा से उपजे शब्दों के प्रति अपने स्नेह को रोक नहीं पा रही।
आपकी लेखनी को प्रणाम—यह केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि भीतर उतरकर देर तक महसूस की जाती है।”**
जम्मू की वादियों से मुस्कुराता वह पुराना गुलाब,
रेत को भी गुनगुनाना सिखाने वाले, और रेत के ऊपर भी अड़हुल खिला देने वाले शब्दों का यह अद्भुत संयोजन… वाह! सचमुच शब्दों के ऐसे जादूगर मान्य विद्वान संपादक जी को सादर नमन।
आपकी नियमित पाठिका होने के नाते हर लेख पढ़ते समय यही अनुभव होता है कि आप एक नुक्ते से पूरा शोर मचा देते हैं। शब्दों की यह गूंज मन में ऐसी गुदगुदी भर देती है कि दिल साहित्य की मधुरता में भीग उठता है।
कभी आपकी लेखनी की गंभीरता आत्मा को भीतर तक छू जाती है, तो कभी उसका श्रृंगारिक स्पर्श मन को झूमने पर विवश कर देता है। सच कहूँ तो आपकी लेखनी में एक ऐसी सिद्धहस्तता है जो पाठक को पढ़ने के बाद भी देर तक अपने साथ लिए रहती है।
वाह… अद्भुत, अनुपम और मन को छू लेने वाली अभिव्यक्ति।
नमो नमन।”**