करोड़ों का खर्च और फिर भी प्यासे हैं गाँव— यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद अंतर्गत पवारा थाना क्षेत्र के बामी गांव और उसके आसपास के इलाकों की जमीनी सच्चाई है। जिस जल जीवन मिशन को हर घर तक नल से स्वच्छ पेयजल पहुंचाने की ऐतिहासिक योजना बताया गया था, वही मिशन यहां अधूरी टंकी, टूटी पाइपलाइन और सूखे नलों का प्रतीक बन गया है।
दो साल पहले जिस योजना से तीन गांवों के सैकड़ों परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद थी, वही आज ग्रामीणों के लिए सरकारी लापरवाही, ठेकेदारी अनियमितता और जवाबदेही के अभाव का उदाहरण बन चुकी है।
घोषणाओं का शोर, ज़मीन पर सन्नाटा
बामी गांव में लगभग दो वर्ष पूर्व पानी की टंकी की नींव रखी गई थी। उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि योजना पूरी होते ही बामी, अलापुर और करौरा गांव के सात से आठ सौ परिवारों को शहरों की तरह टोंटी से स्वच्छ पानी मिलेगा। लेकिन समय बीतता गया और घोषणाएं सिर्फ कागजों व भाषणों तक सिमट कर रह गईं।
आठ महीने से ठप पड़ा निर्माण
ग्रामीणों के अनुसार पिछले आठ महीनों से टंकी का निर्माण पूरी तरह रुका हुआ है। अधूरी टंकी आज भी खड़ी है, मानो विकास के अधूरे वादों की गवाही दे रही हो। ग्राम प्रधान से लेकर टंकी और उपकरणों की देखभाल के लिए नियुक्त गार्ड तक का कहना है कि ठेकेदार काम अधूरा छोड़कर बोरिया-बिस्तर समेट चुका है।
कनेक्शन हुए, पानी नहीं
गांव के महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि पूरे गांव में महज 40 प्रतिशत घरों में ही कनेक्शन दिए गए हैं। इस बात की पुष्टि स्वयं ग्राम प्रधान सरोज सिंह भी करती हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रधान के अपने घर में भी आज तक कनेक्शन नहीं हुआ है। जिन घरों में पाइप लगे भी हैं, वहां महीनों से एक बूंद पानी नहीं आया।
लीकेज ने खोली योजना की पोल
कुछ महीनों तक जेनरेटर के सहारे सुबह-शाम पांच से दस मिनट पानी सप्लाई की कोशिश की गई, लेकिन वह भी व्यर्थ साबित हुई। कारण— गांव के लगभग 50 स्थानों पर पाइपलाइन लीकेज और कई जगह खुली पाइप। पानी घरों तक पहुंचने से पहले ही सड़कों, खेतों और नालियों में बह गया।
बिना टोंटी के पाइप, सूखे नल
भगेलू गौड़ की बेटी कंचन बताती हैं कि आठ महीने पहले उनके घर समेत कई परिवारों के यहां बिना टोंटी के पाइप लगा दिए गए और फिर काम रोक दिया गया। आज तक उन पाइपों में पानी नहीं आया। जयप्रकाश और ओमप्रकाश गौड़ जैसे कई ग्रामीणों के घरों की स्थिति भी यही है।
कीचड़, गड्ढे और बढ़ती परेशानी
मनोज सिंह का कहना है कि पीने का पानी तो नहीं मिला, लेकिन खुली पाइपलाइन और अधूरे काम की वजह से सड़कों पर कीचड़ जरूर फैल गया। कई जगह सड़कें खोदकर छोड़ दी गईं, जिससे आवागमन भी मुश्किल हो गया है।
बस्तियों में असमानता के आरोप
वेद प्रकाश उपाध्याय का आरोप है कि बभनौटी पुरवे में लगभग 20 ब्राह्मण परिवार रहते हैं, लेकिन किसी को भी कनेक्शन नहीं दिया गया। केवल टंकी के पास की कुछ बस्तियों में ही कनेक्शन दिए गए, वह भी अधूरे और अनुपयोगी।
शिकायतें, लेकिन कार्रवाई शून्य
ग्राम प्रधान सरोज सिंह बताती हैं कि इस गंभीर स्थिति को लेकर जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बीते पांच महीनों से एक बूंद पानी नहीं आया, लेकिन जिम्मेदार विभाग खामोश हैं।
राजनीतिक पत्राचार, ज़मीनी असर नहीं
भाजपा के मीरगंज मंडल अध्यक्ष महेश चौरसिया ने बताया कि जुलाई 2025 में उन्होंने जल शक्ति मंत्री को पत्र लिखकर तीनों गांवों में पानी सप्लाई शुरू कराने की मांग की थी। बावजूद इसके, हालात जस के तस बने हुए हैं।
विभागीय सफाई और सवाल
जल निगम ग्रामीण के अधिशासी अभियंता सौमित्र का कहना है कि फिलहाल बामी गांव में काम स्थगित है, क्योंकि सरकार के निर्देशानुसार जहां कार्य लगभग पूर्ण है, वहां पहले अनुरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि टंकी कब तक पूरी होगी, इस पर वह कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके।
जब योजना बन जाए बोझ
करोड़ों की लागत से शुरू की गई यह योजना आज ग्रामीणों को फिजूलखर्ची और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक लगने लगी है। जिन घरों में पानी पहुंचना था, वहां आज भी महिलाएं दूर-दराज से पानी ढोने को मजबूर हैं।
जवाबदेही की दरकार
यह मामला सिर्फ एक गांव या एक टंकी का नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल पर सवाल है, जिसमें योजनाएं शुरू तो होती हैं, लेकिन समय पर पूरी नहीं होतीं। ग्रामीणों की मांग है कि या तो योजना को जल्द पूरा किया जाए या फिर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाए।






