गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। इस बार यह मुद्दा इसलिए और अधिक चर्चा में आ गया है क्योंकि हिंदू धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की इस मांग को मुस्लिम धर्मगुरु और ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने सार्वजनिक रूप से समर्थन दिया है। यह समर्थन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गाय को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवादों के बीच यह बयान सांप्रदायिक सौहार्द, गौ-संरक्षण और नीति निर्धारण की दिशा में एक नई बहस को जन्म देता है।
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग और धार्मिक संदर्भ
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग केवल किसी एक धर्म या समुदाय की भावना से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, सामाजिक शांति और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने इस संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद साहब की हदीस का हवाला देते हुए कहा कि गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान बताया गया है। मौलाना के अनुसार, हदीस में गाय के दूध को लाभकारी, औषधीय और शरीर को शक्ति देने वाला बताया गया है, जबकि इसके मांस को बीमारियों से जोड़कर देखा गया है।
मौलाना शहाबुद्दीन का कहना है कि जब धार्मिक ग्रंथों में गाय के संरक्षण और उसके उत्पादों के लाभ की चर्चा मिलती है, तब उसका संरक्षण केवल धार्मिक नहीं बल्कि मानवीय कर्तव्य बन जाता है। इसी आधार पर उन्होंने गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की भी मांग की और इसे इंसानियत के खिलाफ करार दिया।
अविमुक्तेश्वरानंद का आंदोलन और सरकार को अल्टीमेटम
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा देने की मांग को लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले कई महीनों से लगातार सक्रिय हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को जनवरी 2026 के अंत तक 40 दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि इस अवधि में गौ-संरक्षण और गोहत्या पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उनके अनुसार, जो सरकार गाय की रक्षा नहीं कर सकती, वह खुद को हिंदू हितैषी कहने का अधिकार खो देती है।
अविमुक्तेश्वरानंद ने गोमांस निर्यात को लेकर भी योगी सरकार और केंद्र सरकार दोनों पर सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि एक ओर गौ-संरक्षण की बात की जाती है और दूसरी ओर गोमांस का निर्यात जारी रहता है, जो नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़ा करता है।
मौलाना शहाबुद्दीन का समर्थन: सौहार्द या राजनीति?
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का बयान कई स्तरों पर देखा जा रहा है। समर्थकों का मानना है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग का समर्थन कर उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में यदि किसी मुद्दे पर विभिन्न समुदायों के धार्मिक नेता एकमत होते हैं, तो उससे समाज में शांति और विश्वास का वातावरण बनता है।
वहीं दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस बयान को राजनीतिक नजरिए से भी देख रहे हैं। उनका तर्क है कि उत्तर प्रदेश और देश की मौजूदा राजनीति में गौ-संरक्षण एक संवेदनशील मुद्दा है और ऐसे समय में इस तरह का समर्थन राजनीतिक संदेश भी दे सकता है। हालांकि मौलाना शहाबुद्दीन ने स्वयं अपने बयान को राजनीति से अलग बताते हुए इसे पूरी तरह धार्मिक और मानवीय आधार पर दिया गया कदम बताया है।
केंद्र सरकार का रुख और संवैधानिक स्थिति
इस पूरे विवाद के बीच केंद्र सरकार पहले ही संसद में स्पष्ट कर चुकी है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने को लेकर फिलहाल कोई विशेष योजना नहीं है। सरकार का कहना है कि पशु-संरक्षण और पशु-नीति का विषय मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। संविधान के अनुसार, पशुपालन और कृषि राज्य सूची के विषय हैं, इसलिए इस पर अंतिम निर्णय राज्यों को ही लेना होता है।
हालांकि, केंद्र सरकार यह भी कह चुकी है कि वह राज्यों द्वारा किए गए प्रयासों को सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान करती रहेगी। इसके बावजूद, गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर देशभर में समय-समय पर उठने वाली आवाजें यह संकेत देती हैं कि यह विषय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक भी है।
गोदान फिल्म, गौ-संरक्षण और सामाजिक विमर्श
उत्तर प्रदेश में इन दिनों ‘गोदान’ फिल्म और गौ-संरक्षण को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। यह फिल्म ग्रामीण जीवन, गाय और किसान के संबंध को केंद्र में रखकर बनाई गई बताई जा रही है। ऐसे समय में जब सांस्कृतिक माध्यमों के जरिए गौ-संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है, मौलाना शहाबुद्दीन का बयान इस विमर्श को और व्यापक बनाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गौ-संरक्षण को केवल धार्मिक मुद्दे तक सीमित न रखकर पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य से जोड़ा जाए, तो यह बहस ज्यादा सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ सकती है।
आगे क्या? सवाल खुले हैं
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर उठी यह नई आवाजें कई सवाल छोड़ जाती हैं। क्या सरकारें इस मांग पर गंभीरता से विचार करेंगी? क्या यह मुद्दा धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर नीति और कानून का हिस्सा बनेगा? या फिर यह बहस एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी में सिमट कर रह जाएगी?
फिलहाल इतना तय है कि मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का समर्थन और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का आंदोलन इस मुद्दे को नए मोड़ पर ले आए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग देश की राजनीति, समाज और नीति निर्माण में किस दिशा में आगे बढ़ती है।






